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इक्कीस : नफ़रत के दौर में मोहब्बत का पैग़ाम

ख़ून अपना हो या पराया हो
नस्ल-ए-आदम का ख़ून है आख़िर
जंग मशरिक़ में हो कि मग़रिब में
अम्न-ए-आलम का ख़ून है आख़िर

—साहिर लुधियानवी की नज़्म ‘ऐ शरीफ़ इंसानों’ से

बीते साल (2025) दिसंबर में हिंदी सिनेमा के परदे पर जहाँ एक ओर भारत-पाकिस्तान के दरम्यान बे-यक़ीनी, नफ़रत और रक़ाबत मजमून बन रहा था तो वहीं नए साल (2026) के पहली जनवरी को वही परदा दोस्ती, मोहब्बत और इंसानियत का पैग़ाम लेकर हाज़िर होता है। श्रीराम राघवन की फ़िल्म ‘इक्कीस’ साल 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में शहीद हुए—मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित—सेकेंड लेफ़्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की बायोपिक है। यह अभिनेता धर्मेंद्र और असरानी की आख़िरी और अगस्त्य नंदा (अरुण खेत्रपाल की भूमिका में) की थिएटर डेब्यू फ़िल्म भी है।

फ़िल्म 1971 के युद्ध में राजस्थान सीमा के निकट बसंतर में पाकिस्तान के चौदह टैंकों (फ़िल्म के डायलॉग के मुताबिक़) को ढेर करने वाले अरुण खेत्रपाल के साहस को याद करती है, पर इस बार कहानी का सूत्रधार इस पार का नहीं, उस पार का है। यह फ़िल्म निर्देशक की सर्जना है कि उस पार यानी पाकिस्तान के हवाले से भी हिंदुस्तान के एक इक्कीस साला नौजवान के जाँबाज़ कारनामे सुनाते हुए कहीं भी नफ़रत की बू नहीं आती, बल्कि हमेशा एक फ़ौजी का दूसरे फ़ौजी के प्रति इज़्ज़त का भाव दिखता है।

फ़िल्म में पाकिस्तानी टैंक कमांडर ब्रिगेडियर ख्वाजा मोहम्मद नासीर (जयदीप अहलावत) अरुण खेत्रपाल के शहादत की दास्ताँ उनके पिता ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) मदन लाल खेत्रपाल को सुनाते हैं। एम. एल. खेत्रपाल 1971 की युद्ध बीतने के तीस साल बाद, 2001 में लाहौर जाते हैं—जहाँ उनका बचपन गुज़रा था, जहाँ उनका अपना पुस्तैनी मकान भी है। नासिर की मेज़बानी में जब वह लाहौर की सड़कों से गुज़र रहे हैं, तब वह आस-पास ऐसे निहार रहे हैं जैसे ज़माने बाद कोई निहारता है। अपने बेहद आजिज़ को, उन्हें वह लाहौर दिख रहा जहाँ की सड़कें आज भी अपने शहीद-ए-आज़म भगत सिंह को याद करते हुए नारों की तरह सदाएँ दे रही हैं कि “भगत सिंह तुम्हारे सपनों को, मंज़िल तक पहुँचाएँगे”...! यह इक्कीसवीं सदी के शुरुआती साल थे, जहाँ लाहौर भगत सिंह के सपनों की तामीर का इंतज़ार कर रहा था और वहीं हिंदुस्तान भी।

फ़िल्म में दोनों देशों की आवाम में क्रिकेट का जुनून कुछ इस क़दर है कि पाकिस्तानी घरों में भी सचिन तेंदुलकर की तस्वीर है। बक़ौल खेत्रपाल “दोनों देशों के बीच क्रिकेट ऐसा होता है, जैसे हर इंसान पर जंग सवार हो जाती है, तो बक़ौल मरियम निसार (एकावली खन्ना—जो फ़िल्म में निसार की बेगम हैं) “पर इस जंग में कोई मरता नहीं”। यह एक ऐसे पिता के सामने कहा जा रहा था जिसने अपने बेटे को खोया था साल 1971 के युद्ध में। ब्रिगेडियर खेत्रपाल को अपने बेटे पर नाज़ तो था ही और नासीर का यह कहना कि “आपका बेटा न केवल हिंदुस्तानी बल्कि पाकिस्तानी फ़ौज के लिए भी एक मिसाल है सर”, उनमें और गर्व भर देता है।

