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कार्लो हब्शी का संदूक़

karlo habshi ka sanduq

रमाकांत

रमाकांत

कार्लो हब्शी का संदूक़

रमाकांत

और अधिकरमाकांत

    कार्ल नेल्सन को हम कार्लो कहा करते और लगभग भारतीय ढंग के इस संबोधन से वह ख़ुश होता।

    'हम तुम्हें कार्लो भी कह सकते हैं, जो पहाड़ों से बना एक बौद्ध मंदिर है। या तुम्हें काली भी कहा जा सकता है, जो हमारी एक देवी का नाम है। कालु या काले तो हमारे यहाँ बहुत होते हैं...'

    कार्ल और ज़ोर से हँस पड़ता।

    'तुम यह भी कह सकते हो। अगर तुम्हारे देवी-देवता नाराज़ हों तो तुम जो चाहो कह सकते हो। वैसे मैंने सुना है, तुम्हारे ज़्यादातर देवता काले थे...'

    वह नेटाल से हिंदुस्तान पढ़ने आया था। दक्षिण अफ़्रीका की गोरी सरकार उसे इसकी इजाज़त देती, लेकिन वह जोहान्सबर्ग या डरबन के विश्वविद्यालयों में भी नहीं पढ़ सकता था क्योंकि वहाँ कार्लो को प्रवेश नहीं मिल सकता। वह सिर्फ़ उन कॉलेजों में पढ़ सकता था जहाँ कार्लो को कुछ सीमित विषयों में ही शिक्षा दी जाती थी। वहाँ वे अपनी जाति का इतिहास नहीं पढ़ सकते थे, क्योंकि उन कॉलेजों के पाठ्यक्रम भी गोरी सरकार के नुमाइंदे ही तय किया करते थे। इसलिए वह भागकर अपने माँ-बाप के मूल देश नाइजीरिया पहुँचा जो अब आज़ाद हो चुका था और वहाँ से नाइजीरिया के नागरिक की हैसियत से सरकारी छात्रवृत्ति पर भारत आया था।

    विश्वविद्यालय कैंटीन में मुझे जिस मेज़ पर जगह मिली उस पर कार्ल नेल्सन पहले से बैठा था। उसके सामने एक गिलास पानी रखा था।

    अचानक, शायद कार्ल का गिलास सामने देखकर मुझे तेज़ प्यास लग आई।

    क्या मैं यह पानी पी सकता हूँ? मैंने पूछा।

    उसने सलाम करने के अंदाज़ में हथेली माथे से लगाई।

    श्योर श्योर।

    मैं गिलास उठाकर गटागट पानी पी गया। फिर मेज़ पर गिलास रख, उसे धन्यवाद देना भूलकर बेयरे की तलाश में इधर-उधर नजरें दौड़ाने लगा। अभी प्यास नहीं बुझी थी।

    तुम बहुत प्यासे लग रहे हो।

    हाँ, दौड़कर बस पकड़नी पड़ी थी और बाहर तेज़ गर्मी है। यहाँ अक्टूबर में जाड़ा शुरू हो जाता है, लेकिन अगर तेज़ धूप हो तो सुबह ही गर्मी पड़ने लगती है। बेयरा देर में आएगा?

    हाँ, तीस-चालीस मेज़ों के लिए दो ही आदमी हैं।

    अचानक वह गिलास हाथ में थामकर उठ खड़ा हुआ।

    मैं तुम्हारे लिए पानी ला दूँ।

    यह मैं भी कर सकता हूँ।

    लेट मी सर्व यू। यह मेरे लिए एक सुखद अनुभव होगा। प्लेजर…

    तुम्हें भी तो प्यास लगी होगी?

    हम तुमसे भी गर्म मुल्क के रहने वाले हैं। प्यास झेल सकते हैं। जो नहीं झेल सकते, वह कुछ और है।

    वह गिलास लेकर वाटर कूलर की ओर चला गया।

    यह कार्ल नेल्सन से मेरी पहली मुलाक़ात थी।

    माल स्क्वायर के छोर पर अंतर्राष्ट्रीय छात्रावास था। दिन में वहाँ सूना-सा रहता। शामों को अक्सर शीशेदार स्क्रीन से ढँके पोर्टिको के पीछे बड़े हॉल में काफ़ी लोग दिखाई देते। एक ओर रखी पिंगपांग की लंबी हरी मेज़ का अक्स बाहर फैली हरियाली में जज़्ब होता रहता। मेज़ कभी खिलाड़ियों से ख़ाली रहती। बाहर बैडमिंटन कोर्ट में भी भीड़ होती। कभी-कभी जाज और रॉक के रेकॉर्ड्स तेज़ी से बजते सुनाई देते।

    अब तक मैं उदासीन-सा उधर से गुज़रा करता। अभी कार्लो से परिचय नहीं हुआ था। अब मैं सोचता, इन्हीं में कहीं कार्ल भी होगा। वह कुछ खेलता, किसी से बात करता या अपने कमरे में पढ़ रहा होगा।

    हमारी मुलाक़ात अब भी कभी-कभी कैंटीन में ही हुआ करती। हम अपने-अपने दोस्तों के साथ होते। सामने पड़ने पर हल्की-सी 'हैलो…हाय' के साथ थोड़ी देर बातचीत भी कर लेते। कार्ल के दोस्तों में ज़्यादातर विदेशी छात्र होते। उनमें एक अल्जीरियन लड़की भी थी।

    उस शाम हम फिर अकेले, लेकिन अलग-अलग मेज़ों पर बैठे थे। कार्ल ने मेरी ओर एक-दो बार देखकर नज़रें हटा लीं। मैं उठकर उसकी मेज़ के सामने पहुँच गया।

    दोस्तों का इंतज़ार हो रहा है?

    नहीं, आज मैं अकेला हूँ, उसने कहा, तुम बैठ क्यों नहीं जाते। वे आज अपनी कक्षाओं में हैं या कहीं और गए होंगे। वे होते तब भी तुम हमारे साथ बैठ सकते थे...लेकिन तुम भी आज अकेले ही हो।

    “हाँ। मैं उसके सामने की ख़ाली कुर्सी पर बैठ चुका था। अभी उसने ऑर्डर नहीं दिया था। मैंने भी नहीं।

    हम बेयरे के आने की बाट देखने लगे।

    लेकिन फिर वही लंबा इंतज़ार। बेयरा हमारी ओर मुख़ातिब होता, फिर कुछ देर में आने का इशारा कर ग़ायब हो जाता। भीड़ बढ़ती जा रही थी। साथ ही हमारी बेसब्री थी।

    क्यों तुम मेरे साथ हमारे हॉस्टल चलो। वहाँ एक अच्छी कैंटीन भी है। ज़्यादा भीड़ नहीं होती।” कार्ल ने कहा।

    मैं उठ खड़ा हुआ। लेकिन हम अंतर्राष्ट्रीय छात्रावास की कैंटीन में नहीं बैठे। हम सीधे कार्ल के कमरे में गए। उसने हीटर जलाकर जो चीज़ तैयार की उसका स्वाद कोको की तरह था।

    यह कोको जैसा लगता है।

    उसके भारी होंठ हँसी में फैल गए।

    हँस क्यों रहे हो ?

