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कबाड़वाले की मौत

kabaDvale ki maut

अशोक मिश्र

अशोक मिश्र

कबाड़वाले की मौत

अशोक मिश्र

और अधिकअशोक मिश्र

    (नवें दशक के किसी एक दिन)

    वह कबाड़वाला था। साइकिल में लटकती बोरी, कांटे वाली हाथ से पकड़ने वाली तराज़ू और किलो—दो किलो के बटखरे देखकर ही पता चल जाता था कि वह कबाड़ी है। क़मीज़—पायजामा का बहुत सादा-सा पहनावा और पैरों में हवाई चप्पल और मुरझाए चेहरे पर गहरी-सी उदासी, धीमी-सी चाल उसके व्यक्तित्व पर कुछ ऐसी चिपकी होती थी कि लोग दूर से ही उसका आना भांप लेते थे।

    क़स्बे आस-पास के गाँवों की गली-गली घूमते हुए हाँका लगाना—बाबूजी कबाड़वाला—रद्दी अख़बार, बोतलें, प्लास्टिक के सामान बेंच डालिए—का हाँका बार-बार दोहराना उसका रोजमर्रा का काम था। कबाड़ की तलाश और उससे शाम तक परिवार पालने के लिए दो जून की रोटी जुटाना ही उसका पेशा और जीवन था।

    यह कोई आज से बीस बरस पहले की बात है कि गोपालबाबू अपने ननिहाल कटरौली गए हुए थे। अचानक बड़ी ममेरी बहन मंजू दी ने कहा कि क्या तुम किसी रद्दीवाले को जानते हो?

    क्यों क्या काम है दीदी?

    अरे क्या कहूँ ढेर सारी अख़बारी रद्दी है जिसे चूहे कुतर-कुतर कर कमरे में कूड़ा फैला रहे हैं—रोज़ झाडू लगाने में परेशानी होती है सो उसे बेंच देना ही ठीक रहेगा।

    अरे हाँ दी मेरा एक दोस्त है—जो कबाड़ी का काम करता है उसे बोल दूँगा वह एकाध दिन में ही जाएगा।

    क्या नाम है उसका?

    अरे दी नाम में क्या रखा है?

    अरे उसकी जगह कोई चोर-उचक्का गया तो फिर क्या होगा?

    अरे दी इस छोटे से गाँव में वैसे भी कौन आने वाला है।

    अरे ऐसा भी नहीं है दूधिए से लेकर बिसाती तक जाने कैसे कैसे शक्ल सूरत वाले चक्कर लगाते हैं हो सकता है कि उसमें कोई चोर उचक्का हो तो...?

    अरे यहाँ चोर कहाँ हैं दीदी?

    इलाके में क्या चोर—उठाईगीरों की कमी है, फिर पक्कहा बाबा का परिवार तो वैसे भी बदनाम है कि हम लोग काफ़ी धनी हैं लोग क्या जाने कि नौकरीपेशा घरों में पैसे कहाँ होते हैं।

    गोपालबाबू ने दीपावली इस बार घर पर मनाने का फैसला किया था। कई साल हो गए थे बाबूजी के रहने के बाद इस बार घर की दीपावली का फैसला बेटी और पत्नी को भी हुलसा गया था। बेटी जोर से चिल्लाई दीपावली दादी के साथ हिप-हिप...हुर्रे—अगले दिन से ही हम लोग इस बार दीपावली घर पर मनाने की तैयारी में लग गए थे। इसकी एक वजह यह भी थी कि हम परदेश में रहते हुए भी अजनबीपन, परायापन और एकांतिता भोग रहे थे, जहाँ ही कोई परिचित चेहरा होता था, ही कोई अपना रिश्तेदार जिसके लिए कभी-कभार मन काफ़ी बेचैन भी हो जाया करता था। हमारी मानसिक तैयारी हो ही चुकी थी बस कार्यालय से अवकाश लेने भर की देर थी।

    देखते ही देखते आख़िरकार वह दिन भी गया था, जब हमें सुबह पाँच बजे घर से निकल नागपुर के भीमराव अंबेडकर हवाई अड्डे से पहले दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराज्यीय हवाई अड्डे पहुँचना था फिर वहाँ उतरकर लखनऊ की फ़्लाइट पकड़नी थी।

