कामकला पर कविताएँ
भारतीय चिंतन-परंपरा
में संस्कृति का मूलाधार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—पुरुषार्थचतुष्टय है। इनमें काम को जीवन की परिधि में केवल विषय-भोग ही नहीं, बल्कि अन्य जीवनोपयोगी ज्ञान की तरह मानव-अस्तित्व का एक मूर्धन्य और सृजनात्मक हेतु माना गया है। आचार्य वात्स्यायन ने ‘कामसूत्रम्’ में उपायभूत चौंसठ कलाओं का सुचिंतित एवं व्यवस्थित विवेचन प्रस्तुत किया है। ‘कामकला’ के अंतर्गत मानव जीवन से संबद्ध विविध प्रसंगों, व्यवहारों और क्रियाकलापों का वर्णन तथा उनकी परंपरा समाहित है।