    तुम बहुत अजीब आदमी हो।

    क्यों?

    तुम जो पी रहे हो वह कोको ही है।

    अब मैं भी हँस पड़ा।

    फिर भी थोड़ा फ़र्क़ है।

    हाँ, बनाने का ढंग हमारा कुछ अलग है।

    तुम लोग चाय नहीं पीते?

    पीते हैं, जब मिलती है। मेरा मतलब है नाइजीरिया में। वहाँ चाय तुम्हारे यहाँ जितनी सस्ती नहीं होती। वहाँ यह लग्जरी है।

    मैं समझता था, तुम अपने यहाँ की कोई ख़ास चीज़ तैयार करोगे। कार्ल उदास हो गया।

    कोको हमारे यहाँ बहुत ज़्यादा होती है, उसी उदासी में कुछ घूँट लेने के बाद उसने कहा, यह हमारे यहाँ का राष्ट्रीय उत्पादन और पेय दोनों ही है।

    लेकिन यह तो नाइजीरियन कोको नहीं है? मैंने मेज़ पर रखी पैकिंग का लेबल देख लिया था। हाँ, नहीं है, लेकिन हो भी सकती है। नाइजीरिया में दुनिया की आधी से ज़्यादा कोको होती है।

    मैं तुम्हें समझ नहीं पा रहा हूँ।

    यह नाइजीरिया की भी हो सकती है और मलाया, जावा या लैटिन अमेरिका के भी किसी देश की...इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। क्योंकि ये हमारे होकर भी हमारे नहीं हैं। इसका लेबल वही होगा, जो है। किसी विदेशी निगम का। क्या तुमने 'क्राइ बिलवेड कंट्री' पढ़ी है? हमारे यहाँ अक़्लमंद लोग अपने बच्चों को सिखाते हैं, अपनी ज़मीन और अपने पहाड़ों को, उनकी ओट में उगते या पीछे छिपते सूरज की ख़ूबसूरती को, उसके बादलों और उसके इंद्रधनुषों को बहुत प्यार मत करो क्योंकि ये तुम्हारे होकर भी तुम्हारे नहीं हैं।

    मुझे दुःख होने लगा। शायद मुझे उसकी दुखती रग नहीं छेड़नी चाहिए थी। पर मैं यह जान भी कैसे सकता था कि इस बात से वह दुखी हो जाएगा। हम कोको पी चुके थे और गिलास एक तिपाई पर रख दिए थे। वह गिलास धोने के लिए उठ खड़ा हुआ। मैंने उसे टोक दिया।

    तुम रहने दो, मैं धो देता हूँ।

    कार्ल ने मुझे गहरी नज़रों से देखा, फिर धीरे से मुस्कुराया।

    मरहम लगाना हमें और बुरा लगता है, उसने कहा।

    मैं बौखला उठा।

    तुम किसी के लिए कोई गुंजाइश क्यों नहीं छोड़ना चाहते?

    शायद मेरी बात का तीखापन मेरी आवाज़ में भी उभर आया।

    वह गिलास तिपाई पर रखकर फिर बैठ गया।

    मुझे अफ़सोस है। हम ऐसे हो गए हैं। इसमें हमारा कोई दोष नहीं है। लोग हमसे ग़ुलाम की तरह तो काम लेना चाहते हैं, लेकिन दोस्त की तरह हमारी ख़िदमत क़बूल नहीं करना चाहते। हमें यह सुख नहीं देना चाहते।

    अब मैं नहीं बोला। वह उठा और गिलास वाश बेसिन में धोकर रख दिए। वह फिर मेरे पास आकर बैठ गया।

    दरवाज़े पर दस्तक हुई। दरवाज़ा सिर्फ़ भिड़काया हुआ था। कार्ल के उठने या कुछ कहने के पहले ही उसके साथ दिखाई देने वाली अल्जीरियन लड़की भीतर गई।

    तुम यहाँ क्यों बैठे हो? सारा अफ़्रीका तुम्हें खोज रहा है, उसने छूटते ही कहा, फिर मेरी ओर देखकर अपने बेतकल्लुफ़ लहज़े पर सकुचा उठी।

    यह जोरा है, अल्जीरिया की, कार्ल ने बिना कोई औपचारिक परिचय कराए कहा, इनका मतलब है, सारे अफ़्रीकी छात्र मुझे खोज रहे हैं। उसने मेरी ओर इशारा किया, ये मिस्टर वास हैं, मैं इनका पूरा नाम आसानी से नहीं ले सकता।

    श्रीनिवास, मैंने कहा।

    नमस्ते, जोरा ने भारतीय ढंग से हाथ जोड़कर अभिवादन किया। वह विदेशी भाषा के रूप में फ़्रेंच बोलती थी, उसी तरह जिस तरह हम अँग्रेज़ी बोलते हैं। यहाँ आकर उसने अँग्रेज़ी की जगह हिंदी सीखना बेहतर समझा। कार्ल ने बताया कि वह भारतीय रीति-रिवाजों और सामाजिक संगठन का अध्ययन कर रही थी। कार्ल फिर उसकी ओर मुख़ातिरब हुआ

    जोरा, क्या मैं पूछ सकता हूँ कि अफ़्रीका मुझे क्यों खोज रहा है?

    क्या आज बुधवार नहीं है? हमारे साप्ताहिक विचार-विमर्श का दिन।

    मुझे याद था। मैं थोड़ी देर में वास को विदा कर आने वाला था।

    आप भी चल सकते हैं, चाहे तों। वहाँ हम खुला विचार-विमर्श और वाद-विवाद करते हैं। जोरा ने कहा।

    निमंत्रण में कोई औपचारिकता नहीं थी। पर मैं उठ खड़ा हुआ। मुझे घर जाना था। कार्ल मुझे कमरे के बाहर तक छोड़ने आया। शायद मुझे उनका निमंत्रण अस्वीकार नहीं करना चाहिए था। हो सकता है, वे बुरा मानें। मैं कार्ल से इसके बारे में कहना चाहता था। पर मुझे विदा देकर वह कमरे में चला गया और पहले की तरह फिर दरवाज़ा उढ़का लिया था। मैं कुछ क्षण तक हिचकिचाता हुआ खड़ा रहा। उढ़काया हुआ दरवाज़ा धीरे-धीरे अपनी चूलों पर खिसकता हुआ क्लिक की आवाज़ के साथ बंद हो गया। कार्ल या जोरा ने तेज़ गति वाले किसी अफ़्रीकी संगीत का कैसेट चालू कर दिया था। मुझे वहाँ रुकना बेकार लगने लगा।

