तेनालीराम की कहानियाँ
बहुभाषी विद्वान
यह बात उन दिनों की है जब राजा कृष्णदेव राय के दरबार में रहते तेनालीराम को काफ़ी अर्सा गुज़र चुका था और उनकी विद्वता की कहानियाँ दूर-दूर तक फैल चुकी थीं। एक दिन की बात है कि राजा कृष्णदेव राय के दरबार में एक अत्यंत विद्वान ब्राह्मण आया। उसने महाराज
पौधों की जड़ें
तेनालीराम की पत्नी को गुलाब के बड़े-बड़े फूलों को जूड़े में लगाने का बेहद शौक़ था। उसकी जड़ के प्यूल केवल राज उद्यान में ही थे। अतः वह बेटे को वहाँ भेजकर चोरी से एक फूल रोज़ तुड़वा लेती थीं। तेनालीराम से जलने वालों को जब यह पता चला तो उन्होंने तेनालीराम
मक्खीचूस सेठ
राजा कृष्णदेव राय के राज्य में एक कंजूस सेठ रहता था। उसके पास धन की कोई कमी न थी, पर एक पैसा भी जेब से निकालते समय उसे बड़ा कष्ट होता था। एक बार उसके कुछ मित्रों ने उसे हँसी-हँसी में एक कलाकार से अपना चित्र बनवाने के लिए राज़ी कर लिया, उनके सामने
महाराज की शर्त
महाराज कृष्णदेव राय कई बार अपने दरबारियों की विलक्षण परीक्षाएँ लिया करते थे। ऐसे ही उन्होंने एक दिन भरे दरबार में सभी छोटे-बड़े दरबारियों को हज़ार-हज़ार अशर्फ़ियों से भरी एक-एक थैली दी, फिर बोले : "आप सबको एक सप्ताह का समय दिया जाता है। सप्ताह भर
संदेह
यह बात उन दिनों की है जब राजा कृष्णदेव राय उन दिनों, रायचूर, बीजापुर और गुलबर्गा पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने अपने राज्यपालों से कहा कि वे सेना के लिए आदमी और धन इकट्ठा कर भेजें ताकि शत्रु का सिर पूरी तरह कुचल दिया जाए। एक पड़ोसी राजा
मनुष्य का स्वभाव
एक दिन महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में इस बात पर बहस चल पड़ी कि मनुष्य का स्वभाव बदला जा सकता है या नहीं? इस बात को लेकर पूरा दरबार दो भागों में बँट गया था। एक दल का कहना था कि स्वभाव बदला जा सकता है, दूसरे का कहना था कि नहीं बदला जा सकता। दूसरे
भगवान का संदेश
एक बार महाराज कृष्णदेव राय के मन में एक विशाल शिवालय बनवाने की इच्छा उपजी। उन्होंने मंत्री को बुलाकर आदेश दिया कि शिवालय के लिए कोई उपयुक्त स्थान खोजा जाए। इसके लिए मंत्री ने नगर के समीपवर्ती जंगल के एक भूखंड को चुना। तुरंत ही उस स्थान की सफ़ाई का
तेनाली की आत्मा
एक बार किसी बात से रुष्ट होकर महाराज कृष्णदेव राय ने तेनालीराम को मृत्युदंड दे दिया यह समाचार आग की तरह पूरे नगर में फैल गया। जिस दिन यह समाचार फैला, उसी दिन से तेनालीराम लोगों को दिखाई देने बंद हो गए। तभी लोगों की ऐसी धस पेड़ के नीचे की जानी निश्चित
तपस्या का सच
विजयनगर राज्य में बड़ी ज़ोरदार ठंड पड़ रही थी। राजा कृष्णदेव राय के दरबार में इस ठंड की बहुत चर्चा हुई। पुरोहित ने महाराज को। पुरोहित ने महाराज को सुझाया। 'महाराज, यदि इन दिनों यज्ञ किया जाए तो उसका फल उत्तम होगा। दूर-दूर तक उठता यज्ञ का धुआँ सारे वातावरण
क़र्ज़ का बोझ
एक बार तेनालीराम की पत्नी बीमार पड़ गई तो तेनालीराम को उसके इलाज के लिए महाराज से हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ उधार लेनी पड़ी। ख़ैर, उचित देखभाल और इलाज से उसकी पत्नी ठीक हो गई। एक दिन महाराज ने तेनालीराम से कहा—"तेनालीराम! अब हमारा क़र्ज़ा चुकाओ।" तेनालीराम
तेनालीराम का न्याय
एक बार नामदेव नामक एक व्यक्ति दरबार में आया और फ़रियाद की—“अन्नदाता! मुझे न्याय चाहिए अन्नदाता-मेरे मालिक ने मेरे साथ विश्वासघात किया है।” “पहले तुम अपना परिचय दो और फिर बताओ कि क्या बात है।” महाराज ने कहा। “मेरा नाम नामदेव है अन्नदाता—परसों सुबह
अपराधी बकरी