    गोपालबाबू जैसे ही फ़लाइट से उतरे ही थे कि एयर एंडिया का एक कमर्चारी चिल्ला रहा था—कि नागपुर से तीन यात्री जिन्हें लखनऊ जाना है मुझसे मिलें—

    पुकार सुनकर गोपालबाबू को लपककर बताना पड़ा कि कि हम लोग ही लखनऊ वाले यात्री हैं।

    एयर इंडिया का कमर्चारी बोला कि जल्दी करिए जहाज़ के लिए बोर्डिंग शुरू हो चुकी है।

    हम और बिटिया एस्केलेटर पर लगभग दौड़ते हुए टर्मिनल पर पहुँचे। पत्नी की साँस फूल रही थी इसलिए फ़्लाइट के उस कर्मचारी ने उनको व्हीलचेयर पर बैठा लिया था। दौड़ते हुए जब हम किसी तरह टर्मिनल तक पहुँचे तो पता चला कि लखनऊ की हमारी फ़्लाइट लगभग दो घँटे की देरी से जाएगी तब जाकर हमने थोड़ा राहत की सांस ली। यह दीपावली से एकाध दिन पहले का समय था सो एयर इंडिया की साइड वाला टर्मिनल पूरी तरह से यात्रियों से खचाखच भरा हुआ था। भीड़ इस क़दर थी कि कहीं भी बैठने के लिए एक भी कुर्सी खाली थी? यात्रियों के चेहरे पर उदासी साफ़ झलक रही थी। किसी की फ़्लाइट कैंसिल हो गई थी, तो किसी की लेट थी। लोगों के चेहरे तनाव, अपनों के पास जल्द पहुँचने की बेचैनी, आशंकाओं, चिंताओं से भरे थे। ये सभी जल्द से जल्द हवा में उड़कर अपनों के बीच पहुँचने को इस क़दर बेकरार थे कि घड़ी के एक-एक सेकेंड का इंतज़ार उनको ख़ासा अखर रहा था।

    यह हवाई यात्रा भी क्या मज़े की होती है कि आकाश में डैने फैलाए किसी पक्षी-सा विमान के उ़ड़ते रहने का अहसास दे जाती है। भारत में दो भारत हैं। एक ओर ट्रेनों का ग़रीब-ग़ुरबा, मेहनतकश लोगों से भरा जनरल डिब्बा जिसमें लघुशंका के लिए जाना भी एक तरह का युद्ध लड़ना है या फिर रोडवेज की खटारा बसों की छतों पर बैठा भारत का किसान-मज़दूर जिसके पास कोई विकल्प ही नहीं कि वह सार्वजनिक आवागमन के साधनों के अलावा किसका इस्तेमाल करे। ज़ाहिर है कि उसके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं। दूसरी ओर गिनती भर यात्रियों से भरी एयरलाइंस की उड़ान जिसका टिकट ही ख़रीद पाना आम आदमी के लिए संभव ही नहीं। गोपालबाबू सोच रहे थे कि हम तो सरकारी एलटीसी की बदौलत हवाई यात्रा का आनंद उठा रहे है लेकिन सबका मुकददर ऐसा कैसे हो सकता है।

    इतने में बेटी ने कहा कि पापा ये टर्मिनल क्या होता है?

    बेटा—जैसे ट्रेन के लिए रेलवे का प्लेटफ़ार्म होता है वैसे ही हवाई जहाज़ के लिए टर्मिनल होता है।

    घर पहुंचने के बाद—एक दिन जब वह घर के मेडिकल स्टोर पर बैठा था जिसे पहले पिताजी चलाते थे अब भाई ने आयुर्वेदिक की जगह अँग्रेज़ी दवाओं के स्टोर में बदल दिया था।

    वह अपने उसी घर पहुँच गया जहाँ ज़िंदगी के तीस साल गुजरे थे पाँच भाई-बहनों और अम्मा पिताजी के साथ। घर पर अब अस्सी साला माँ थीं और छोटे भाई की नई नवेली बहू जिसकी बोली—बानी ने घर को फिर से कुछ और रोशनी से जगमग कर दिया था। पिताजी दस साल पहले हुए ब्रेन हेमरेज के बाद नहीं रहे थे। पिताजी भले ही घर पर नहीं थे लेकिन ऐसा लगता था कि वे घर के किसी कोने से निकलकर खड़े होंगे शायद...।