    जैसा मैं सोचता था, कार्ल और जोरा में वैसी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। यह कोई हफ़्ते भर बाद की बात है। कार्ल अचानक मुझे अपने डिपार्टमेंट से बाहर जाता दिख गया था। साथ में जोरा भी थी। इस बीच मेरी उनसे मुलाक़ात नहीं हुई थी। कार्ल का चेहरा थका और उदास था। उस दिन के लिए खेद प्रकट करने पर वह मेरी ओर अजीब नज़रों से देखने लगा। उसे कुछ याद नहीं था। उसे जोरा ने इसकी याद दिलाई, फिर मुझसे कहा, लेकिन इसकी ज़रूरत नहीं थी। हम लोग इसे पूरी तरह भूल चुके थे। आप अपने ऊपर कोई बोझ महसूस करें। हमने वाक़ई बुरा नहीं माना था।

    बात को समझकर कार्ल एक धीमी हँसी हँस पड़ा।

    तुम हिंदुस्तानी भी अजीब लोग होते हो, उसने कहा, निकटता और दूरी का ऐसा संबंध हमारा किसी के साथ नहीं है।

    मैं उसके साथ किसी बहस में नहीं उलझना चाहता था। जोरा भी कुछ उलझन में पड़ गई। वह चटाई जैसी बुनावट वाली सैंडल और जीन्स पहने बहुत साफ़-सुथरी लग रही थी। उसने मस्क सेंट लगा रखा था। हम साइंस कॉलेज से निकलकर स्कूल ऑफ़ सोशलॉजी की ओर जाने वाले रास्ते पर चल रहे थे। तीन लड़कों के बीच तिकोने पार्क में आइस्क्रीम पार्लर पर ठंडी बोतलें भी मिलती थीं। हम अपनी पसंद की बोतलें चुनकर पार्क के ही एक कोने में बैठ गए थे। पैसे जोरा ने ही दिए। उसने बताया, आज ही उसके स्कॉलरशिप की रक़म मिली थी।

    कार्ल अब भी झगड़ालू मुद्रा में था। उसने एक ही साँस में बोतल सुड़ककर एक ओर लुढ़का दी। मुझे लगा, उससे झगड़े बिना हमारी दोस्ती के लिए कोई रास्ता नहीं था।

    मैंने कहा, “तुम्हारी संबंधों की निकटता और दूरी की बात मैं समझ नहीं सका।

    सहसा उसका झगड़े का भाव ग़ायब हो गया। इसकी जगह एक उदासी-भरी गंभीरता ने ले ली।

    यह बहुत बुरी बात है कि तुम्हारे यहाँ हम लोगों को कोई काम नहीं मिल सकता। उसने कहा।

    काम यहाँ हम लोगों के लिए ही नहीं है। मैं ख़ुद नहीं जानता कि पढ़ाई के बाद मुझे कोई काम मिल सकेगा या नहीं।

    यह मैं जानता हूँ, लेकिन बात होने की नहीं है। होने पर भी क्या हमें मिल सकता है?

    लेकिन इसका तुम्हारी पहली बात से क्या संबंध है?

    नहीं है, लेकिन है भी। दुनिया की राजनीति में तुम हमारे सबसे नज़दीक हो। तुम्हारी सरकार और पार्टियाँ लगातार हमारी आज़ादी और मुक्ति के समर्थन में बयान और दलील देती हैं...लेकिन इंसानी रिश्ते के तौर पर तुम हमसे सबसे दूर हो। हम तुम्हारे समाज में खप नहीं पाते। और तुम्हारे यहाँ काम होने पर भी हमें मिल नहीं सकता। यूरोप हमें अपनी ग़ुलामी में बाँधे रखना चाहता है, पर वहाँ हम इंसानी दूरी नहीं महसूस करते। वहाँ हमें काम मिल जाता है।

    मेरे सामने आश्चर्य से उसकी ओर देखते रहने के सिवा कोई चारा नहीं था।

    क्या तुम हमेशा इसी तरह तनाव में रहते हो?

    तुम तनाव में रहने का मतलब नहीं समझ सकते। वह अजीब ढंग से विश्वविद्यालय परिसर की इमारतों और पेड़ों से कटे आसमान के टुकड़ों की ओर देखने लगा।

    तुम इसकी बात का बुरा मत मानना, जोरा ने कहा। वह अभी आधी बोतल ही ख़त्म कर पाई थी और अब उसमें पड़े स्ट्रॉ को उँगलियों से घुमाती खेल रही थी। कार्ल बहुत परेशान है, उसने फिर कहा।

    मुझे सिर्फ़ कौतूहल हो रहा है।

    क्या तुम्हें पता है कि इसके देश में सैनिक क्रांति हो गई है? जनतांत्रिक सरकार का तख़्ता उलटकर सैनिक तानाशाही की हुकूमत गई है।

    अब यह ख़बर नहीं रह गई है। मैंने कहा, हमें इन घटनाओं पर सिर्फ़ ताज्जुब होता है। हम समझ नहीं पाते कि सारे अफ़्रीका में यह क्यों होता रहता है। क्या यह क़बीलों का आपसी बैर भाव है।

    कार्ल का चेहरा ग़ुस्से से बदसूरत होने लगा। धधकती आँखें मानो अभी जलता लावा उगल देंगी। पर तभी घिरता तूफ़ान छँट गया और वह अपनी स्वाभाविक मुद्रा में लौट आया। उसके सफ़ेद दाँत बिजलियों की कौंध की तरह एक मुस्कान में झलक उठे। लेकिन फिर वही घनी उदासी।

    तुम अफ़्रीका के बारे में जो जानते हो, वह आउटलैंडर्स विदेशियों का दुष्प्रचार है। सीसिल रोड्स, बोथा और स्मट्स के वंशधर। अफ़्रीका में गोराशाही के संस्थापक। जब यह अंधमहाद्वीप कहा जाता था तब वहाँ रोशनी थी। तब हम अपनी मर्ज़ी की ज़िंदगी जीते थे। अंधमहाद्वीप वह उनके आने के बाद बना, जब हमारी रोशनी हमसे छिन गई।

    मैं आतंकित-सा ख़ामोश बैठा रहा।

    उसने फिर कहा, जंगल में रहने वाले कबीले अपनी ख़ास पहचान रखने वाले सामाजिक समूह थे। वे एक-दूसरे से लड़ते या उन पर हमले नहीं करते रहते थे, जैसा गोराशाही के समर्थक सारी दुनिया को बताया करते हैं। वे एक-दूसरे को लूटते या हथियार भी नहीं चुराते थे। वे शिकार, चरागाह और खेती की ज़मीनों का मिल-जुलकर इस्तेमाल करते और एक-दूसरे के साथ अदला-बदली का व्यापार किया करते थे। क्या तुम अपने यहाँ के क़बीलों के बारे में नहीं जानते? क्या वे सभ्य बनाए जाने के पहले एक-दूसरे से लड़ते रहते थे? हम शायद उन्हें तुमसे ज़्यादा समझ सकते हैं। वे राष्ट्रों और राजनीतिक बँटवारों से ज़्यादा बेहतर सहभाव से रह सकते हैं। स्वार्थ के लिए लड़ते रहना सभ्य लोगों का काम है।

    तब यह उखाड़ पछाड़ क्यों होती रहती है?