एक बार महाराज कृष्णदेव राय ने अपनी कश्मीर यात्रा के दौरान सुनहरी फूलवाला एक पौधा देखा। वह फूल उन्हें इतना पसंद आया कि लौटते समय उसका एक पौधा वह अपने बग़ीचे के लिए भी ले आए। विजय नगर वापस आकर उन्होंने माली को बुलाया और सुनहरे फूल वाला पौधा उसे सौंपकर
रंग-बिरंगी मिठाइयाँ
बसंत् ऋतु छाई हुई थी। राजा कृष्णदेव राय बहुत ही प्रसन्न थे। वे तेनाली राम के साथ बाग़ में टहल रहे थे। वे चाह रहे थे कि एक ऐसा उत्सव मनाया जाए जिसमें उनके राज्य के सारे लोग सम्मिलित हों। पूरा राज्य उत्सव के साथ आनंद में डूब जाए। इस विषय में वह तेनाली
अनमोल सुझाव
एक बार महाराज कृष्णदेव के दरबार में दो व्यक्ति आए। उनमें से एक के हाथ में सोने का एक हंस था। आते ही वे बोले—“महाराज! हमारा न्याय करें।” “कैसा न्याय?” महाराज ने चौंककर पूछा—“आख़िर बात क्या है—क्या इस स्वर्ण हंस को लेकर तुम दोनों में कोई झगड़ा है।" "झगड़ा
पुरस्कार के अधिकारी
विजय नगर की राजधानी में अनेक रामलीलाएँ होती थीं। रामलीलाओं का मौसम आते ही कलाकारों की मंडलियाँ सक्रिय हो उठती। जगह-जगह मंच बन जाते और कलाकार अभ्यास करने लगते। कहीं रामजी की सवारी निकालने की तैयारी होती, तो कहीं श्रवण कुमार-दशरथ नाटक मंचन की तैयारी।
तेनाली की ईमानदारी
तेनालीराम के व्यवहार की शिकायत लेकर कुछ ब्राह्मण राजगुरु के पास पहुँचे। इनमें अधिकांश ब्राह्मण वही थे जिन्हें तेनालीराम सबक सिखा चुका था। राजगुरु तो पहले ही तेनालीराम से जला बैठा था और बदला लेने की ताक में था, क्योंकि उसकी वजह से राजगुरु को कई बार नीचा
संतुष्ट व्यक्ति के लिए उपहार
एक दिन तेनाली राम बड़ी प्रसन्न मुद्रा में दरबार में आया। उसने बहुत अच्छे कपड़े और गहने पहन रखे थे। उसे देखकर राजा कृष्णदेव राय बोले, “तेनाली, आज तुम बहुत प्रसन्न दिखाई दे रहे हो। क्या बात है?" "महाराज कोई खास बात नहीं है।" तेनाली राम प्यार से बोला। "नहीं
सबसे बड़ी कमी
एक बार महाराज कृष्णदेव राय को न जाने क्या सूझा कि उन्होंने विजय नगर को सजाने-सँवारने का हुक्म दिया। वह विजय नगर को सुंदरता और स्वच्छता में बेजोड़ देखना चाहते थे। अतः उन्होंने प्रधानमंत्री को बुलाकर अपनी इच्छा से अवगत कराया तथा आवश्यक निर्देश भी दिए। “मंत्री
मूर्खों का साथ हमेशा दुखदायी
विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय जहाँ कहीं भी जाते, जब भी जाते, अपने साथ हमेशा तेनालीराम को ज़रूर ले जाते थे। इस बात से अन्य दरबारियों को बड़ी चिढ़ होती थी। एक दिन तीन-चार दरबारियों ने मिलकर एकांत में महाराज से प्रार्थना की, 'महाराज, कभी अपने साथ किसी अन्य
तेनालीराम व सोने के आम
महाराज कृष्णदेव राय की माँ की बरसी थी। महाराज की माँ को आम खाना बहुत पसंद था। बरसी के दिन महाराज ने अपने दरबार के पुरोहितों के सामने इच्छा ज़ाहिर की कि उन्हें अपनी माँ की आत्मा की शांति के लिए क्या करना चाहिए। सभी पुरोहितों को ये अच्छा मौक़ा लगा धन बटोरने
परीक्षा
मुग़ल बादशाह ने अपने दरबारियों से तेनालीराम की बहुत प्रशंसा सुनी थी। एक दरबारी ने कहा, "आलमपनाह, सुनने में आया है कि तेनालीराम की हाजिर-जवाबी और अक्लमंदी बेमिसाल है।" बादशाह इस बात की सत्यता परखना चाहता था। उसने राजा कृष्णदेव राय को एक मित्रतापूर्ण
मनहूस और महा मनहूस
सुखदेव नामक एक व्यक्ति को लेकर पूरे विजय नगर में यह बात प्रसिद्ध थी कि सुबह-सुबह जो भी उसकी सूरत देख लेता है, उसे पूरे दिन अन्न नसीब नहीं होता। उड़ती-उड़ती यह बात महाराज कृष्णदेव राय के कानों तक भी पहुँची। तब महाराज ने सोचा कि इस बात की जाँच करनी
अपमान का बदला
बात उन दिनों की है जब तेनालीराम का विजय नगर के राजदरबार से कोई लेना-देना नहीं था। उन दिनों वे सोचा करते थे कि किसी प्रकार महाराज तक अपनी पहुँचे बनाई जाए। मगर ये आसान नहीं था। इसी अभिलाषा को लेकर उन्होंने राज-गुरु तक अपनी पहुँचे बनाई और उनकी बहुत सेवा