‘हिन्दवी उत्सव’ में प्रेम की संभावनाएँ
अमन त्रिपाठी
02 सितम्बर 2026
फ़्योदोर दोस्तोयेवस्की की ‘वाइट नाइट्स’ से एक पंक्ति पिछले दो दिन से ज़ेहन में घूम रही है, “यह एक अद्भुत रात थी—ऐसी रात, जो केवल तब संभव होती है, जब हम युवा होते हैं।” ऐसी ही एक अद्भुत रात से पहले का दिन था, ‘हिन्दवी उत्सव’-2026 का दिन, जहाँ अनंत साहित्यिक संभावनाओं के बीच, दोनों रूप (उम्र और विचार) के नवयुवाओं में पल रही थी—नए प्रेम की अनंत संभावनाएँ।
साहित्यिक शब्दावली में कहा जाए तो ‘क्विक्सोटिक’ [Quixotic] और ‘डिकेंशियन’ [Dickensian] संभावनाएँ।
साहित्य-जगत में ‘हिन्दवी उत्सव’ हर वर्ष किसी वसंत-सा आता रहा है और बुगेनविलिया से नए रचनाकारों को एक नई उमंग प्रदान करता है। ये नवयुवा जो चमकते हैं, दमकते हैं और साहित्य जगत की ख़ूबसूरती का एक अंश बनते हैं। इस वर्ष ‘हिन्दवी’—प्रेम, साहित्य और रचना का संगम इलाहाबाद की धरती पर कर रहा था। हिंदी के महत्त्वपूर्ण रचनाकारों, संपादकों, कलाकारों के बीच देशभर से विलक्षण प्रतिभा वाले चयनित प्रतिभागी अपनी रचना और अनेक आकांक्षाओं के साथ वहाँ उपस्थित हुए थे।
अनेक आकांक्षाओं में एक आकांक्षा प्रेम की आकांक्षा भी थी और उत्सव में उपस्थित सभी लोगों में मुख्यतः चार रूप के प्रेमी दिखाई दे रहे थे।
पहले रूप के प्रेमी जिन्हें हम कहते हैं—चौंचक प्रेमी। ये सबसे उत्साहित प्रेमियों की श्रेणी में शामिल थे। ‘मसान’ फ़िल्म में वरुण ग्रोवर ने अपने रचित किरदारों के माध्यम से कहलवाया है कि ‘संगम दो बार आना चाहिए, एक बार अकेले और एक बार किसी के साथ’ और अकेले आए प्रेमी हमारे समय के क्षणिक प्रेम को देखते हुए दोनों सफ़र को एक ही साथ पूरा कर लेना चाहते थे और शायद इसीलिए प्रेम खोजने को इंटेंसेली डेस्परेट थे।
जिस सफ़र को एक उम्र लग जाती है, हमारे चौंचक प्रेमियों का वह अरैल से अस्सी तक का सफ़र भी बहुत जल्दी ही तय हो गया। बनारस और इलाहाबाद की दूरी भले ही अधिक न हो, पर प्रेम में डूबे हर प्रेमी को प्रेमिका के कंधे का सहारा जब बस की दाहिनी सीट से मिलता है, तब हर प्रेमी यही चाहता है कि यह गोपीगंज से डीएलडब्लू तक की सड़क, धरती से आकाश की दूरी के समांतर हो जाए और तर्जनी में कनिष्ठा का वो फ़ंदा यूँ ही उम्र भर लगा रहे।
पाउलो कोएल्हो के ‘द अल्केमिस्ट’ में नायक ने नायिका से कहा था, “मैं तुमसे इसलिए प्रेम करता हूँ कि पूरी क़ायनात ने तुम्हें मुझतक पहुँचाने की साज़िश की है।”
कुछ उसी नायक की भाँति हमारे चौंचक प्रेमी भी ‘हिन्दवी’ के शुक्रगुज़ार नज़र आते हैं और बटरफ़्लाई इफ़ेक्ट को कुछ अधिक संजीदगी से ज़ेहन में बैठा चुके हैं और इन प्रेमियों में केवल पहला प्यार पाने वाले प्रेमी भर शामिल नहीं थे, वो कोवलन भी थे जो कन्नगी की अनुपस्थिति में माधवी की तलाश कर रहे थे।
दूसरे तरह के प्रेमियों को मैं कहता हूँ—सिल-बट्टा प्रेमी। वे प्रेम से वंचित लोग नहीं हैं; वे प्रेम की तलाश में स्वयं को घिसते रहे लोग हैं। सिल और बट्टे की सार्थकता मिक्सर के इस युग में वैसे ही कुछ कम समझ आती है और उनके साथ होने की उपयोगिता भी। बीते समय में अम्मा सिल को दीवार से टिकाकर, बट्टा बाएँ ओर खड़ाकर देती थी और हमको डाँटती थी। सिल और बट्टे को एकसाथ पट करके रखने से न जाने उनको क्या डर था, पर वही डर आज के सिल-बट्टा प्रेमियों में दिखाई देता है, साथ रखे जाने का डर, या शायद साथ रख दिए जाने के बाद उपयोगिता खो देने का डर।
सिल-बट्टा प्रेमियों की सार्थकता साथ होने में है, पर उन्हें दूर रखा जाता है या कर दिया जाता है। वे अपने समय के सोहनी-माहीवाल या हीर-रांझा हो सकते थे, पर यहाँ फ़र्क़ था। यहाँ प्रेम का अर्थ या प्रेम ही कुछ निरर्थक समझा गया है। प्रेमी प्रेम से वंचित हो गया, या हक़ीक़त में उसे कभी प्रेम मिला ही नहीं। वह उसी बट्टे की तरह रहा, जो सिल के साथ किसी उपयोगिता के लिए आया था; सिल से अलग हुआ तो बट्टा तो रहा, मगर उसका बट्टापन किस काम का?
