वात्स्यायन का परिचय
भारत के प्रसिद्ध दार्शनिक और आचार्य, ‘कामसूत्रम्’ के रचयिता वातस्यायन का जन्म, सामान्यतः ईसा की दूसरी से चौथी शताब्दी के बीच माना गया है। हालाँकि इस संबंध में अनेक भ्रांतियाँ हैं। हेमचंद्र के अभिधानचिंतामणि में वात्स्यायन के अनेक नामों का उल्लेख है। उनके अनुसार वात्स्यायन, पक्षिलस्वामी, विष्णुगुप्त, कौटिल्य और चाणक्य एक ही व्यक्ति हैं और न्यायभाष्य, अर्थशास्त्र और कामसूत्र तीनों के रचयिता वात्स्यायन मुनि ही है। सुबंधु के अनुसार कामसूत्र के रचयिता का नाम मल्लनाग था। यशोधर की कामसुत्र की टीका जयमङ्गला में वात्स्यायन का वास्तविक नाम मल्लनाग कहा गया है। (तमुपायमाचिख्यासुराचार्यमल्लनागः पूर्वाचार्यमतानुसारेण शास्त्रमिदं प्रणीतवान्)। आचार्य सूर्यनारायण व्यास ने भी न्यायभाष्यकर्ता वात्स्यायन और कामसूत्रकार वात्स्यायन को एक ही व्यक्ति माना है।
वात्स्यायन की स्थिति-काल के संबंध में विद्वानों में मतभेद पाया जाता है। म.म. हरप्रसाद शास्त्री ने वात्स्यायन का समय इसा की प्रथम शताब्दी माना है। डॉ. कीथ इनका समय ई.पू. पंचम शताब्दी मानते हैं, किंतु विंटरनिट्ज ने भाषा प्रयोग के आधार पर वात्स्यायन का समय ई.पू. चतुर्थ शताब्दी माना है। श्रीसूर्यनारायण व्यास ने कालिदास और वात्स्यायन की तुलना करते हुए, वात्स्यायन का समय ई.पू. प्रथम शताब्दी माना है। एक अन्य मतानुसार कहा जाता है कि कामसूत्र में कुंतल शातकर्णी शालिवाहन का उल्लेख है। मत्स्यपुराण के अनुसार शातकर्णी का समय ई.पू.615 माना जाता है, अतः वात्स्यायन का समय उससे कुछ पहले—ई.पू सप्तम शताब्दी माना जा सकता है।
यदि न्यायभाष्यकर्ता और कामसूत्रप्रणेता वात्स्यायन को एक ही व्यक्ति माना जाता है, तो वात्स्यायन का समय चतुर्थ शताब्दी माना जा सकता है। वात्स्यायन ने अपने भाष्य में पतंजलि और कौटिल्य के अर्थशास्त्र का उद्धरण प्रस्तुत किया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने भाष्य में नागार्जुन के आक्षेपों का उत्तर भी दिया है, अतः वात्स्यायन, पतंजलि एवं नागार्जुन के बाद हुए होंगे। इसके अतिरिक्त दिङ्नाग ने वात्स्यायन के अनेक मतों का खंडन किया है। दिङ्नाग का समय पंचम शताब्दी माना जाता है, अतः वात्स्यायन पंचम शताब्दी के बाद नहीं हो सकते। इसके अतिरिक्त उन्होंने वसुबंधु का उल्लेख नहीं किया है, अतः वात्स्यायन का समय चतुर्थ शताब्दी मानना युक्तिसंगत प्रतीत होता है। डॉ. तूर्क ने भी इनका समय चतुर्थ शताब्दी माना है। कामसूत्र में आभीरों के समान आन्ध्रों का सामान्य शासक के रूप में वर्णन है। तृतीय शताब्दी में आन्ध्रों का राज्य नष्ट हो गया था, अतः कामसूत्र का समय चतुर्थ शताब्दी मानने में कोई आपत्ति नहीं प्रतीत होती।
पंचतंत्र के रचयिता विष्णुशर्मा ने पंचतंत्र में कामशास्त्र के रचयिता के रूप में वात्स्यायन का उल्लेख किया है। उन्होंने पंचतंत्र के आरम्भ में कहा है कि मनु ने धर्मशास्त्र, चाणक्य ने अर्थशास्त्र तथा वात्स्यायन ने कामसूत्र में धर्म, अर्थ, काम—त्रिवर्ग का प्रतिपादन किया है। इससे प्रतीत होता है कि चाणक्य और विष्णुशर्मा अलग-अलग व्यक्ति हैं (ततो धर्मशास्त्राणि मन्वादीनि, अर्थशास्त्राणि चाणक्यादीनि, कामशास्त्राणि वात्स्यायनादीनि एवं च ततो धर्मार्थकामशास्त्राणि ज्ञायन्ते)। पंचतंत्र का समय 300 ई० माना जाता है, अतः वात्स्यायन का समय 300 ई० के पहले का होना चाहिए।
कामसूत्र का प्रयोजन त्रिवर्ग-साधन है। आचार्य वात्स्यायन ने सृष्टि, स्थिति और विनाश के कारणभूत धर्म, अर्थ और काम को नमस्कार किया है। विश्व के समस्त क्रिया-कलाप धर्म, अर्थ और काम इस त्रिवर्ग पर आधारित हैं। उन्होंने यह बताया है कि जीवनसिद्धि एवं लोकाभ्युदय के लिए शास्त्रविहित विधियों के अनुसार धर्म, अर्थ, काम त्रिवर्ग का संचय, संग्रह और उपभोग इस प्रकार करना चाहिए, जिससे वे एक-दूसरे के बाधक न हो। आचार्य वात्स्यायन का कहना है कि ‘धर्म परमार्थ का साधन है और धर्म का बोधक शास्त्र धर्मशास्त्र है। अर्थसिद्धि के लिए तरह-तरह के उपाय करने पड़ते हैं। उन उपायों का प्रतिपादक शास्त्र अर्थशास्त्र है। संभोग-सुख प्राप्त करने के लिए कामशास्त्र के ज्ञान की आवश्यकता है। इन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तथा लोक-जीवन को सुव्यवस्थित एवं सुखमय बनाने तथा जीवन का लक्ष्य निर्धारित करने के लिए ब्रह्मा ने धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और कामशास्त्र—तीन शास्त्रों का प्रतिपादन किया। इनमें धर्मशास्त्र में धर्म का विवेचन, अर्थशास्त्र में अर्थ का विवेचन और कामशास्त्र में काम का विवेचन किया गया है।’
धर्म, अर्थ, काम इस त्रिवर्ग में काम की प्रधानता है, क्योंकि यह समस्त प्राणिवर्ग संवेद्य तथा लोकस्पृहणीय है और यह काम समस्त सृष्टि का बीज है। काम एक मानस क्रिया या मानसिक व्यापार है। काम संकल्पयोनि एवं रागात्मिका वृत्ति का कारण है, काम एक कला है, पुरुषार्थ है। कला के रूप में वह लोकसंपूजित है। मन्मथ, मदन, कंदर्प, मार, पंचसायक, कुसुमसायक, काम, अनंग आदि काम के अनेक नाम हैं।