    हमारा देश बड़ी ताक़तों के खेल का मैदान बना है। उन्हें हमेशा मोहरे मिल जाते हैं या वे बना लेते हैं। हमारी दौलत हथियाने के लिए वे हमें लड़ाते रहते हैं। कार्ल चुप होकर मानो कहीं खो गया।

    अब शाम घिर रही थी। हमारे लौटने का समय हो रहा था। मैंने उठते-उठते कार्ल से कहा, ख़ैर, तुम्हारा यहाँ होना अच्छा है। कम-से-कम फ़िलहाल तुम सुरक्षित हो।

    कार्ल कुछ नहीं बोला। वह अपनी जगह पर हताश-सा बैठा रहा। उसे बैठा देख, जोरा भी उठते-उठते फिर बैठ गई।

    नहीं, तुम्हारा यह सोचना ग़लत है, उसने मुझसे कहा, इसे वापस बुलाकर जेल में डाला या गोली मारी जा सकती है।

    अगर यह जाए?

    जाना ही पड़ेगा। इसका पासपोर्ट रद्द कर दिया जाएगा। इसकी स्कॉलरशिप बंद की जा सकती है। क्या शाह या बाद में खुमैनी विरोधी ईरानी छात्रों के साथ ऐसा नहीं हुआ? हमें कभी भी राजनीतिक संबंधों की बलि चढ़ा दिया जा सकता है।

    अब मैं भी कार्ल के कुछ और नज़दीक बैठ गया। मानो इस तरह हम—मैं और जोरा—उसे उसके दुर्भाग्य से बचा लेंगे। हम पता नहीं कितनी देर तक एक-दूसरे से बिना कुछ बोले वैठे रहे। सहसा वह हमारे बीच से सोते हुए पहाड़ की तरह उठकर तेज़ क़दमों से अंतर्राष्ट्रीय छात्रावास की ओर चल पड़ा। उसके क़दम सीधे नहीं पड़ रहे थे। हममें उसके पीछे जाने की हिम्मत नहीं थी। हमने उसे आवाज़ देना भी मुनासिब नहीं समझा। हम अँधेरे को धीरे-धीरे उतरता देखते रहे। हममें एक-दूसरे से कहने के लिए भी कुछ नहीं था। थोड़ी देर बाद हम चुपचाप उठे और चल पड़े। कार्ल अनुपस्थित होते हुए भी जैसे हमारे बीच चल रहा था। हम उसके छात्रावास नहीं गए। हमें मालूम था, वह इस समय वहाँ नहीं होगा। होता भी तो हम वहाँ जा सकते।

    कार्ल विश्वविद्यालय में कई दिनों तक दिखाई नहीं पड़ा, ही उस कैंटीन में जहाँ हम अक्सर मिलते थे। जोरा से भी अगले हफ़्ते मुलाक़ात हुई। उस दिन बुधवार था। वह अपनी कक्षाएँ ख़त्म कर अफ़्रीकी छात्रों की बैठक में जा रही थी।

    क्या मैं भी चल सकता हूँ जोरा? आज मैंने पूछा।

    आपका स्वागत है, उसने मुस्कुराते हुए कहा, वहाँ कभी-कभी आपके छात्र संघों के लोग आया करते हैं।

    हम साथ-साथ चल पड़े। वहाँ नौजवान अफ़्रीका मौजूद था, हँसता, मुस्कुराता, संघर्ष और नवजीवन की शक्ति से भरा हुआ। कार्ल भी वहाँ बैठकर दुखी नहीं था। मेरे अभिवादन पर उसने सिर्फ़ मुस्कुराकर सिर को हल्का-सा झटका दे दिया।

    जोरा तंजानिया से छपने वाला छोटे आकार का एक अँग्रेज़ी अख़बार ले आई थी। प्रथम पृष्ठ पर दक्षिण अफ़्रीका की जेल में बरसों से क़ैद नेल्सन मंडेला का चित्र छपा था। इसके साथ वहाँ चल रहे जनांदोलन और छापामार कार्रवाइयों की ख़बरें भी थीं। कुछ अन्य देशों में विदेशी कठपुतलियों और देशी तानाशाहों के विरुद्ध जनता के प्रतिरोध और शासकों द्वारा होने वाले निर्दयतापूर्ण दमन की ख़बरें थीं। जोरा ने सभी का सार्वजनिक रूप से पाठ किया। जिम्बाब्वे के ड्यूबोइस टोंबे नाम के एक छात्र ने, जो इस बैठक का सचिव भी था, इन ख़बरों के आधार पर दक्षिण अफ़्रीका के बारे में भाषण दिया। टोंबे और कुछ दूसरे लड़कों को मैंने कई बार कैंटीन में कार्ल के साथ देखा था। उसके भाषण के बाद हमें मगों में कुछ पीने के लिए दिया गया।

    मैं कार्ल के पास पहुँच गया था। उसके साथ टोंबे और एक केनियाई विद्यार्थी बैठे थे। केनियाई का नाम मुझे नहीं मालूम था।

    तुम उस दिन कोई ख़ास अफ़्रीकी चीज़ पीना चाहते थे न। लो हाज़िर है। कार्ल ने कहा।

    इसे क्या कहते हैं?

    इसे स्वाहिली कॉकटेल या पंच कह सकते हो। जैसे स्वाहिली कई भाषाओं को मिलाकर बनी है, उसी तरह यह कॉकटेल भी बनी है। लेकिन इसमें शराब सिर्फ़ एक है, रम, बाक़ी लेमोनेड और करौंदे का जूस। हमारे यहाँ ऐसी घटिया चीज़ नहीं पी जाती। उसने मुस्कुराकर टोंबे की ओर देखा।

    टोंबे भी हँस पड़ा।

    हमारे यहाँ भी नहीं, उसने कहा, इसे अमेरिका के नीग्रो मिलिटेंट पीते हैं और ख़ास अफ़्रीकी ड्रिंक कहते हैं।

    खझड़ीनुमा किसी बाजे के साथ धीमे स्वरों का एक कैसेट बजने लगा। बीच-बीच में जैसे लोहे के कई वजनी कड़ों की खड़खड़ाहट भी सुनाई दे जाती। कुछ लोग अपनी जगहों पर बैठे-बैठे ही पैर से लेकर कमर तक थिरकने लगे थे। हल्के-से उछलकर ज़मीन पर दोनों पैर साथ पटकते हुए, मानो वहीं वे ज़मीन पर पैर टेककर ऊपर उड़ जाना चाहते हों...कहीं किनारे से पानी की लहरें भी थप-थप करती टकरा रही थीं। अफ़्रीका की हर गति में तेज़ी है, शक्ति है और स्फूर्ति है, मुझे लगा।