    एक दिन सुबह वह टहलते हुए ननिहाल वाले रास्ते पर रेलवे लाइन से होते हुए शारदा नहर की ओर निकल गया था जो कि खिरौनी और आस-पास के सौ से अधिक गाँवों, पुरवों की जीवनदायिनी, अन्नदायिनी, जलदायिनी जीवनरेखा भी और फसलों के लहलहाने की वजह भी थी।

    नहर की पुलिया पर बैठकर कुछ देर तक मन वहाँ से बचपन की खोई स्मृतियों का कोई सिरा पकड़ने की कोशिश में लगा था जब माँ ननिहाल से पिताजी का टिफिन का डि्बबा पकड़ा देती थी कि जाओ और बाबूजी को दे आओ। यह तब होता था जब माँ दो-चार दिनों के लिए अपने मायके या हम सब बचपन में जिसे ननिहाल या नानाजी का घर मानते थे वहाँ चली जाती थीं। ऐसा गर्मियों की छुट्टियों या होली, रक्षाबंधन जैसे किसी तीज-त्यौहार पर ही होता। पिताजी मां के रहने पर खाना बनाने की जहमत से बचने के लिए या तो ननिहाल आते या फिर उनको टिफिन में रखकर खाना भेजा जाता। मामी अकसर उसमें चूल्हे से उठाकर एक टुकड़ा कोयला डाल देतीं ताकि खाने के डिब्बे पर रास्ते में किसी भूतही आत्मा या भूखे आदमी की नज़र लगने पाए। इसके बाद बाज़ार की तरफ़ जा रहे किसी आदमी के जरिए टिफिन का वह डिब्बा गाँव भर का दामाद कहलाने वाले पिताजी तक पहुँचवा दिया जाता था। पुलिया पर वह कुछ देर तक बैठे रहे पुरानी स्मृतियों के कुछ दौड़ते- भागते अक्स आते और चले जाते। वह सोचते रहे कि जन्म और मृत्यु के बीच ज़िंदगी आख़िर कितनी तेजी से चलती है जैसे सब कल की ही बात हो।

    वह स्मृतियों की आती-जाती चित्रमाला और नहर के कल-कल-कल बहते पानी की ध्वनियों के बीच खोया था कि इतने में पास आकर एक अधेड़ से व्यक्ति ने कहा अरे गोपाल भईया हमय चिंहेव की नाही? उसके बोलने से उनके विचारों की चलायमान स्मृतिका अचानक लुप्त हो गई।

    उसे देखते ही वह बोल पड़ा अरे रामनारायण का हाल है भाई कैसन हव यह कहते पुलिया से उतरकर उसे गले से लगा लिया।

    भईया बस गुजर बसर हो रही है ज़िंदगी कटत हय और आप आपन बतावा जाए।

    हम तो ठीक ही हैं तुम कह सकते हो कि सरकारी नौकरी में हूँ तो कई मुश्किलों से बचा हुआ हूँ।

    तुम्हारे बच्चे कैसे हैं और क्या कर रहे हैं?

    भइया तीन लड़के हैं एक बैंक में ऑफिसर हो गया बाकी दो गोवा में फुटपाथ पर दुकान लगावत हैं?

    समझा जाए कि लड़कन की बदौलत हम अब मजे मा हन।

    और तुम्हारा कबाड़ वाला काम क्या हुआ?