वह बेटा जिसे एक फ़ौजी की तरह बड़ा किया गया था, पर उसके भीतर दुश्मन के प्रति नफ़रत के बीज नहीं बोए गए बल्कि उसने अपनी सरज़मीं से मोहब्बत, अपने देश से बेइंतेहा प्यार और ज़रूरत पड़ने पर देश के लिए क़ुर्बान हो जाने का फ़र्ज़ धारण किया था। फ़िल्म का नायक अरुण खेत्रपाल जब युद्ध के लिए तैयारी कर रहा है तो उसे सामने से दुश्मन आता नहीं दिख रहा, फ़िल्म में कहीं भी ‘मार डालो’, ‘काट डालो’ इस तरह के संवाद नहीं सुनाई देते। ‘गदर’ और ‘गदर 2’ की तरह कहीं भी बेवजह का गला फाड़कर चिंघाड़ता हुआ नायक नहीं है। बॉर्डर 2 के ट्रेलर में दिखता नायक भी नहीं—जिसका मक़्सद बमों की आवाज़ को लाहौर तक पहुँचाना है; बल्कि मोहब्बत करता हुआ, दोस्ती निभाता हुआ और अपनी टीम को तैयार करता हुआ नायक है और मौक़ा पड़ने पर पाकिस्तानी टैंकों को नेस्तनाबूत कर देने वाला नायक है।

यह फ़िल्म अंततः युद्ध के विरोध और मानवता के पक्ष में खड़ी होती है। फ़िल्म देखने के बाद दर्शकों में किसी विशेष मजहब और किसी विशेष मुल्क के प्रति नफ़रत नहीं पैदा होगी, जैसा की आज के दौर में आने वाली अधिकांश ब्लॉकबस्टर्स में देखा जा रहा है (मसलन फ़िल्म ‘छावा’ से लेकर ‘धुरंधर’ तक)। बल्कि उनमें यह आश्वस्ति होगी कि हिंदुस्तान की फ़ौज में बेमिसाल साहस रहा है जो अपने सरज़मीं की हिफ़ाज़त के लिए हमेशा से क़ुर्बानी देती आई हैं, फ़तह हासिल करती आई हैं और साथ ही फ़िल्म वह संवेदना भी पैदा करती है जो साहिर अपनी नज़्म में कह रहे हैं कि “जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी... इस लिए ऐ शरीफ़ इंसानो, जंग टलती रहे तो बेहतर है...”।

फ़िल्म में संवादों की भाव-प्रवणता इस रूप में गहरी है कि वे बिना किसी ख़ास कोशिश के दर्शकों के ज़ेहन में उतर जाते हैं। फ़िल्म के संवाद शोर नहीं करते, वे हमारी उस संवेदना को आवाज़ देते हैं जो हमारे भीतर गहरे बैठी हुई है, जो संवेदना अपनों से बिछुड़कर फिर से मिलन की चाह में होती है, जो संवेदना खोए हुए बेशक़ीमती लम्हों, यादों को फिर से हासिल कर लेने में होती है।

साल 2014 में आई फ़िल्म अभिनेता और निर्देशक विजय राज की फ़िल्म ‘क्या दिल्ली क्या लाहौर’ जिस तरह की संवेदना दर्शकों के भीतर लाती है, उसी तरह फ़िल्म ‘इक्कीस’ भी। बक़ौल कैफ़ी आज़मी “तक़सीम हुआ मुल्क, दर्द इधर भी है उधर भी...”।

दो देश, जिसका एक साझा अतीत, एक साझी तहज़ीब, एक साझी विरासत, साझे सुख-दुख, अपने-अपने वर्तमान में खड़े अतीत की ओर इस तरह देख रहे हैं कि उसे चाहकर भी अपना नहीं पा रहे हैं, उस ओर मुड़ने की कोशिश में दोनों के दरम्यान उनके-उनके देश की सियासत खड़ी है।

इस फ़िल्म में एम. एल.  खेत्रपाल को जब लाहौर में भरपूर प्यार और बा’अदब मेहमानवाज़ी मिलती है तो वह कहते हैं—“समझ नहीं आ रहा ये सच है या वो—बॉर्डर पर चलने वाली गोलियाँ”। फ़िल्म का एक पात्र एम. एल. खेत्रपाल का दोस्त है, जिसकी भूमिका मशहूर अभिनेता असरानी ने निभाई है, वह अल्ज़ाइमर से पीड़ित है। वह एम. एल. खेत्रपाल से बात करते-करते भूल जाता है। फिर खेत्रपाल उन्हें याद दिलाने की कोशिश में कहते हैं कि “मदन इंडिया में है, आना चाहता है, मगर दोनों मुल्क अलग हो गए हैं।”, असरानी साहब कहते हैं, “क्या हुआ मुल्क को?” यहाँ मंटो के टोबा टेक सिंह की याद आती है, जहाँ हिंदुस्तान और पाकिस्तान के नाम से ही पागल और पागल हुए जा रहे थे, उनकी आपसी गुफ़्तगु देश के रहनुमाओं से सवाल कर रही थीं, कि क्या हुआ मुल्क को?