    यह टैगानियाका के, जो अब तंजानिया है, मछुआरों का चाँदनी रात और प्रेम का गीत हैं, एक दूसरे अफ़्रीकी छात्र ने सार्वजनिक रूप से बतलाया, क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि हमारे यहाँ भी चाँदनी रात होती है और हम प्रेम करते हैं। गोरों को इस पर यक़ीन नहीं आता।

    हम बातों में मशग़ूल थे। मुझे स्वाहिली पंच ज़ायकेदार लग रहा था। मुझे जो हो रहा था, उसे नशा नहीं कह सकते। वह अपने आप बाहर निकल पड़ने का अहसास था। मैंने टोंबे से कहा, तुम्हारा भाषण दिलचस्प था। लेकिन एक बात का जवाब तुममें से कोई नहीं देता।

    कौन-सी बात?

    प्रिटोरिया सरकार दावा करती है कि वहाँ कालों के ऊपर कोई ज़ुल्म नहीं होता। अगर होता तो हर साल सारे अफ़्रीका से बहुत-से काले लोग वहाँ काम करने क्यों पहुँचते हैं? टोंबे गंभीर हो गया।

    और कार्ल को जैसे किसी ने सूई चुभो दी हो। वह होंठों में कुछ बुदबुदाया।

    “मुझे यक़ीन है, तुम इस झूठ पर विश्वास नहीं करते।

    “मैं सच्चाई जानना चाहता हूँ।

    सारे ढोर मार्रा पहुँच जाते हैं। केनियाई बड़बड़ाया।

    हाँ-हाँ! यह रही सच्चाई। केनियाई ने सच बात कह दी।

    मैं नहीं समझ पा रहा हूँ।'

    हाँ, तुम नहीं समझोगे। जो अफ़्रीका का नहीं है, वह नहीं समझेगा। मार्रा केनिया का बहुत बड़ा चरागाह है। वहाँ झीलों में घड़ियाल और जंगलों में ख़तरनाक भेड़िए रहते हैं, लेकिन हर तरह के ढोर और दूसरे जानवर वहाँ चारे और पानी के लिए पहुँच जाते हैं...बस, एक फ़र्क़ है। जंगल का क़ानून इंसानी क़ानून से बेहतर है। जंगल के जानवर में इंसान जैसी घृणा नहीं होती। वे मारते हैं अपनी भूख मिटाने के लिए, दूसरे को मारने के अपने अधिकार की हिफ़ाज़त या मुनाफ़े के लिए नहीं के लिए नहीं...

    यह बात टोंबे कह रहा था। उसकी आँखें लाल हो गई थीं, लेकिन होंठों पर मुस्कुराहट थी। हमारे इर्द-गिर्द और कई अफ़्रीकी छात्र खड़े हुए थे। दक्षिण अफ़्रीका की सारी दौलत उन्हें अपने आप नहीं मिल गई थी। हीरे और सोने की खानें और अतलांतक के वे जज़ीरे जहाँ जवाहरात ज़मीन पर बिखरे होते थे, उन्होंने हमारी मदद से खोजे थे। हर लुटेरे की तरह वे चालाक लोग थे। बोअर वार के पहले तक, जब उन्हें हमारी मदद की ज़रूरत थी, वहाँ अफ़्रीकनों को भी जायदाद रखने का हक़ था। वे खेतों और फार्मों के मालिक हो सकते थे, पर जब काम निकल गया तो हमें इस हक़ से भी महरूम कर दिया गया। अब हमारी दौलत से वे कुछ ऊँची मज़दूरी के रूप में हमारे आगे चारा फेंक देते हैं। ऐसा वे किसी मेहरबानी की वजह से नहीं करते। वे ऐसा सारे अफ़्रीका के लोगों को वहाँ आने का लालच देने के लिए करते हैं। हमारी धरती उन्हें जो रोज़ नए-नए ख़ज़ाने देती है, उसमें हमारी ज़रूरत हमेशा बनी रहती है, क्योंकि तंगी, भुखमरी, बीमारी, हत्या, आगजनी के तरीक़े अपनाकर वे हमें निगलना भी जानते हैं...मार्रा के शिकारी जानवरों या कांगो के अज़गरों से कहीं ज़्यादा खूँख़ार तरीक़े से...

    कैसेट पर बहुत तेज़ गति का संगीत बजने लगा था। जोरा मेरा मग फिर भर गई थी।

    इसे दक्षिण अफ़्रीका में डैंडरस्टॉर्म कहते हैं, कार्ल ने कहा।

    क्या इस ड्रिंक को?

    नहीं-नहीं, इस संगीत को जो अब बज रहा है।

    क्या इसका कोई अर्थ भी होता है? ज़रूर होता होगा।

    वही जिसे अँग्रेज़ी में थंडरस्टॉर्म कहते हैं, जो सब कुछ उड़ा ले जाता है और थमने के बाद वातावरण को पारदर्शी बना देता है वहाँ अतलांतक की ओर से डी मिस्ट—कोहरे की आँधी भी चलती है, जिसमें दिन में भी किसी को कुछ दिखाई नहीं देता। इस नाम का कोई संगीत नहीं है, होगा तो वह गोरों को ही प्रिय होगा, क्योंकि वे दिन के उजाले में भी कुछ देखना नहीं चाहते...

    बात ख़त्म होने के बाद उसने मेरा हाथ पकड़ा और हम मीटिंग से बाहर गए। अपने हॉस्टल के पास मुझे विदा देते हुए उसने कहा, क्या तुम कल या परसों मेरे हॉस्टल में मिल सकते हो? मैं आज के लिए भी कह सकता था, लेकिन बहुत देर हो चुकी है। मुझे तुम्हारी ज़रूरत है।

    मैंने वादा कर लिया। वह छात्रावास के गेट की ओर मुड़ गया। उसका हाथ जोरा की कमर के गिर्द लिपटा था। मुझे लगा, लंबे क़द की जोरा के सहारे के बिना वह गिर सकता था।

    मैं तीन दिन बाद पहुँच गया। मुझे उम्मीद थी, वहाँ जोरा भी होगी, पर वह लाउंज में पिंगपांग टेबल से लगा गेंद को अकेले ही ठक-ठक कर रहा था। मुझे देखकर वह रैकेट मेज़ पर ही छोड़कर मेरी ओर बढ़ आया।

    मैं तुम्हारा कल भी इंतज़ार कर रहा था परसों भी। उसने बिना किसी उत्तेजना या नाराज़ी के कहा।

