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दहेज़ पर उद्धरण

विदेशी लोग हमारे समाज के विषय में; अन्य देशों में भ्रमपूर्ण बातें फैलाकर हमें असभ्य, जंगली बतलाते रहे हैं, और हमारा उनके प्रति रोष भी सर्वथा उचित ही रहा है। पर एक बात में तो हम पूर्व ऐतिहासिक काल के उस जंगली को भी मात करते हैं और आज के अफ़्रीक़ा के वनभाग के हब्शी को भी मात करते हैं—और वह बात यह है कि हममें अभी भी मनुष्य का क्रय-विक्रय होता है और वह कानूनी भी माना जाता है।

हरिशंकर परसाई

हर क्षेत्र में जब हराम का पैसा न्यायपूर्ण अधिकार हो गया है, तो विवाह के मामले में भी बिना कमाया यह हराम का दहेज़ लिया जाता है। यह अभी चलेगा, यह पूँजीवाद की एक रस्म है।

हरिशंकर परसाई

सामंतवाद में वधू के घर की जो लूट थी, वह पूँजीवाद में दहेज़ हो गई।

हरिशंकर परसाई

हमारे यहाँ लड़के का बाप दाँत निपोरकर, बेशर्मी का संकोच करते हुए लड़की के बाप से कहता है, 'कौन हम माँगते हैं आपसे, जो देंगे अपनी लड़की को ही तो देंगे। हम भी आधुनिक विचारों के हैं। हम भी प्रगतिशील हैं। मगर धर्म थोड़े ही छोड़ा जाता है, बाप-दादों की रीति है।'

हरिशंकर परसाई