    भइया तो पालीथीन आवै के बाद समझा जाए कि ख़त्म होय गय रहा पर अब हम काम करय कय तरीक़ा जमाने के लिहाज़ से बदल लिहेन है और बड़े पैमाने पै दुकानन से गत्ता, कबाड़ लोहा, लकड़ी कय पुरान चौखट, फ़र्नीचर, कुर्सी, अलमारी ख़रीद के फिर ज़रूरतमंदन का तनिक मुनाफ़ा लय के बेंच देईत है यही आपन बिजनेस है अब और का कही जैसे-तैसे दो जून कय रोटी इज़्ज़त से मिलत है।

    भइया कल आप सुबह घर पर आवें तो अच्छा रहय कुछ देर बैठ के बातचीत किन जाए।

    उसके जाने के बाद काफ़ी देर तक गोपालबाबू नौंवे दशक के छात्र जीवन और उससे जुड़ी स्मृतियों में खो गए।

    जब अंधेरा गहराने गहराने लगा तो वे घर की ओर गए। वे सोच रहे थे कि किसी भी आदमी के दिन सदैव एक जैसे नहीं रहते उसमें बदलाव आता ही आता है। उनको याद आता है कि आख़िर बाबूजी यों ही नहीं बोलते थे कि—दस साल में तो घूरे के दिन भी फिर जाते हैं।

    गोपालबाबू घर आकर माँ को बताने लगे कि वह रामनारायण मिला था।

    माँ ने कहा कि बेटा अब तो उसके दिन लौट आए उसका बहुत बड़ा कबाड़ का कारोबार है उसके बच्चे स्कार्पियो गाड़ी से चलते हैं।

    उसके बच्चे मुंबई में कबाड़ का बहुत बड़ा बिजनेस चलाते हैं और अब वे रद्दी अख़बार नहीं बड़ी-बड़ी बंद मिलें, कारख़ानों का स्क्रैप, बंद पावर प्लाटों का कबाड़, ऑफ़िस का फ़र्नीचर, घरेलू आलमारियाँ, चौखटे, खिड़कियाँ जाने क्या क्या ख़रीदकर ख़ूब पैसा बना रहे हैं। लोहा नीलामी में लेकर उसे सटील की फ़ैक्ट्रियों में बेचते हैं जहाँ उसे बिजली की भट्टियों में गलाकर नया सटील बनता है। सटील सुनकर गोपालबाबू को हँसी गई कि माँ जानबूझकर कई बार शब्दों को उच्चारण के दौरान कुछ इस देशी अंदाज में तोड़ देती हैं कि बुझे हुए चेहरों पर थोड़ा-सा हास्य का भाव पैदा हो और सब लोग ठहाके लगाकर देर तक हँसे। वे सकूल, इस्टेशन, कचेरी, टरेन, टंपू जैसे शब्द उच्चारतीं। बाबूजी तो माँ की इस बात से खासा खार खाते थे कि कोई काम धंधा तो है नहीं घर मां ठलुआ की नाई बैइठ के चाहे जौन करो। माँ को गोपालबाबू ने कई उदास क्षणों में भी ठहाके लगाते देखा है। पड़ोसी कहते कि दीदिया आप तो गजबय करत हो। माँ तो सबसे अलग जाने किस माटी की बनी थी कि बहुत बड़े घर की बेटी होने के बाद भी कभी भी वहाँ का जिक्र छेड़तीं क्योंकि उनको पता था कि बाबूजी के सामने ससुराल का नाम लेते ही उनके चेहरे पर चिढ़ दिखने लगती थी। बाबूजी और अम्मा में कहीं कोई मेल था कहाँ वे एकदम तुनकमिजाज बच्चों जैसे कहाँ माँ संपन्न घर से होने के बावजूद बेहद व्यवहारकुशल, नेकदिल और अपनी अभावों भरी टूटी-फूटी गृहस्थी और बच्चों में सदा ख़ुश रहने वाली।

    माँ बताने लगी थी कि भैया (दरअसल गोपालबाबू घर के भीतरी लोगों द्वारा भैय्या ही कहे जाते थे) दरअसल जौन कबाड़ कय धंधा है यहिमा एक बार जौन पावरहाउस बंद भवा है वहिकै कबाड ख़रीदै के ख़ातिर टेंडर निकला और जौन तोहार दोस्त है अप्लाई कय दिहिस। फिर का भवा कि बाहर से केऊ आवा नाहीं फिर टेंडर एकरे नाम निकल आवा।

    अरे बेटा फिर तो जाने कउन चमत्कार हुवा कि फटीचरवा रातों-रात लखपती बनिगा।

    इतने में छोटकी बहन बोली अरे भइया अम्मा का तो कुछ पता नाही है लोग कहते हैं कि पावर हाउस में अनुमान से सौ गुना ज़्यादा कबाड़ निकला।

