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अपराध की सज़ा लड़कियाँ क्यों भुगतें?

आज के कुछ रोज़ पूर्व बिहार के जमुई में घटी घटना और ऐसी तमाम वारदातों के परिणाम केवल तात्कालिक नहीं होते, उनके असर बेहद दूरगामी होते हैं। हमारे समाज की संकीर्ण मानसिकता को बदलने में दशकों का संघर्ष लगा है। तभी छोटे गाँवों और क़स्बों की बेटियाँ शिक्षा, रोज़गार और स्वावलंबन के लिए घर की चौखट लाँघ पाई हैं। लेकिन ऐसी हर बर्बर घटना समाज की प्रगतिशील सोच को कई वर्ष पीछे धकेल देती है।

हाल ही में जमुई के एक स्थानीय निवासी का साक्षात्कार सुना। उनका कहना था कि इस वारदात के बाद उन्होंने अपनी नातिन की पढ़ाई बंद करवा दी है। उनका तर्क था कि इलाक़े में ऐसी घटनाएँ बढ़ रही हैं और वे अपनी बच्ची की सुरक्षा को लेकर कोई जोखिम नहीं उठा सकते। यह निर्णय एक परिवार की विवशता हो सकता है, लेकिन इसके पीछे छिपे सवाल को नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अपराधियों पर कार्रवाई अपनी जगह है, मगर इस एक घटना के ख़ौफ़ से जिन मासूम बच्चियों की पढ़ाई छूट गई, क्या वे फिर कभी सहज होकर स्कूल या कॉलेज जा पाएँगी?

वारदात एक जगह होती है, लेकिन उसकी मार न जाने कितनी लड़कियों पर पाबंदियों के रूप में पड़ती है। कोई कोचिंग जा रही थी, कोई कॉलेज में पढ़ रही थी, तो कोई बाहर काम करके अपने परिवार का सहारा बन रही थी। एक घटना ने इन सबकी सामान्य दिनचर्या और भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। विडंबना यह है कि अपराध कोई और करता है; लेकिन उसकी अघोषित सजा अक्सर उन लड़कियों को भुगतनी पड़ती है, जिनका उस अपराध से कोई लेना-देना नहीं।

सुरक्षा को लेकर चिंतित अभिभावकों का सवाल भी अपनी जगह जायज़ है, आख़िर उनकी बेटियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी कौन लेगा? लेकिन इस सवाल का जवाब लड़कियों की आवाजाही सीमित करने, उनकी पढ़ाई रोकने या उन्हें घर में क़ैद करने के रूप में नहीं दिया जा सकता।

यह विवशता केवल जमुई जैसे छोटे क़स्बों तक सीमित नहीं है। देश की राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित लेडी श्रीराम कॉलेज ने भी कालकाजी मंदिर के निकट हुई दुष्कर्म की घटना के बाद छात्राओं की सुरक्षा के मद्देनज़र कक्षाएँ ऑनलाइन कर उन्हें घरों में रहने की सलाह दी थी। परिस्थितियाँ ऐसी हों कि किसी संस्थान को छात्राओं की सुरक्षा के लिए ऐसा अस्थायी क़दम उठाना पड़े, तो चिंता स्वाभाविक है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह स्थायी समाधान हो सकता है?

जमुई से दिल्ली तक एक बात समान दिखाई देती है—अपराध और अपराधियों पर लगाम लगाने की ज़रूरत है, पर कई बार उसका तात्कालिक असर लड़कियों की स्वतंत्रता पर पाबंदियों के रूप में सामने आता है। कक्षाएँ आख़िर कितने दिन ऑनलाइन चल सकती हैं? रास्ते बदल देने से आख़िर कब तक रास्ते सुरक्षित रहेंगे? क्या घर से बाहर निकलना बंद कर देना ही महिला सुरक्षा का समाधान है?

अपराधियों के मन में क़ानून का भय पैदा करने के बजाय यदि हम संभावित पीड़ितों की ही आवाजाही सीमित करते रहेंगे, तो एक सभ्य समाज के रूप में हम किस दिशा में जा रहे हैं?

किसी भी बड़े अपराध की ज़मीन अक्सर उन छोटी-छोटी घटनाओं से तैयार होती है, जिन्हें समाज समय रहते गंभीरता से नहीं लेता। जमुई की घटना के संदर्भ में भी सामने आया कि आरोपित लड़कों द्वारा राह चलती लड़कियों के साथ पहले से छेड़छाड़ किए जाने की शिकायतें थीं। यदि ऐसी शिकायतों पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई हो, तो कई घटनाओं को गंभीर अपराध में बदलने से पहले रोका जा सकता है।

यही वह जगह है जहाँ समाज और प्रशासन, दोनों की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है। गली-मोहल्लों और चौराहों पर खड़े असामाजिक तत्त्वों से कोई अकेला व्यक्ति हमेशा नहीं लड़ सकता। लेकिन समाज की सामूहिक चुप्पी उन्हें यह संदेश जरूर देती है कि उनके व्यवहार को चुनौती देने वाला कोई नहीं है। हम अक्सर तब जागते हैं, जब आँच अपने घर की बहू-बेटी तक पहुँच जाती है। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

