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पत्र : आचार्य प्रशांत के लिए : TRUTH की आड़ में सब्सक्रिप्शन

आदरणीय आचार्य प्रशांत जी,

आपको यह ख़त लिखने की वजह आपका ज्ञान, आपके विचार या सत्य को लेकर आपके दावे नहीं; बल्कि सत्य की तलाश में निकले एक व्यक्ति के साथ आपकी टीम का वह व्यवहार है, जिसका अनुभव मुझे पिछले दिनों हुआ। मैं यह स्वीकार करने में कोई दिक़्क़त महसूस नहीं करता कि पहले मैं आपको सुना करता था। हालाँकि अब भी कभी-कभार आप मेरी सोशल मीडिया फ़ीड में बोलते या यूँ कहूँ कि बकैती करते दिख जाते हैं।

पिछले महीने की ही बात है। मैंने फ़ेसबुक पर आपकी एक पोस्ट देखी। उसमें आप कोई सत्य बताने का दावा कर रहे थे और लोगों से कमेंट में TRUTH लिखने को कह रहे थे। मैंने भी सिर्फ़ मौज लेने के लिए कमेंट में TRUTH लिख दिया। इसके अगले ही कुछ मिनटों में आपकी टीम के एक प्रतिनिधि का फ़ोन आ गया! उन्होंने मुझसे तमाम तरह की जानकारियाँ लीं। मसलन, मैं आपको कब से सुनता हूँ, कहाँ सुनता हूँ, फ़ेसबुक पर या यूट्यूब पर? मैंने भी आपकी प्रशंसा करते हुए प्रतिनिधि महोदय से दो-चार झूठ बोल डाले। हालाँकि मैं सच कहना चाहता था, लेकिन यह कहना कि मैं आपको अपने इंग्लिश बाथरूम में मल-त्याग करते हुए सुनता हूँ, थोड़ा हास्यास्पद हो जाता! इसलिए मैंने झूठ कहा कि सुबह और संध्या के समय, जब मैं गहन चिंतन की अवस्था में होता हूँ, तब आपके शब्द ही मुझे राह दिखाते हैं।

मेरा यह उत्तर सुनकर आपके प्रतिनिधि बेहद प्रसन्न हुए। उन्हें मुझमें संभावनाएँ दिखने लगीं। फिर वे मुझे आपके लाइव सेशन में जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करने लगे। कहने लगे, “दीपक जी, अभी तो आपने आचार्य जी के संपूर्ण ज्ञान का मात्र 10 प्रतिशत ही प्राप्त किया है! असली ज्ञान और सत्य तो लाइव सेशन में मिलता है।”

यह सुनते ही मेरे कान खड़े हो गए। शायद मैं भाँप गया था कि अब कुछ बेचा जाने वाला है। मैंने अपना खेल जारी रखा और एक सच्चे जिज्ञासु की भाँति पूरी विनम्रता से पूछा कि आपके लाइव सेशन में कैसे उपस्थित हुआ जा सकता है।

अब बारी आपके प्रतिनिधि की थी। उन्होंने पूरे इत्मीनान से आपके ऐप के बारे में बताया। कहा कि यह ऐप आईफ़ोन और एंड्रॉयड, दोनों तरह के फ़ोन के लिए उपलब्ध है। फिर पूछा कि मैं कौन-सा फ़ोन इस्तेमाल करता हूँ। मेरे एंड्रॉयड फ़ोन बताने पर उन्होंने तुरंत प्ले स्टोर खोलने को कहा। मैंने भी आपका ऐप डाउनलोड कर लिया। तब तक वे मेरे व्हाट्सऐप पर रजिस्ट्रेशन-लिंक भेज चुके थे।