    भइया एक साल तक ट्रक में भर भरकर स्क्रैप कानपुर और गाजियाबाद जात रहा और आपका दोस्त नोट पर नोट छापता रहा और धीरे-धीरे बड़ा आदमी बन गया और अपने छोटे भाइयों, बहनों की शादी की और पक्का मकान बनाया लेकिन ख़ुद वैसे ही दर्जी की सिली मारवाड़ी कट बनियान पहनकर घूमता रहा। छोटी बहन रौ में बोले जा रही थी। छोटी तो छोटी थी एक बार बोलना शुरू किया तो फिर टीवी सीरियल की तरह क़िस्सा सुनाती रहेगी अगर बीच में कहीं माँ ने पुकारा लगा दिया—अरे छोटकी कछु ध्यान है की नाही रोटी सेंकय का है—फिर वह ठीक-ठीक है कहकर बैठक से उठकर चली जाती।

    गोपालबाबू घर पर बैठे माँ के साथ बचपन की बातें, नाना- नानी, ननिहाल और बाबा से जुड़ी स्मृतियों को मन के भीतर स्थित किसी स्टोर में रख ही रहे थे कि पता चला रामनारायणजी आए हैं। बहनों ने उनके नाम का संक्षिप्तीपरण कर रामनारायण से रानाजी कर दिया था। ऐसे कई काम बहनें शरारतवश करतीं लेकिन बाद में वह प्रचलन बन जाता।

    बाहर पहुँचा तो वे बैठे थे बेंच पर आराम से। आते ही नमस्कार कर बोले कल सुबह कय नाश्ता हमारे साथ कीन जाए गोपालबाबू कैसे टालते हाँ कर दिया वे कुछ देर बैठे रहे फिर चाय पी, रामजुहार कर चल दिए।

    अगले दिन सुबह नाश्ते पर जाना ही था कि छोटे भाई ने मजाक में कहा कि भैय्या रानाजी तो महाफड़तूस आदमी हैं चाय में मक्खी गिर जाए तो निकालकर पी जाते हैं। छोटे मुझे जानता था कि अगर मैंने हाँ कर दिया तो फिर मुझे रोक पाना माँ या बाबूजी या किसी अन्य के बूते से बाहर था। वजह थी कि हमारे सनातनी ब्राह्राण परिवार में मुझे सिर-फिरा माना जाता था। गोपालबाबू किसी भी तरह की पूजा प्रणाली और मंदिर में माथा झुकाने के सख़्त ख़िलाफ़ थे। दूसरी ओर परिवार के लोग देवी-देवता, पूजा, पाठ, परंपरा, कथा, व्रत, तीज त्यौहार में पूरा विश्वास रखते थे और उसके बिना एक भी क़दम आगे चलते थे। यही कारण था कई ऐसे लोग मेरे दोस्त थे जो कि निचले तबके के थे जिन्हें बाबूजी हों या माँ पसंद नहीं करते थे।

    अगले दिन सुबह पहली चाय पर गोपालबाबू रेलवे स्टेशन के पास सोहावल गाँव की पगडंडी जो कि अब बाकायदा खंडजा रोड़ हो गई थी उस पर जा पहुँचे थे। मुझे देखते ही रामनारायण लपककर आया और हाथ मिलाते हुए बोला कि पंडीजी हमका पूरा यक़ीन रहा कि आप ज़रूर आइहैं—

    उसने पहले से ही घर की दालान में चार कुर्सियाँ और मेज़ डाल रखी थी। एक किनारे पर पर तख़्त पड़ा था जिस पर एक गद्दा और उसके ऊपर चादर पड़ी हुई थी।

    कुछ ही देर में एक छोटा-सा बच्चा जो कि दस साल का रहा होगा वह एक ट्रे में पानी और बालूशाही मिठाई के चार टुकड़े रख गया था।

    गोपालबाबू बोले कि अरे क्या बात है बालूशाही अब भी यहाँ के हलवाई बनाते हैं?

    रामनारायण ने प्रतिप्रश्न किया—शहरन मा तो अब मिठाई मिलत होए।

    हाँ अब तो मिठाई कहाँ खा पाने का मौक़ा वैसे ही कहां मिलता है ऊपर से डायबिटीज का रोग?

