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तेनालीराम का न्याय

tenaliram ka nyaay

तेनालीराम

तेनालीराम

तेनालीराम का न्याय

तेनालीराम

और अधिकतेनालीराम

    एक बार नामदेव नामक एक व्यक्ति दरबार में आया और फ़रियाद की—“अन्नदाता! मुझे न्याय चाहिए अन्नदाता-मेरे मालिक ने मेरे साथ विश्वासघात किया है।” “पहले तुम अपना परिचय दो और फिर बताओ कि क्या बात है।” महाराज ने कहा।

    “मेरा नाम नामदेव है अन्नदाता—परसों सुबह मेरा मालिक अपने किसी काम से हवेली से निकला, चूँकि धूप बहुत तेज़ थी, इसलिए उसने कहा कि मैं छतरी लेकर उसके साथ चलूँ। हम दोनों अभी पंचमुखी शिव मंदिर तक ही पहुँचे थे कि धूल भरी तेज़ आधी चलने लगी।

    हवा इतनी तेज़ थी कि छतरी तक सँभालना भारी पड़ रहा था। मैंने मालिक से प्रार्थना की कि हम मंदिर के पिछवाड़े सायबान के नीचे रुक जाएँ। मालिक ने मेरी बात मान ली और हम मंदिर के पिछवाड़े सायबान के नीचे जाकर खड़े हो गए।

    “फिर—।” “फिर महाराज, अचानक मेरी नज़र सायबान के कोने में पड़ी लाल रंग की एक थैली पर पड़ी। मालिक से अनुमति लेकर मैंने उस पोटली को उठा लिया। खोला तो उसमें बेर के आकार के दो हीरे थे। महाराज! उन हीरों से हम दोनों की आँखें चुंधिया गई। हालाँकि मंदिर में पाए जाने के कारण उन हीरों पर राज्य का अधिकार था किंतु मेरे मालिक ने कहा कि नामदेव! तुम ज़ुबान बंद रखने का वादा करो तो ये हीरे हम आपस में बाँट लें।

    झूठ नहीं बोलूँगा महाराज! मेरे मन में भी लालच गया और मैंने मालिक की बात मान ली। मैं तो अपने ही मालिक की ग़ुलामी से तंग चुका था, इसलिए सोचा कि उस हीरे को बेचकर कोई काम-धंधा कर लूँगा।

    मगर हवेली लौटकर मालिक ने मुझे मेरा हिस्सा देने से इंकार कर दिया। मैं दो दिन तक उसे समझाता-बुझाता रहा, मगर वह टस से मस हुआ, इसीलिए मुझे आपकी शरण में आना पड़ा है। हे महामहिम! आप तो साक्षात् धर्मराज हैं, अब आप ही मेरा न्याय कीजिए।”

    सम्राट कृष्णदेव राय ने तुरंत नामदेव के मालिक को दरबार में बुलवाया और पूछताछ की तो मालिक बोला : “महाराज! ये नामदेव एक नंबर का बदमाश है, मक्कार है। महाराज! मेरे पास ईश्वर का दिया सब कुछ है।

    मैंने हीरे इसे देकर कहा कि जाओ, यह राज्य की संपत्ति है, इसे राजकोष में जमा करवा आओ, ये दोनों हीरे लेकर चला गया, फिर दो दिन बाद मैंने इससे रसीद माँगी तो ये आनाकानी करने लगा और मेरे धमकाने पर यहाँ चला आया—अब आपको इसने मालूम नहीं क्या कहानी गढ़कर सुनाई होगी।

    हूँ। महाराज ने गहरी नज़रों से देखा—“क्या तुम सच कह रहे हो?” “सोलह आने सच महाराज। क्या वे हीरे तुमने इसे किसी के सामने दिए थे।” “मेरे तीन नौकर इस बात के गवाह हैं। गवाहों को पेश किया गया तो उन्होंने साफ़-साफ़ स्वीकार किया कि मालिक ने हमारे सामने नामदेव को हीरे दिए थे।