इसके बाद उन्होंने मुझे समझाया कि दुनिया को अज्ञानता और अंधकार से निकालने का महान् कार्य आप कर रहे हैं और इसके बदले आपकी टीम हमसे रजिस्ट्रेशन शुल्क के नाम पर कुछ प्रेमराशि या सहयोग-राशि ले रही है। अगर कोई सक्षम है, तो यह शुल्क 800 रुपये है। ऐसे युवा जो अभी आर्थिक रूप से इतने सक्षम नहीं हैं, उनके लिए यह प्रेमराशि न्यूनतम रखी गई है। फिर उन्होंने अपने मन से ही मेरा रजिस्ट्रेशन शुल्क 200 रुपये कर दिया और मुझसे भुगतान करने का विशेष आग्रह करने लगे।

आचार्य जी, आपकी फ़ेसबुक पोस्ट पर TRUTH लिखने की यह क़ीमत थी, जिसे मैं अगले ही पल चुकाने वाला था। एकबारगी मुझे अपने आप पर क्रोध आया कि मैंने इतनी बातें आगे क्यों बढ़ाईं! हालाँकि, मैं चाहूँ तो आपके प्रतिनिधि को डपटकर फ़ोन काट सकता था, लेकिन मुझे ही TRUTH जानने की चुल मची थी। अंततः आपके प्रतिनिधि की तपस्या देखकर मैंने लाइव सेशन का सब्सक्रिप्शन ले लिया, जबकि आरंभ से ही जानता था कि मैं आपका लाइव सेशन कभी अटेंड नहीं करूँगा।

हुआ भी वही। मैंने एक भी सेशन जॉइन नहीं किया और न ही आपका ऐप फिर कभी खोला।

महीना बीत गया। आपके सब्सक्रिप्शन की तय अवधि भी समाप्त हो गई। आपके प्रतिनिधि का फ़ोन फिर आना ही था। अहले सुबह मेरे फ़ोन की घंटी बजने लगी। फ़ोन उठाया, तो दूसरी तरफ़ फिर आपकी टीम का प्रतिनिधि था। इस बार मैंने उससे केवल सच-सच कहा और फ़ोन रख दिया।

लेकिन आचार्य जी, आश्चर्य मुझे अब हो रहा है। इतना कुछ होने के बाद भी आपकी टीम मुझे सब्सक्रिप्शन बेचने के लिए दिन में चार मर्तबा फ़ोन कर रही है। व्हाट्सऐप पर संदेश अलग से भेजे जा रहे हैं। आपके सब्सक्रिप्शन की अवधि समाप्त होने पर मुझे जो पहला संदेश मिला, उसमें सूचित किया गया कि मेरे ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज की गई है और यह शिकायत मेरे व्हाट्सऐप, SMS, RCS, मिस्ड कॉल और नोटिफ़िकेशन ने दर्ज करवाई है।

इस व्हाट्सऐप-संदेश में मुझे मेरे नाम ‘दीपक’ की जगह ‘भैंस’ कहकर संबोधित किया गया था। मैं दंग रह गया। आपके ज्ञान का सब्सक्रिप्शन न लेने पर आपकी टीम मुझे पशु कहकर संबोधित कर रही थी!

अगले दिन फिर संदेश आया। इस बार सूचित किया गया कि अक्टूबर महीने की प्रेमराशि में थोड़ी बढ़ोतरी की गई है। अब मैं 300 रुपये में आपका गूढ़ ज्ञान प्राप्त कर सकता था। मैंने सब्सक्रिप्शन रिन्यू नहीं किया।

अगले दिन फिर संदेश आया। इस बार संदेश की भाषा में फटकार थी। मुझे बताया जा रहा था कि मेरे जैसे लोग आपका मूल्यवान् समय खाते हैं, क्योंकि आप स्वयं इन पेंडिंग लिस्ट्स को देखते हैं! इन पेंडिंग लिस्ट को देखने में आप जितना समय और ऊर्जा ख़र्च करते हैं, उतने में नई किताब लिख लेंगे!