    स्मृतियाँ अचानक से फिर बचपन में जाकर फ़्लैश बैक की तरह गोपालबाबू के मस्तिष्क में कौंधने लगी थीं जब मीठा ज़िंदगी का अहम हिस्सा था। बाबूजी भोजन के पश्चात रबड़ी या रसगुल्ला ज़रूर खाते जायका ऐसा कि हम सब बच्चे उसी में गुम होकर रह जाते। माँ के हाथ में हाँडी देखते ही अंदाज़ा लगाते कि उसमें जो सफ़ेद या गुलाबी क्या निकलेगा एकाध बार तो हम भाई-बहन शर्त लगा लेते कि आज तो राबड़ी देवी ही होंगी बाले हलवाई की दुकान से लाई गई। गोपालबाबू सोचते हैं कि बचपन भी क्या होता है कि जो बड़े हो जाने पर कहीं पीछे छूटकर गुम हो जाता है भीड़ में खोये आदमी की तरह। आदमी भी ज़िंदगी को जितना समझता है, उतनी ही वह हाथ से रेत की तरह फिसलती जाती है या रेल की खिड़की से भागते दृश्यों की भांति कहीं अदृश्य होकर रह जाती है।

    रामनारायण बोला कि अरे हम तो यही लिए मँगाए कि आपका अच्छा लागय। आप जब साथ माँ डिग्री कालेज जात रहे तो हम सब मिलके कालिका भंडार कय बालूशाही ज़रूर खात रहे।

    और हालचाल सुनाओ रामनारायण—कैसे चल रही है ज़िंदगी अब तो सब आनंद मंगल है की नहीं?

    रामनारायण का ठँडी सांस लेना और कहना कि हां भइया कि आप तो जाना जात है कि हम अपनी पूरी ज़िंदगी भाई बहिनन कय पालन पोषण, बीमारी-अजारी, शिच्छा देय मा गुजार दिए मगर जौन सोचे भवा नहीं।

    अरे साहब जैसे ही हमार सब भाई पढ़ि-लिखि गए और हम फिर सब कय शादी कर दिहेन वे लोग जब अच्छा कमाय-खाय लगे तो ज़िंदगी कय अलग रास्ता पकड़ अलग्योझा कय लिहिन। रामनारायण के भीतर का दर्द उसके चेहरे पर उतर आया था।

    हम सोचे कि पूरा परिवार मिलकर कमाए तो दिन दूना तरक्की होए लेकिन हियाँ तो सब ऐसन मतलबपरस्त निकले कि पूछा जाए घर कय बात है का कही, का ना कही।

    अरे साहब परिवार चलाना कौनो हंसी खेल का काम नहीं है। यहिके लिए पच्चीस तरह की धंधागिरी करय का पड़त है।

    मुझे अच्छी तरह से याद है कि रामनारायण को फ़िल्में देखने का बड़ा शौक था। कई फ़िल्में उसके साथ देखीं अगर पैसा नहीं होता था तो भी वह उसका इंतज़ाम कर लेता। मुझे याद आया कि कई बार धर्मयुग, रविवार सहित कई पत्रिकाएँ और साहित्यिक किताबें उसके घर में चहुँ ओर बिखरे कबाड़ से उठा लाया था। उसने कभी किसी पत्रिका या किताब के लिए मना नहीं किया जबकि यह उसका सीधा नुकसान होता था। मुझे छोड़कर वह दूसरों से किसी अच्छी किताब या पत्रिका के पैसे ले लेता था। वह कहता भी कि भैय्या सारे लोग दोस्त कहाँ हो सकते हैं। आप तो हमार पुरान दोस्त हैं हर मुश्किल में आपका ही सहारा या कि फिर आसरा रहता है।

    रामनारायण उर्फ़ कबाड़वाले की डायरी

    चलते समय रामनारायण अपनी डायरी मुझे दे गया था कि साहब हमार डायरी छप जात तो अच्छा रहत।

    क्या तुम लिखते भी हो?