    मुझे अफ़सोस है...मैं जिस दुकान में आधे वक़्त की नौकरी करता हूँ वहाँ सालाना स्टॉक चेकिंग चल रही थी। मैं विश्वविद्यालय भी नहीं सका।

    वह बिना यह बताए कि कहाँ जा रहा है, चलता रहा। मैं उसके साथ चलने लगा। हम हॉस्टल के भीतर वाले लंबे-चौड़े लॉन में पहुँचकर एक पत्थर की बेंच पर बैठ गए। दिन की बची हुई धूप ने फूलों और घास का रंग निखार दिया था। उसने प्लास्टिक के होल्डर में सावधानी से एक सिगरेट फँसाई और चुपचाप पीने लगा। मुझे लगा, वह कुछ बोलना नहीं चाहता था।

    मुझे सचमुच अफ़सोस है पाने का, मैंने उसे फिर विश्वास दिलाया।

    मैं इसके बारे में नहीं सोच रहा था। मैं यह घास देख रहा हूँ।

    यह विलायती घास कही जाती है, हालाँकि सुना है, मूल रूप में यह ऑस्ट्रेलिया की घास है।

    कहीं की भी हो, जो तुम्हारी ज़मीन में उग सकती है, क्या वह तुम्हारी नहीं हुई? जैसे आलू, तंबाकू...

    हाँ, यह ठीक है। लेकिन तुमने मुझे किसी ख़ास ज़रूरत के लिए बुलाया था।

    “हाँ, हम शॉपिंग करने चलेंगे।

    शॉपिंग? क्या तुम्हारी स्कॉलरशिप जारी हो गई?

    नहीं, जोरा से उधार लिए हैं। दुनिया की हर अच्छी औरत की तरह वह कंजूस है और वक़्त पर हमेशा मदद करती है।

    यह तुम उसकी प्रशंसा में ही कह रहे होगे।

    तुम उससे मेरे शब्द दुहरा सकते हो।

    लेकिन शॉपिंग करनी है तो हम यहाँ क्यों बैठे हैं? हमें चल देना चाहिए, नहीं तो देर हो जाएगी।

    जोरा को भी लेने दो।

    जोरा?...क्या उसे मालूम है कि हम यहाँ बैठे हैं?

    ओह! परेशान होओ! वह पूरी बिल्ली है, हमें खोज लेगी।

    मैं चौंके बग़ैर रह सका। ताज्जुब से पूछा, जोरा से तुम्हारी लड़ाई वग़ैरह हुई है क्या?

    कार्ल हँस पड़ा।

    लड़ाई होने पर हम औरत को बिल्ली नहीं कहते। हम उन्हें वेश्या, डायन या कुतिया भी नहीं कहते। हमारे पास ये धारणाएँ नहीं हैं।

    फिर क्या कहते हो?

    कुछ भी नहीं। अच्छे इंसानों की तरह एक-दूसरे के सामने से हट जाते हैं। ज़रूरत हुई तो एक-दूसरे से हाथापाई कर सकते हैं। हब्शी औरतें ताक़तवर होती हैं, वार झेल भी सकती हैं, कर भी सकती हैं।

    जोरा के बारे में कार्ल का अनुमान ठीक था। वह हमें खोजती हुई वहाँ पहुँच गई। हम तुरंत चल पड़े। छात्रावास से बाहर निकलकर हमने बस ले ली।

    मैंने यह नहीं पूछा था कि कार्ल क्या ख़रीदना चाहता था। बस से उतरने के बाद उसी ने बताया, वह चमड़े का एक संदूक़ ख़रीदना चाहता था

    चमड़े का संदूक़?

    हाँ, एक बड़ा, ख़ूबसूरत और बढ़िया संदूक़। मैं यह अपनी माँ के लिए ख़रीदना चाहता हूँ।

    माँ के लिए?

    हाँ, हाँ। अपनी माँ के लिए। उसके मन में हमेशा एक ऐसे संदूक़ की हसरत पलती रही है तुम्हें मालूम है! वह जिस गोरे मालिक के यहाँ काम करती थी, वहाँ ऐसे ही एक संदूक़ को छू देने के अपराध में उस पर मार पड़ी थी। मैं उस वक़्त बच्चा था। मैंने चाहा था, उस गोरे का ख़ून पी जाऊँ और वैसे हज़ारों संदूक़ लाकर अपनी माँ के क़दमों में डाल दूँ। मैं ऐसा नहीं कर सकता था, पर उस गोरे का सिर फोड़ सकता था। तभी हमारे पैरिश का पादरी कौवे के पंखों जैसा काला लबादा पहने एक गोरे पादरी के साथ आया और उस मालिक के पाप के लिए माफ़ी माँगी। मैंने तो नहीं, पर मुझे मालूम है मेरी माँ ने उसे माफ़ कर दिया था। धर्म यही काम करता है। अत्याचार की आध्यात्मिक माफ़ी...

    क्या तुम्हारे यहाँ ऐसे संदूक़ नहीं मिलते?

    मिलते हैं। बढ़िया से बढ़िया। गैंडे, चीते, पाइथान, जंगली सूअर, घड़ियाल सभी के चमड़े वाले। प्रिटोरिया, डरबन, केपटाउन, जोहान्सबर्ग सभी जगह मिलते हैं लेकिन वे गोरी बस्तियों के बड़े बाज़ारों में ही मिलते हैं, जहाँ हम जा भी नहीं सकते। अफ़्रीकी बस्तियों में ऐसी दुकानें नहीं होतीं। वहाँ बँगले नहीं, झोंपड़ियाँ या बैरकनुमा कोठरियाँ ही होती हैं।

    हम जनपथ पर चलने लगे थे। कार्ल ने एक फेरीवाले से मूँगफलियाँ ख़रीदा और हम सबको दीं। हम सड़क के किनारे एक डस्टबिन के पास खड़े मूँगफलियाँ चबाते रहे। जगमगाते चकाचौंध में मुझे कार्ल के चेहरे पर उदासी दिखाई दी। आँखों में यादों की परछाइयाँ। उसने सिर के ऊपर से पीछे तक हाथ फैलाकर बदन तोड़ा।

    एक बार केपटाउन के बाज़ार में इसी तरह टहलते हुए मुझे पकड़ लिया गया था। हफ़्ते-भर की बामशक़्क़त क़ैद की सजा मिली थी। मैं ख़ुशक़िस्मत था, दंगे या चोरी का इल्ज़ाम ठहर नहीं सका। नहीं तो महीनों बाहर निकल पाता। अपनी बस्तियों से हमें दूर रखने के लिए वे यही हथकंडे अपनाते हैं।

    लेकिन वह संदूक़ तुम बाद में भी तो ख़रीद सकते थे जब स्वदेश जाने लगते अभी तो जा नहीं रहे हो!