शायद इसी वजह से सिल-बट्टा प्रेमी प्रेम को पाने से ज़्यादा उसके काम आ जाने की फ़िक्र में रहते हैं और डूबे रहते हैं साथ होने की एक स्मृति और अलग रख दिए जाने की एक उपयोगिता के ख़्वाब में और अंततः सिल-बट्टा प्रेमी ‘प्रेम-गली अति साँकरी, जा में दो न समाय’ के शाब्दिक अर्थ को जीवन का मूलमंत्र मानकर अकेले ही बट्टे की भाँति सिल पर घिसने की उपयोगिता से दूर, किसी अन्य कार्य में कार्यरत अपनी नई कहानी गढ़ रहे हैं।
रूमी ने अपनी कविता ‘द गेस्ट हाउस’ में लिखा है—
यह मनुष्य होना एक सराय है,
हर सुबह एक नया मेहमान आता है।
कभी ख़ुशी, कभी अवसाद, कभी कोई क्षुद्रता
कभी चेतना का कोई क्षणिक उजास—
सब अचानक आए हुए मेहमान हैं।
शायद सिल-बट्टा प्रेमी भी इसी सराय के कुछ पुराने मेहमान हैं। कोई प्रेम आया, कुछ देर ठहरा, फिर चला गया; कोई अवसाद आया और अपेक्षा से तनिक ज़्यादा देर ठहर गया। कोई स्मृति बिना दस्तक दिए चली आई और कोई रात भर सिरहाने बैठी सर खुजाती रही। सिल-बट्टा प्रेमी अब किसी के आने की प्रतीक्षा में नहीं हैं, पर ख़्वाब देखते हैं कि काश कोई आ जाए।
तीसरे तरह के प्रेमियों को मैं कहता हूँ—बकैत प्रेमी, जिसमें शायद मैं ख़ुद को भी देख पाता हूँ। अँग्रेज़ी में कहें तो सैपियोसेक्सुअल की श्रेणी में गिने जाने वाले लोग, जो लिंग-भेद के बग़ैर किसी भी रूप में बहते साहित्य, कविता या बकैत-रस को पाने वाले, LGBTQIA++ में उस ‘+’ का स्थान पाए हुए, प्रेमी होने को आतुर लोग।
देर रात चाँद से जंग में जीते चंद लोगों की गिनती में शामिल ये लोग अपनी सिगरेट से अपना दिया ख़ुद बनाते हैं और अम्मार इक़बाल के शेर—रात से जंग कोई खेल नहीं, तुम चराग़ों में इतना तेल नहीं—को लगातार ग़लत साबित करते आ रहे लोग हैं। छत पर गिनती के कुछ लोगों के बीच अपनी स्मरण-कथा, प्रेम-कथा और दुनिया भर के विषयों पर चर्चा करते ये प्रेमी ब्रह्मांड के अखंड बकैत-प्रेमियों की श्रेणी में गिने जाते हैं, जिनकी आँखों की लालटेन सुरती की एक ठोंक या वोडका के दो ठेपी से निरंतर जलती रहती है।
चौथे और अंतिम प्रेमी का रूप था परछाईं प्रेमी का रूप, जो ज्ञानेंद्रपति की रचनाओं जैसा था, जो कविता की किसी पंक्ति को सुनकर, हाथ पकड़ साथ चलते प्रेमियों की परछाईं देखकर और बार-बार एक कंधे से दुपट्टा गिराकर फिर से रखती स्त्रियों में अपनी चेतना पारीक को खोज रहा था।
इसी मिज़ाज के कुछ प्रेमी NCZCC के रेख़्ता स्टॉल के बग़ल पीपल के इर्द-गिर्द बने चबूतरे पर बैठकर किसी के ख़याल में गुम हर उस टहलते प्रेमी जोड़े को देख रहे थे, जहाँ प्रेम छोटे-छोटे दृश्यों में झलक जाता था—मसलन हरी साड़ी पहने हुए वह स्त्री, जो पहली दफ़ा मैराथन में दौड़ी धावक की तरह उमस और गर्मी के कारण पसीने से तरबतर थी। जिसकी पेशानी पर बहते पसीने की बूँदों से बाएँ भौं के निकट हो गई टिकुली को देखकर उसका प्रेमी अपनी हँसी को थामे, सेल्फ़ी कैमरा को आईना बनाकर उसकी टिकुली ठीक बीच में कर चुपके से बाएँ गाल पर होंठों के स्पर्श से एक चुम्बन दे गया... और इस प्रेमयुक्त दृश्य में मदहोश हमारे परछाईं प्रेमी अपने पहले चुम्बन को याद करने लगे, जो उनींदी आँखों से उनकी चेतना पारीक ने सावन के पहले रोज़ रखा था, जिसकी ऊष्मा वे आज भी महसूस कर रहे हैं।