नासीर जब एम. एल. खेत्रपाल को उस जगह पर ले जाते हैं—जहाँ टैंकों के बीच लड़ाई हुई थी, जिस जगह पर अरुण खेत्रपाल ने अपनी शहादत दी थी, फ़िल्म में यह दृश्य अधिक संजीदगी के साथ प्रस्तुत किए गए हैं। एक संवाद में एम. एल. खेत्रपाल, नासीर से कहते हैं—“नासीर अँधेरा बढ़ रहा है, चल घर चलते हैं”। इसमें ऐसा लग रहा था जैसे दोनों के घर एक हों, दोनों अपने ही घर की बात कर रहे हों।

फ़िल्म में ख़ामोशी भी ख़ास तरह का संवाद रचती है, न कहकर भी बहुत कुछ कहा जा रहा होता है। युद्ध के बाद, अपनों को खोने के बाद की ख़ामोशी, मारने वाले की ग्लानि में भी एक ख़ामोशी। वार-ड्रामा में जिस तरह आज विजुअल एफ़ेक्ट्स के इस्तेमाल हो रहे हैं, ऐसे में यह फ़िल्म काफ़ी हद तक वास्तविक लोकेशंस के साथ फ़िल्माई गई है, जिससे दृश्य में कोई बनावटीपन नहीं आने पाता। फ़िल्म के गीत और रेडियो पर बजने वाली फ़रमाइशें सुकून भरी हैं—“अफ़साना लिख रही हूँ दिल-ए-बेक़रार का, आँखों में रंग भर के तेरे इंतज़ार का” (फ़िल्म—दर्द, 1947, उमा देवी द्वारा गाया हुआ) हो या “चाँदनी आई बन के प्यार ओ साजना’ (फ़िल्म—दुलारी, 1949, शमशाद बेगम द्वारा गाया हुआ) या फिर “कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते” (फ़िल्म—अदालत, 1958, राजेंद्र कृष्ण द्वारा लिखा और लता मंगेशकर द्वारा गाया गया)।

फ़िल्म में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की तस्वीर ही नहीं बल्कि मीर तकी मीर और मिर्ज़ा ग़ालिब के शेर भी हैं—“जान से हो गए बदन ख़ाली, जिस तरफ़ तू ने आँख भर देखा” और “रगों में दौड़ने फिरने के हम नहीं कायल, जो आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है”। यानी कितना कुछ है जो दोनों देशों के बीच साझा है—गीत-संगीत, सिनेमा, ग़ज़लें, शाइरी, शाइर, लेखक और भी जाने कितने ही शय, कितनी ही शख़्सियत, कितने ही ख़याल।

फ़िल्म के संवाद कई दफ़े नई कविता की पंक्तियों से लगते जिसमें कोई तुकबंदी नहीं लेकिन भावों का एक पूरा संसार होता है।

यह फ़िल्म इसके किरदारों के लिए, संवादों, गीतों और अभिनय के लिए तो देखी ही जानी चाहिए, साथ ही सबसे बढ़कर इसलिए देखी जानी चाहिए कि आज जब पूरी दुनिया में इंसानों को जातियों, नस्लों, धर्मों में बाँटा जा रहा है, उन्हें आपस में लड़ाया जा रहा है, लोग एक-दूसरे के जान के प्यासे हो रहे हैं, तब ऐसी दुनिया को ठहरकर सोचने पर यह फ़िल्म मजबूर करती है। इंसानियत के पक्ष में खड़ी होती है और सही मायने में कला का दायित्व निभाती है। यह निश्चित तौर पर हमारे समय का एक सार्थक सिनेमा कहा जाएगा। इसकी सार्थकता तब और बढ़ जाती है जब यह एक काल्पनिक कथा न होकर ‘बायोपिक’ है, काल्पनिक कथाओं में जहाँ जहर परोसा जा रहा हो, वहाँ वास्तविक जीवन संघर्षों से प्रेरित सिनेमा दुनिया को बचाने और संवारने, ख़ूबसूरत बनाने का ज़िम्मा लिए हुए है। यह फ़िल्म तमाम हताशा और निराशाओं के बीच एक उम्मीद है।

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