    हाँ साहब एक बार चस्का लगा रहा एक शायर साहब मिल गए रहे वे बड़े ज्ञानी आदमी थे उन्हीं से कछु-कछु सीख लिए रहन।

    साहब रद्दी के धंधे में हम पैसा बहुत कमाए लेकिन इज़्ज़त गंवाए। हमार नाम सब भूल गए बस कबाडी बुलावत हैं जौन अच्छा नाही लागत दिल का बड़ी तकलीफ होत है।

    कबाड़वाला उर्फ रामनारायण—मेरे सीने में बहुत से राज दफ़न हैं क्या करूँ किससे कहूँ काम रद्दीवाले का क्या क़िस्मत लिखी भगवान ने। बचपन में बाबू नहीं रहे। वे एक देशी दारू के ठेके में कारकून का काम करते थे। शराब बेचते बेचते वे कब शराबी बन गए किसी को पता चला। माँ बतातीं है कि शुरू में वे बड़े फक्कड़ मस्त तबियत के इनसान थे हम चार भाई बहनों को बेइंतहा प्यार करते थे। हम लोग वैसे भी कलवार जाति से थे, जिनके घरों के बहुत से लोग शराब के काम में लगे रहते हैं। चौहद साल की उम्र में रामनारायण पिताविहीन हो गए थे। पिता के मरते ही रामसमुझ नाम के हमारे बाबा ने अगले ही दिन बंटवारा कर दिया था। माँ ने किराने और कागज के लिफ़ाफ़े बनाने का काम शुरू कर दिया था।

    डायरी में कई स्थानों पर कार्टून या चुटुकुले और कहीं-कहीं शायरी की पंक्तियाँ भी दर्ज़ थीं।

    (डायरी का एक पन्ना)

    गोपाल बाबू जानते थे कि रामनारायण लेखक होता तो अपनी कहानी लिखता लेकिन अपनी दाल रोटी में उलझा कमेरा था जो सब कुछ छोड़कर रद्दी तौलने और सुबह से शाम तक उसे कहां किसके घर रद्दी मिलेगी इसका पूरा ध्यान रखना पड़ता था। वह अच्छे से जानता था कि अगर दोपहर या शाम तक उसके साइकिल के करियर में टंगे हुक से लटके बोरे भरे तो समझो कि आज का दिन उसके परिवार को भूखा ही सुलाएगा, यह सोचते ही उसकी रूह काँप जाती और वह दुगुनी शक्ति लगाकर चिल्लाता–कबाड़वाला–अख़बार, कबाड़, प्लास्टिक का सामान, खाली शीशी, बोतल बेचिए...।

    एक ओर आवाज़ देता तो दूसरी ओर मन ही मन भगवान का नाम भजता कि दिन खाली जाए कछु धंधा पानी भर का काम निकल जाए। वह दरवाज़े दर दरवाज़े और मोहल्ले दर मोहल्ले चक्कर लगाता जाता। एक गली से निकलकर दूसरी गली घूमता ही रहता था।

    वह गाता था कि—वक्त कभी फूलों की सेज वक्त कभी काँटों का ताज कौन जाने किस घड़ी वक्त का बदले मिज़ाज।

    रामनारायण उर्फ़ कबाड़ी अच्छा तरह जानता था कि किन घरों से रद्दी मिल सकती है क्योंकि जो घर संपन्न और पढ़े लिखे लोगों के थे वही अख़बार ख़रीदते थे और रद्दी भी उन्हीं के घरों से निकला करती। अब किसी ग़रीब के घर रद्दी कहां से आती जिसे दो जून की रोटी के भी लाले हों।

    महीने के अंत में जब लोगों के हाथ पैसे से खाली होते थे, उसी समय रद्दी निकला करती थी या फिर गर्मियों में जब बच्चों के सत्र समाप्त होते तब रद्दी निकलती थी।

    सबसे ज़्यादा रद्दी दीपावली पर मिलती जब घरों की साफ़-सफ़ाई होती थी। दीपावली के दौरान तो वह हाथरिक्शा चलाकर एक एक दिन कई बोरा रद्दी लाता। यही एक ऐसा समय होता था जब उसके पौ बारह रहते थे।