जब कोई लड़की घर आकर छेड़छाड़ की शिकायत करती है, तो उसे ही अक्सर ‘रास्ता बदलने’, ‘समय देखकर निकलने’ या ‘सावधान रहने’ की सलाह दी जाती है। लेकिन उन लड़कों का रास्ता रोकने की कोशिश कितनी बार होती है, जो सार्वजनिक जगहों को लड़कियों के लिए असुरक्षित बनाते हैं? सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लड़की के व्यवहार पर डाल देने से अपराधी के लिए रास्ता और आसान हो जाता है।

यह भी समझना होगा कि बलात्कार जैसी घटनाएँ अपराधियों की विकृत और कुत्सित मानसिकता तथा शक्ति और नियंत्रण की प्रवृत्ति से जुड़ी होती हैं। इसका किसी लड़की के पहनावे, उसकी उम्र या दिन-रात के समय को दोष देने वाले तर्कों से कोई समाधान नहीं निकलता। ऐसे तर्क पीड़िता को ही कटघरे में खड़ा करते हैं और अपराध की ज़िम्मेदारी को अपराधी से हटाकर उसके ऊपर डाल देते हैं। यह रवैया बदलना होगा।

लड़कियों का बाहर निकलना बंद करा देना, ऑनलाइन पढ़ाई शुरू कर देना या उन्हें रास्ता बदलने की सलाह देना इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। बेटियों को केवल डरना नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना और अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना भी सिखाना होगा। साथ ही यह ज़िम्मेदारी केवल लड़कियों की नहीं, पूरे समाज की है।

जब दसवीं कक्षा के दो बच्चे आठ-दस उपद्रवियों के सामने डटकर खड़े होने का साहस दिखा सकते हैं, तो पूरा समाज इतना असहाय क्यों बना रहे? सवाल सिर्फ़ साहस का नहीं, सामूहिक ज़िम्मेदारी का भी है। यदि किसी लड़की के साथ सड़क पर छेड़छाड़ होती है और आस-पास खड़े लोग तमाशबीन बने रहते हैं; तो अपराध केवल उस लड़की के साथ नहीं होता, सार्वजनिक स्थान पर बराबरी से जीने के उसके अधिकार के साथ भी होता है।

आज दिल्ली समेत देश के तमाम शहरों में बेटियाँ सड़कों पर उतरकर अपनी सुरक्षा की माँग कर रही हैं। उनकी माँग कोई विशेषाधिकार नहीं है। वे सिर्फ़ इतना चाहती हैं कि वे बिना डर के स्कूल जा सकें, कॉलेज जा सकें, काम पर जा सकें और अपने जीवन के फ़ैसले ख़ुद ले सकें।

वर्षों तक चलने वाले मुक़दमे, न्याय मिलने में होने वाली देरी और कुछ मामलों में आरोपितों के बरी हो जाने जैसी स्थितियाँ लोगों के भरोसे को प्रभावित करती हैं। न्याय-व्यवस्था की अपनी जटिलताएँ हैं, लेकिन महिला सुरक्षा के सवाल पर यह ज़रूरी है कि शिकायत से लेकर जाँच, अभियोजन और न्याय तक पूरी प्रक्रिया प्रभावी और विश्वसनीय हो। अपराधी को यह स्पष्ट संदेश मिलना चाहिए कि क़ानून केवल किताब में मौजूद व्यवस्था नहीं, बल्कि वास्तविक सुरक्षा देने वाली संस्था है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि हम कब तक स्त्री की अस्मिता पर होने वाले हमलों को अलग-अलग घटनाओं की तरह देखते रहेंगे? हर घटना के बाद कुछ दिनों का आक्रोश, कुछ गिरफ़्तारियाँ, कुछ प्रदर्शन और फिर वही सामान्य जीवन—क्या इतना ही काफ़ी है?

अब समय आ गया है कि समाज के तौर पर हम अपनी प्राथमिकताएँ बदलें। किसी बड़ी अनहोनी का इंतज़ार करने के बजाय छेड़छाड़ और उत्पीड़न जैसी शुरुआती घटनाओं को ही गंभीरता से लें। असामाजिक तत्त्वों के ख़िलाफ़ सामूहिक रूप से आवाज़ उठाएँ, शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई की माँग करें और प्रशासन को जवाबदेह बनाएँ।

सुरक्षा के नाम पर लड़कियों की स्वतंत्रता पर बंदिशें लगाना बंद होना चाहिए। अपराधी को अपना व्यवहार बदलना होगा, व्यवस्था को अपनी ज़िम्मेदारी निभानी होगी और समाज को अपनी चुप्पी तोड़नी होगी... क्योंकि डर के साये में सिमट जाना ज़िंदगी नहीं है। सुरक्षित होकर, स्वतंत्र होकर और बिना भय के जी पाना हर लड़की का अधिकार है।

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