    फिर महाराज ने उन सभी को वहाँ बैठने का आदेश दिया और स्वयं महामंत्री, सेनापति और तेनालीराम आदि के साथ विश्रामकक्ष में चले गए। आपकी इस मामले में क्या राय है मंत्री जी?” “मुझे तो नामदेव झूठ बोलता लग रहा है महाराज! “किंतु हमें वो सच बोलता लग रहा है।

    “मगर गवाहों पर भी ग़ौर करें महाराज गवाहों को कैसे झुठलाया जा सकता है। महाराज ने तेनालीराम की तरफ देखा : “तुम क्या कहते हो तेनालीराम जी?

    महाराज! आप सब लोग उस पर्दे के पीछे बैठ जाएँ तो राय दूँ।

    तेनालीराम की बात सुनकर महामंत्री और सेनापति दाँत पीसने लगे, किंतु महाराज को चुपचाप उठकर पर्दे के पीछे जाते देखकर उन्हें भी जाना पड़ा। अब एकांत पाकर तेनालीराम ने पहले गवाह को बुलाया— “नामदेव को तुम्हारे मालिक ने हीरे तुम्हारे सामने दिए थे?

    जी हाँ। हीरे कैसे थे, किस रंग के थे और उनका आकार कैसा था चित्र बनाकर समझाओ। तेनालीराम ने कागज कलम उसके सामने सरकाया तो वह सिटपिटा गया : “हीरे लाल थैली में बंद थे, मैंने देखे नहीं थे।” “ठीक है, ख़ामोशी से वहाँ खड़े हो जाओ।” कहकर तेनालीराम ने दूसरे गवाह को बुलाया और उससे भी वैसे ही सवाल पूछे और चित्र बनाने के लिए कहा। दूसरे गवाह ने उल्टी-सीधी दो आकृतियाँ बनाकर रंग आदि बता दिए।

    फिर उसने तीसरे को बुलाया तो उसने कहा : “हीरे भोजपत्र के काग़ज़ में लिपटे थे। आकृति और रंग तो मालूम नहीं।” सभी गवाहों ने एक-दूसरे के सामने उत्तर दिए थे। अब उनके दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहे थे। तभी महाराज पर्दे के पीछे से निकले और क्रोधपूर्ण नज़रों से उन्हें घूरने लगे।

    तीनों यह सोचकर काँप उठे कि उनका झूठ पकड़ा जा चुका है। इससे पहले कि महाराज कोई कठोर आज्ञा देते कि उन्होंने लपककर उनके पाँव पकड़ लिए और गिड़गिड़ाते हुए बोले : हमें क्षमा कर दें महाराज! हम झूठी गवाही देने पर मजबूर थे। यदि हम ऐसा करते तो वह मक्कार हमें नौकरी से निकाल देता।”

    अब सब कुछ साफ़ हो गया था। महाराज दरबार में गए। सिर झुकाए तीनों गवाह भी उनके पीछे-पीछे थे। नामदेव के मालिक के देवता कूच कर गए। महाराज ने आदेश दिया : इस धूर्त को गिरफ़्तार करके इसके घर की तलाशी ली जाए।

    हीरे बरामद हो गए। वे बड़े क़ीमती हीरे थे। महाराज ने हीरे तो जप्त किए ही, मालिक से दंड स्वरूप दस हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ नामदेव को दिलवाई तथा बीस हज़ार स्वर्ण मुद्राओं का ज़ुर्माना भी मालिक पर किया। ख़ुशी के मारे नामदेव दरबार में ही महाराज और तेनालीराम के जयकारे लगाने लगा। वास्तव में ही यह सब तेनालीराम की बुद्धि का कमाल था।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चर्चित एवं लोकप्रिय कहानियाँ “तेनालीराम” (पृष्ठ 26)
    • रचनाकार : तेनालीराम
    • प्रकाशन : प्रशांत बुक डिस्ट्रीब्यूटर
    • संस्करण : 2018

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