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काशी हिंदू विश्वविद्यालय : हिंदी भवन में 2000 बैच का नॉस्टैल्जिक आगमन

काशी हर दिन एक अप्रत्याशित अनुभव है। जैसे गत 23 अक्टूबर को 12 बजे दिन में हिंदी भवन का अनुभव! तीन सेवानिवृत्त शिक्षक दिखे एक झुंड के बीच। तीनों की पोशाक किसी महफ़िल के चीफ़ गेस्ट की तरह।

अहा! देखत बने जात नहि बरनी कहिए। प्रो. राधेश्याम राय जिनकी मुस्कान हमेशा आवाज़ पर भारी रहती है। प्रो. बलिराज उर्फ़ बलिया पांडेय जो चाह कर भी किशोर से बुज़ुर्ग और मैच्योर हो नहीं पाते हैं। विचार और मंच पर हमेशा अप्रत्याशित प्रो. अवधेश प्रधान जो जवान दिखने के लिए शर्ट-पैंट पहनकर भी हमेशा गंभीर बुज़ुर्ग ही दिखते रहे आए हैं। हिंदी विभाग की वर्तमान मुखिया प्रो. श्रद्धा सिंह भी कम तैयार होकर नहीं आई थीं। भारतीय परिधान में ‘कामायनी’ की श्रद्धा की तरह। 

मेरा साक्षात्कार होते ही प्रो. श्रद्धा चिर-परिचित मुद्रा में बोल उठीं, “ये प्रो. रामाज्ञा राय हैं। इनसे मिलिए...”

मेरा दिल और दिमाग़ कुछ देर के लिए स्थगित हो गया कि कहाँ हिंदी विभाग का  चमत्कारी गुप्त भोज जो अक्सर गुप्त काशी की तरह घटित होता रहता है और कहाँ यह कीनारामी अघोर!

रहस्य का कोहरा तब फटा जब प्रिय प्रो. शशांक शुक्ल से मिला और गप्प हुआ।

ख़ैर! पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी सभागार में एमए 2000 बैच के क्लासमेट का यह मिलन अनेक नज़रिये से अनूठा था। हिंदी विभाग के पुरातन विद्यार्थियों और वर्तमान में सफल बौद्धिकों ने विभाग को विभाग की शैली में चमत्कृत किया।

यहाँ पता चला कि समूह के सहपाठी देश के अलग अलग हिस्सों से ही नहीं, नेपाल से भी आए थे। पता चला कि प्रो. शशांक शुक्ल और डॉ. स्वाति के कॉर्डिनेशन से क्लासमेट अपने पुराने पलों, जगहों, चीज़ों, स्मृतियों में आकर ख़ुद को महसूस करना चाहते थे। स्मृति ध्वंस, बिखराव, ज़िम्मेदारी और हिंदी विभाग के मरियल-सड़ियल संबंध-स्वभाव के बावजूद वे आए।

इस अवसर पर शिक्षकों ने नहीं, बल्कि विद्यार्थियों ने अपने शिक्षकों को याद किया। उन्हें पता चला, कुछ काशीलाभ हो गए, कुछ काशीनाथ हो गए, कुछ बीमार हैं, कुछ विस्थापित हैं और कुछ हैं जो गुफावासी हैं। गुफावास से निकलकर तीन ही आ पाए। 

आगे क्या हुआ होगा आप अगर यहाँ के विद्यार्थी-शिक्षक हैं तो ख़ुद ही पुरानी स्मृति को दुहरा लीजिए। यहाँ नया इतना ही होता है, बाक़ी सब पिष्टपेषण और कर्मकांड ही है।

अब मत पूछिए क्या-क्या हुआ? पुरातन विद्यार्थियों ने पुरातन और नूतन शिक्षकों को महँगा गुलदस्ता दिया, अंगवस्त्रम दिया, रुद्राक्ष दिया, पैकेट भरकर बनारसी मिठाई दी, यह सोचकर कुछ वेदांती होंगे सफ़ेद रसगुल्ला दिया। बदले में विभाग की मुखिया ने सबको गुलाब जामुन, समोसे और चाय से पलट प्रवाह किया। शुगर, बीपी, फ़ैटी लिवर को धता बताते हुए सभी शिक्षकों ने हिंदी विभाग की परंपरा का मान रखा। प्रो. प्रधान का करुण भाषण हुआ, प्रो. पांडेय द्वारा ‘लंठ प्रसंग’ के माध्यम से अनुपस्थित निवेदिता की बार-बार खोज हुई, मेरे द्वारा हिंदी विभाग के नवल राग का नव रहस्योद्घाटन हुआ और अंत में अध्यक्ष का कर्त्तव्यपूर्ण मुक्तिमार्गी धन्यवाद हुआ!

अंतराल-प्रसंग

गंभीरता में प्रो. प्रधान की छायाप्रति प्रो. आशीष त्रिपाठी मेरे बग़ल में थे। मैंने देखा कि वह मिठाई से बचकर समोसे पर टूट पड़े और फीकी चाय का स्वाद लेते हुए मुझसे बोले, “क्लास लेनी है। यह समोसा सहयोग करेगा।” मुझे इच्छा हुई कि कहूँ : आप महिला अध्ययन केंद्र के पुरुष इंचार्ज हैं। आजकल देश में नारा तेज़ है—‘एक चाय, दो समोसा / इन मर्दों का क्या भरोसा!’ लेकिन मैंने सोचा कि बेचारे आजकल सोए हुए हैं, सोए शेर को मत जगाइए। मैंने प्रो. त्रिपाठी पर इतिहासबोध उड़ेला, “साथी, उज्जैन ने कालिदास को भले ही भुला दिया; काशी आपको याद रखेगी।” वह सिद्ध पंडित हैं। उन्होंने छूटते ही कहा, “साथी, मुझे यथार्थ का तीखा एहसास रहता है और कोई भरम नहीं है।”

मैं और क्या कहूँ!
मुझे याद नहीं क्या-क्या कहा!

मुझे बस इतना याद है कि गर्दन ने माला को इनकार किया था और कंठ ने वाणी का उच्चार किया था :
 
“न माला न चंदन
अलख निरंजन...”

विशेष आह्वान

यह 2000 बैच की एक सुखद नॉस्टैल्जिक जर्नी थी। 2001 से अब तक का बैच इससे प्रेरणा लेकर सामूहिक अवचेतन को जाग्रत कर सकता है। वैसे भी काशी बुढ़ापे के लिए है, जवानी के लिए नहीं। आइए, लेकिन तजुर्बे की अदा के साथ...

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