    कार्ल ने जोरा की ओर देखा, वह अजीब ढंग से मुस्कराने लगी। उसके चपटे हैट के नीचे बन किए बालों की एक लट हवा में लहरा रही थी। लंबी चोगानुमा अल्जीरियाई फ़्रॉक अचानक फैलकर उसकी जाँघों के गिर्द लिपट गई।

    ...हाँ, ख़रीद सकता था बाद में भी, कार्ल ने कहा, लेकिन उस दिन जब मैं तुम लोगों को छोड़कर उठ गया था, मैंने सपने में अपनी माँ को देखा था तुम्हें पता है! जब मैं भोर के अँधेरे में छिपकर नाइजीरिया आने लगा था तो वह हमारी बस्ती के छोर तक मुझे छोड़ने आई थी। वह मुझे मिमोसा की एक घनी झाड़ी की आड़ में छाती से चिपकाए देर तक रोती रही। मैंने सपने में उसे हूबहू उसी तरह देखा था। मुझे छाती से चिपटाकर रोते हुए। मैं उसके नज़दीक होना चाहता था। लेकिन जब यह मुमकिन हो तो उसके लिए कुछ करना हमें उसके नज़दीक ला देता है जोरा यह समझ सकती है...वह औरत है!

    हम शीशे से चमचमाती एक भीड़-भरी रोशन दुकान के सामने पहुँच गए थे। लंबी-चौड़ी दुकान सिर्फ़ चमड़े के सामानों से भरी थी। थोड़ी देर तक बाहर खड़े हम भीतर का दृश्य देखते रहे, फिर संदूक़ों के काउंटर की ओर बढ़ गए।

    दो विदेशियों के साथ आया देखकर सेल्समैन ने अर्थपूर्ण ढंग से एक आँख दबाकर मुझे इशारा किया।

    मैं संकेत समझ गया। मैं कान तक लाल हो गया होऊँगा।

    मैंने कहा, आप जो समझ रहे हैं, वह बात नहीं है। हम तीनों दोस्त हैं, हमें एक संदूक़ चाहिए।

    सेल्समैन झेंपने से ज़्यादा चिढ़ गया। उसने हल्के क़िस्म के दो-तीन बक्से लाकर हमारे सामने पटक दिए।

    जोरा नाराज़ हो गई।

    हम अपने देश में बेअदबी करने वालों को चाँटा मार देते हैं। वह बिफर पड़ी।

    सॉरी मैडम, सेल्समैन सहम गया।

    क्या तुम यूरोपीयनों के साथ इस तरह पेश सकते हो?

    ग़लती हुई मैडम।

    कार्ल बक्सों की जाँच करने लगा था। उसने उन्हें परे खिसका दिया।

    मुझे एक बड़ा और बहुत बढ़िया संदूक़ चाहिए।

    इस पर सेल्समैन काफ़ी छाँटकर कई बढ़िया बक्से ले आया। कार्ल ने जो संदूक़ चुना वह सर्प की असली केंचुल से मढ़ा काफ़ी ग्लॉसी क़िस्म का और मज़बूत था। अंदर धूपछाँही आभास कराने वाली मखमली कपड़े की लाइनिंग और कई खाने थे। जोरा को भी वह पसंद आया और मुझे भी। कार्ल ने उसे रंगीन काग़ज़ में पैक कराया और दाम देकर हम बाहर गए। बाहर की ठंडक राहत देने वाली थी। पर मेरे पास कोई शब्द नहीं थे। कार्ल की एक हल्की-सी थपकी मैंने पीठ पर महसूस की।

    शर्मिंदा हो? उसने हँसते हुए कहा। अपनी पसंद की चीज़ पाकर उसकी कड़वाहट थोड़ी देर के लिए उसे छोड़ गई थी। अपना प्रिय संदूक़ वह हैंडल से पकड़कर नहीं बल्कि गोद में उठाए बच्चे की तरह सीने से लगाए चल रहा था।

    मैं उसका कोई उत्तर नहीं दे सका।

    इसकी ज़रूरत नहीं है, उसने कहा, पुराने पूर्वाग्रह देर में ख़त्म होते हैं...मैंने निकटता और दूरी वाली बात कही थी न! हम इसे रोज़ ही झेलते हैं...फिर तिजारती संस्कृति में आदमी अक्सर आदमी की तरह व्यवहार नहीं करता।

    मैं अब भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं था। हमने एक ओपेन एयर रेस्तराँ में कॉफ़ी पी, फिर कार्ल और जोरा से विदा लेकर मैं घर चला गया।

    विश्वविद्यालय में जोरा मुझे अकेले दिखाई दी। वह किसी बात पर ख़फ़ा थी।

    कार्ल कहाँ रह गया आज? मैंने पूछा।

    कार्ल गधा है, उसने नाराज़गी से कहा।

    क्या हुआ जोरा?

    भावुकता में आदमी बहुत अहमक भी हो जाता है, ख़ासकर मर्द।

    तुम कहो, मैं सुन रहा हूँ। मैं तुम्हें समझने की कोशिश करूँगा।

    तुमने देखा था न, वह किस तरह उस बक्से को लेकर चल रहा था। गोद में लिए बच्चे की तरह, सीने से चिपकाए हुए!...वह उसको उसी तरह लिए-लिए जनपथ से हॉस्टल तक—क़रीब दस किलोमीटर पैदल आया। उसका कहना था, संदूक़ बस की रेल-पेल में टूट जाएगा। मैंने कहा, टैक्सी या स्कूटर कर लेते हैं, उसने इसे भी मना कर दिया। उसे डर था, इनकी भी दुर्घटना हो सकती है। वह चल भी अजीब ढंग से रहा था। एक-एक क़दम सँभालकर रखते हुए ताकि किसी की टक्कर से संदूक़ को एक खरोंच तक लगे। हर क़दम पर 'सॉरी', 'एक्सक्यूज़ मी' कहता हुआ बेवक़ूफ़! मैं आधे रास्ते से बस लेकर चली आई...

    तुम्हें नाराज़ नहीं होना चाहिए जोरा, मैंने गंभीर होने का प्रयत्न करते हुए कहा, वह उसी को तो बचा रहा था जिसके लिए तुमने पैसे दिए थे।

    क्या उसने तुमसे यह कहा है!

    क्या नहीं कहना चाहिए था?

    वह सिर्फ़ हमारे बीच की बात थी। कार्ल को उसे सार्वजनिक बनाने का हक़ नहीं है।

    कार्ल है कहाँ?