    एक बार जब वे ढेर सारी रद्दी लेकर कबाड़वाला जब घर पहुँचे तो उसको एक ठाकुर साहब के घर से लाई रद्दी में दस हज़ार रुपए के इंदिरा विकास पत्र मिले थे। उसने अगले ही दिन उनको पत्र लौटा दिए थे। वे इतना ख़ुश हुए कि सस्ती के जमाने में सौ रुपए दे दिए थे बच्चों की मिठाई के वास्ते।

    उसे याद है कि रद्दी में मिली पत्रिकाओं डायरियों में एक नहीं कई बार नोट, प्रेमपत्र, कंडोम के पैकेट, मुक़दमे के काग़ज़, बटुए, फ़ोटो वाले फ्रेम, नक्काशीदार कढ़ाई वाले फ़ोटो, बिजली के बिल, जाने क्या-क्या मिलते। उसका मन करता कि सब कुछ रख ले लेकिन ऐसा ख़ासा टेढ़ा काम था। उसने कई बार समझ में आने पर महत्वपूर्ण चीज़ें संबंधितों को लौटा दी थीं। वह सोचता था कि कैसे ज़िंदगी में काम आने वाले सामान कबाड़ में बदल जाते हैं। ज़िंदगी की तरह उनकी भी मौत हो जाती है फिर उसे रिसाइकिल करने भेजना पड़ता है। उसके घर तीन चार घँटे बीताकर गोपालबाबू घर गए थे।

    शहर लौटने के कुछेक महीनों के बाद गोपालबाबू को एक दिन उनके मित्र शिवबहादुर ने मोबाइल फ़ोन पर जानकारी दी कि आपके बचपन के पुराने दोस्त रामनारायण कबाड़वाले नहीं रहे। वजह पूछने पर उसने कहा कि दरअसल वे अपनी पोती की शादी कानपुर शहर के एक खाते-पीते परिवार में तय करके आए थे। शादी की सारी तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं। शिवबहादुर बोलता जा रहा कि अचानक रामनारायणजी को कानपुर बुलाया गया और फिर लड़की की होने वाली सास ने उनको सुनाना शुरू किया कि हमने अपने बेटे की शादी यह सोचकर तय की थी कि लड़की पढ़ी-लिखी और सुंदर है। हमें तो ये बात पता ही थी लड़की के परिवारवाले यानी कि आप लोग कबाड़ का काम करते हैं। मेरे पति ने मुझे अँधेरे में रखा।

    लड़के की माँ ने रामनारायणजी से कहा कि हम किसी कबाड़वाले की बेटी को घर की बहू नहीं बना सकते। हमें कबाड़ की दुकान नहीं खोलनी है, आख़िर हमने समाज में जो थोड़ी बहुत इज़्ज़त कमाई है उसका हम सत्यानाश नहीं करना चाहते। लड़के की सास ने रामनारायणजी से कहा कि हमारे पति सीधे सादे आदमी हैं आपने उनको बरगला लिया लेकिन हम लोग कोई भिखमंगे नहीं हैं कि किसी का भी रिश्ता तय कर लें। इससे पहले कि रामनारायणजी कुछ बोलते कि लड़के के परिवार की औरतों ने हाथ जोड़कर रिश्ते करने से मना कर दिया। घर के मर्द घर रामनारायणजी के सामने ना ही उनका फ़ोन उठाया।

    रामनारायण निराश होकर ख़ामोशी से घर लौट आए। दरअसल रामरानारायणजी के मन मस्तिष्क पर पोती का रिश्ता टूट जाने का सदमा भीतर जाकर गहरे से बैठ गया। ये घटना उनके मन में नासूर बनकर ऐसी बैठी कि ब्रेन हैमरेज से अंतत: एक हफ़्ते बाद ही उनकी मौत हो गई। दोस्त बोलता जा रहा था कि यह समाज आख़िर कब अपनी सोच कब बदलेगा?

    यह तो आगे जाने के बजाए सदियों पीछे जा रहा है। दोस्त की बात का गोपालबाबू के पास कोई जवाब था...। गोपालबाबू सोच रहे थे कि कबाड़ का धंधा रामनारायण के परिवार का सच था लेकिन क्या कबाड़ी होना उनकी ज़िंदगी का कोई गुनाह था?

    स्रोत :
    • रचनाकार : अशोक मिश्र
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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