आचार्य जी, यह पढ़कर मुझे कुछ हैरानी नहीं हुई। मैंने फिर भी सब्सक्रिप्शन रिन्यू नहीं किया।

अगले दिन फिर आपका संदेश आया। इस बार मुझे लज्जित और नीचा दिखाने की कोशिश की गई। संदेश में लिखा था, “शायद आपको समय की कमी है, पर समय तो बीत ही जाना है। शायद पैसों की अड़चन है, पर अब सहयोग राशि न्यूनतम है। शायद मन थोड़ा भटक गया है, पर रास्ता अब भी खुला है।”

इसके साथ ही लिखा था कि अब 200 रुपये से कम सहयोग राशि करना संभव नहीं है।

मैंने फिर भी सब्सक्रिप्शन रिन्यू नहीं किया। मुझे लगा कि अब तो आपकी टीम मुझे तंग करना बंद कर देगी। लेकिन अगले दिन फिर व्हाट्सऐप-संदेश आया। इस बार नया प्रस्ताव था : 200 रुपये की सहयोग राशि पर अक्टूबर के साथ नवंबर माह बिल्कुल मुफ़्त!

आचार्य जी, मैं समझ नहीं पा रहा कि यह किस तरह का सत्य है, जिसके रास्ते में बार-बार नए ऑफ़र, नई रियायतें और नए प्रलोभन खड़े हैं। यह कैसी जिज्ञासा है, जिसे पहले ज्ञान की कमी बताकर उकसाया जाता है, फिर पैसों के लिए मनाया जाता है, और अंत में सब्सक्रिप्शन न लेने पर अपमानित किया जाता है?

मैं यह नहीं कहता कि ज्ञान के लिए शुल्क नहीं लिया जाना चाहिए। किसी भी काम के लिए संसाधनों की ज़रूरत होती है और किसी सेवा के लिए शुल्क लेना अपने आप में अनुचित नहीं है। लेकिन जब ज्ञान के नाम पर किसी व्यक्ति को बार-बार फ़ोन किया जाए, उसके सामने अलग-अलग रक़म के प्रस्ताव रखे जाएँ, उसके इनकार को स्वीकार न किया जाए और फिर उसे ‘भैंस’ कहकर संबोधित किया जाए, तो सवाल केवल शुल्क का नहीं रह जाता। सवाल उस व्यवहार का हो जाता है, जो ज्ञान और सत्य का दावा करने वाली किसी संस्था से अपेक्षित नहीं है।

आप अक्सर लोगों को अज्ञानता और अंधकार से बाहर निकालने की बात करते हैं। मैं यह नहीं जानता कि आपके लाइव सेशन में क्या सिखाया जाता है, क्योंकि मैंने उनमें से एक भी सेशन अटेंड नहीं किया। लेकिन आपकी टीम के साथ हुए इस अनुभव ने मुझे इतना ज़रूर सिखा दिया कि किसी व्यक्ति के ज्ञान के दावे और उसकी संस्था के व्यवहार के बीच कितना अंतर हो सकता है।

मैंने आख़िरकार अपने आपमें बड़बड़ाते हुए कहा, “साला बनिया कहीं का!” और आपकी टीम के उस नंबर को ब्लॉक कर दिया।

आचार्य जी, यह पत्र लिखते हुए मेरे मन में आपसे कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है। मैं बस यह जानना चाहता हूँ कि TRUTH लिखकर सत्य की तलाश शुरू करने वाले व्यक्ति को आख़िरकार सब्सक्रिप्शन के ऑफ़र, भुगतान के आग्रह, ताने और अपमान ही क्यों मिलते हैं? क्या सत्य तक पहुँचने का रास्ता किसी ऐप के रजिस्ट्रेशन से होकर गुज़रता है? और अगर कोई उस रास्ते पर पैसे ख़र्च नहीं करना चाहता, तो क्या वह उपहास और अपमान का पात्र हो जाता है?

आप सत्य की बात करते हैं। इसलिए उम्मीद है कि इन सवालों को भी सुनेंगे।

सादर!
भैंस नहीं दीपक...

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