    मुझे नहीं मालूम। हॉस्टल से आते वक़्त मैं उससे नहीं मिली वह फ़र्श पर अपने चटाईदार सैंडल की एड़ियाँ खट्-खट् करती चली गई। मैं उसे देखता रहा। कभी-कभी बहुत मामूली बातें भी बहुत महत्त्वपूर्ण हो उठती हैं। मैं जानना चाहता था, इस मुद्रा में कार्ल उसे दया कहना चाहेगा? नाराज़ औरत के लिए ज़रूर उसकी भाषा में कोई शब्द या विशिष्ट अभिव्यक्ति होगी। हर भाषा में होता है। पर मैंने इसे मुल्तवी कर दिया। उस दिन मेरी दुकान के मालिक के यहाँ कोई उत्सव था और वहाँ जाने वाले की ग़ैरहाज़िरी हमेशा के लिए याद रखी जाती।

    हम अगली बार मिले तो उनके बीच सुलह हो चुकी थी।

    यह उससे मेरी आख़िरी मुलाक़ात थी, पर उस वक़्त मुझे इसका पता नहीं था। उस दिन भी बुधवार था और वे उस हॉल की ओर जा रहे थे जिसे उनकी बैठक के दिन 'अफ़्रीका हॉल' का नाम दे दिया जाता था। कार्ल का चेहरा और मुद्रा बहुत गंभीर थे, पर जोरा में इसके साथ उदासी भी स्पष्ट थी। मैं कुछ समझ नहीं पाया।

    कार्ल ने कहा, तुम भी हमारे साथ चल सकते हो। बल्कि मैं चाहता हूँ, तुम ज़रूर चलो।'

    वहाँ उस दिन जैसा समारोहपूर्ण वातावरण आज नहीं था। स्वाहिली पंच पी गई और डैंडरस्टॉर्म या कोई अन्य गीत बजाया गया। इसकी जगह एक गंभीर कामकाजी वातावरण था। जोरा आज कोई अख़बार नहीं लाई थी। टोंबे ने साइक्लोस्टाइल किया कई पन्नों का एक परचा निकाला और उसे पढ़ने लगा।

    यह अफ़्रीकी नेशनल कांग्रेस का दस्तावेज था जो प्रिटोरिया से छिपाकर बाहर लाया गया था। इसमें गोराशाही के अत्याचार और वहाँ की जनता के संघर्ष की ऐसी ख़बरें थीं जो अख़बारों में नहीं पातीं।

    टोंबे के पढ़ने के साथ मेरे सामने दुनिया के एटलस पर एक चित्रमय नक़्शा खुलने लगा जहाँ अँधेरा, ख़ून और आग थी। सड़कों पर निहत्थे लोगों को गोलियों से भूना जा रहा था और फाँसी की कोठरियों में निर्दोष लोगों को क़त्ल किया जा रहा था। बेटे-बेटियों, भाइयों, बच्चों की लाशें थीं। आँसू, कराह और चीत्कार के स्वर थे। इनमें कहीं मुझे कार्ल का चेहरा भी दिखाई दिया और उसकी माँ की सिसकी भी सुनाई दी जिसे मैंने कभी देखा नहीं था। फिर भी लोग थे कि बिना टस से मस हुए खड़े थे और मरकर भी फिर खड़े हो जाते थे। किसी चट्टान से जैसे टकराकर गोलियाँ बेकार हो जाती थीं और किसी ज्वालामुखी के फटने के साथ कोई डैंडरस्टॉर्म शुरू होने वाला था...टोंबे पढ़कर चुप हुआ तो जैसे वह ज्वालामुखी सभी के दिलों में सुलगने लगा और वही आँधी सभी के भीतर चलने लगी।

    पर्चा ख़त्म होने के बाद बैठक की औपचारिकता भी ख़त्म हो गई। लोग आपस में बातचीत करने लगे। पर वातावरण की गंभीरता बनी रही। मैं समझ नहीं पा रहा था कि कार्ल मुझे यहाँ क्यों लाया था। मैं बातचीत में कोई योगदान कर सका। कार्ल भी ज़्यादातर चुप रहा। पर टोंबे के पर्चे के बाद वह अचानक बहुत बेचैन लगने लगा। यह बेचैनी अकेले उसी में नहीं थी। शायद सभी में कोई संकल्प पल रहा था।

    बैठक की कार्रवाई ख़त्म होने के बाद हम लौटने लगे तो उसने मेरा हाथ थाम लिया।

    क्या तुम समझ पाओगे कि यहाँ बने रहना मुझे एक अपराध लग रहा है।

    मैं समझ पा रहा हूँ। लेकिन तुम जो यहाँ कर रहे हो वह भी तो महत्त्वपूर्ण है! तुम्हारे देश के लिए, ख़ुद तुम्हारे और तुम्हारे भविष्य के लिए!

    वह कड़वाहट से हँस पड़ा। भविष्य! यह तुम कह रहे हो! जो आज़ाद हो क्या उसका भी कोई भविष्य हो सकता है?

    लेकिन क्या तुम्हारा मुल्क कोई और नहीं है? प्रिटोरिया में रंगभेद विरोधी लड़ाई का तुमसे जाति तौर पर क्या संबंध?

    कार्ल हँसने लगा।

    तुम मुझसे एक दोस्त की हैसियत से यह कह रहे हो तुम ख़ुद इस पर यक़ीन नहीं करते।

    जोरा टोंबे से बात करती हुई आगे निकल गई थी। अँधेरा गहराने लगा था।

    विश्वविद्यालय परिसर की बत्तियाँ सिर्फ़ घनी छायाएँ बना पा रही थीं। जोरा और टोंबे हमारा इंतज़ार करने के लिए रुक गए।

    टैक्सी पर सवार होने के पहले वह अचानक मुड़ा और संदूक़ मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा, ...वास, इसे तुम यहीं सँभालकर रखना। मैं यहाँ फिर लौटूँगा अभी मैं नहीं जानता कि अपनी माँ के पास पहुँच भी पाऊँगा या नहीं। पर इंतज़ार करना मेरा। मैं ज़रूर लौटूँगा इसके लिए...

    मैं भी इंतज़ार करूँगी कार्ल! लेकिन मेरा पता तब शायद यहाँ नहीं, अल्जीरिया में होगा।

    “ओह! जोरा...जोरा...उसने संदूक़ मुझे थमाकर उसके दोनों हाथ मज़बूती से थाम लिए।

    ठीक है कार्ल! मैं इसे सँभालकर रखूँगा। मुझे विश्वास है, तुम लौटोगे। लेकिन..., मुझसे आगे कुछ कहा नहीं गया।

    कार्ल हँसने लगा।

    ...अगर नहीं लौटा तो! तुम यही कहना चाहते थे वास? तब इसकी क़ीमत और बढ़ जाएगी। तब इसे उस आदमी की अमानत की तरह सहेजना जिसने अपने लोगों और अपने मुल्क के हक़ के लिए जान दे दी...अलविदा मेरे दोस्त...

    वह टैक्सी पर सवार हो गया।

    स्रोत :
    • पुस्तक : शताब्दी की कालजयी कहानियाँ (खंड 3) (पृष्ठ 249)
    • संपादक : कमलेश्वर
    • रचनाकार : रमाकांत
    • प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन
    • संस्करण : 2010

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