इन सबके इतर मिलते हैं एक और तरह के प्रेमी—जिन्हें मैं प्रेमी कहने से भी कतराता हूँ। जो महज़ दैहिक प्रेम की भावना लेकर लोगों से मिलते हैं, ताकि ग्लेनलिवेट या बैलेंटाइन की खुली बोतल का एक चौथाई उतर जाने के बाद, दोस्तों के बीच दाग़े गए उस पुराने सवाल—“व्हाट इज़ योर बॉडी काउंट?”—के जवाब में, थोड़ी ख़ुशी में थोड़ा ईगो डिसॉल्व करके कह सकें—“आई इवन हैव फ़क्ड इन द हिन्दवी उत्सव।” और फिर शायद एक ठहाका उठे, कोई गिलास आगे बढ़ाए और बात बढ़े किसी और रात की ओर…
बहरहाल,
जीवन, प्रेम और दर्शन की इतनी सीधी-सरल परिभाषा तो संभव हो नहीं सकती और न ही किसी प्रेमी का इतना आसान वर्गीकरण प्रेमियों के वर्णित चार रूपों में संभव है। हर प्रेमी में अन्य के लक्षण पाए जाना स्वाभाविक ही लगता है। इसलिए प्रेम का ऐसा लीनियर वर्गीकरण निहायत घटिया कहा जाएगा और इसके लेखक को समाज कहेगा—चूतिया।
इसीलिए, इतिहास की शब्दावली में कहा जाए तो हॉर्स शू वर्गीकरण और गणित की भाषा में कहें तो वेन्न वर्गीकरण ही थोड़ा अर्थपूर्ण समझ आता है, जहाँ किसी प्रेमी में अन्य-सा होने की संभावना बची रहे; जहाँ सिल-बट्टा प्रेमी, बकैत प्रेमी हो सके; बकैत प्रेमी, चौंचक प्रेमी को महसूस कर सके और चौंचक प्रेमी अन्य प्रेमी जोड़ियों की परछाईं में खोज सके अपनी चेतना पारीक।
ख़ैर, उत्सव को गुज़रे अब कुछ रोज़ हो चुके हैं। शायद कुछ प्रेमियों ने अपने-अपने गोदो (Godot) का इंतज़ार भी छोड़ दिया है, कुछ अब भी वरुण और अस्सी के उस मिलन को फिर से घटित होते देखने को तरस रहे हैं और कुछ प्रेमी शायद इस वक़्त अपनी चेतना पारीक की बाहों में सिर रखे बैठे हों, मानो इस बार उसकी कही हुई उस एक बात को सचमुच गाँठ बाँधकर रखने का मन बना लिया हो, जो उसने आषाढ़ और भादों की हर उस रात को कहा था, जब पानी की किसी बूँद की तरह उसने उसे अपने आगोश से विदा किया था और कहा था—“अब से हमका लेहे बिना कहूँ ना जाया—ठीक, नहीं हम फिर तोहसे बोलबो ना करब।”
इसी वाक्य के समांतर मुझे उत्सव के एक रोज़ पहले का दिन याद आ रहा है, जब इलाहाबाद जाने से पहले घर से निकलते वक़्त अम्मा ने कहा था—“जा भइया, जउन सोचे होब्या तौन मिली।”
इस एक वाक्य के नेपथ्य में अभी तक मेरे मुख पर निराशा का साया है और एक ख़याल कि काश मैंने पुरस्कृत होने की क्षुद्र आकांक्षा से इतर, सोचा होता—‘प्रेम’।
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बेला पॉपुलर
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