इक्केवाला

और अधिकविश्वंभरनाथ शर्मा 'कौशिक'

    स्टेशन के बाहर मैंने अपने साथी मनोहरलाल से कहा—कोई इक्का मिल जाए तो अच्छा है—'दस मील का रास्ता है।'

    मनोहरलाल बोले—'आइए, इक्के बहुत हैं। उस तरफ़ खड़े होते हैं।'

    हम दोनों चले। लगभग दो सौ गज़ चलने के पश्चात देखा, तो सामने एक बड़े वृक्ष के नीचे तीन-चार इक्के खड़े दिखाई दिए। एक इक्का अभी आया था और उस पर से दो आदमी अपना असबाब उतर रहे थे। मनोहरलाल ने पुकारा—'कोई इक्का गंगापुर चलेगा?'

    एक इक्केवाला बोला—'आइए सरकार, मैं ले चलूँ। कै सवारी है?'

    'दो सवारी—गंगापुर का क्या लोगे?'

    जो सब देते हैं, वही आप भी दे दीजिएगा।'

    आख़िर कुछ मालूम तो हो?'

    'दो रुपए का निरख (निर्ख) है।'

    'दो रुपए?—इतना अधेर।'

    इसी समय जो लोग अभी आए थे, उनमें और उनके इक्केवाले में झगड़ा होने लगा। इक्केवाला बोला—'यह अच्छी रही, वहाँ से डेढ़ रुपया तय हुआ, अब यहाँ बीस ही आने दिखाते हैं!'

    यात्रियों में से एक बोला—'हमने पहले ही कह दिया था कि हम बीस आने से एक पैसा अधिक देंगे।'

    'मैंने भी तो कहा था, कि डेढ़ रुपए से एक पैसा कम लूँगा।'

    'कहा होगा, हमने सुना ही नहीं।'

    'हाँ, सुना नहीं—ऐसी बात आप काहे को सुनेंगे।'

    'अच्छा तुम्हे बीस आने मिलेंगे—लेना हो तो लो, नहीं अपना रास्ता देखो।'

    इक्केवाला, जो हृष्ट-पुष्ट तथा गौरवर्ण था, अकड़ गया। बोला—'रास्ता देखे, कोई अधेर है! ऐसे रास्ता देखले लगे, तो बस कमाई कर चुके। बाएँ हाथ से इधर डेढ़ रुपया रख दीजिए, तब आगे बढ़िएगा। वहाँ तो बोले, अच्छा जो तुम्हारा रेट होगा, वह देंगे, अब यहाँ कहते हैं, रास्ता देखो—अच्छे मिलें!'

    हम लोग यह कथोप-कथन सुनकर इक्का करना भूल गए और उनकी बातें सुनने लगे। एक यात्री बड़ी गंभीरतापूर्वक बोला—'देखो जे, यदि तुम भलमनसी से बातें करो, तो दो-चार पैसे हम अधिक दे सकते हैं, तुम ग़रीब आदमी हो; लेकिन जो झगड़ा करोगे तो एक पैसा मिलेगा।'

    इक्केवाला किंचित मुस्कराकर बोला—'दो-चार पैसे! ओफ़! ओफ़! आप तो बड़े दाता मालूम होते हैं। जब चार पैसे देते हो, तो चार आने ही क्यों नहीं दे देते?'

    'चार आने हमारे पासे नहीं हैं।'

    'नहीं है—अच्छी बात है, तो जो आपके पास हो वही दे दीजिए—न हो दीजिए और ज़रूरत हो तो एकाध रुपया मैं आपको दे सकता हूँ।'

    'तुम बेचारे क्या दोगे, चार-चार पैसे के लिए तो तुम झूट बोलते हो और बेईमानी करते हो।'

    अरे बाबूजी, लाखों रुपए के लिए तो मैंने बेईमानी की नहीं—चार पैसे के लिए बेईमानी करूँगा? बेईमानी करता तो इस समय इक्का हाँकता होता। ख़ैर, आपको जो देना हो दे दीजिए—नहीं जाइए—मैंने किराया भर पाया।'

    उन्होंने बीस आने निकालकर दिए, इक्केवाले ने चुपचाप ले लिए।

    उस इक्केवाले कका आकर-प्रकार, उसकी बातचीत से मुझे कुछ ऐसा प्रतीत हुआ कि अन्य इक्केवालों की तरह यह साधारण आदमी नहीं है। इसमें कुछ विशेषता अवश्य है; अतएव मैंने सोचा कि यदि हो सके, तो गंगापुर इसी इक्के पर चलना चाहिए। यह सोचकर मैंने उससे पुछा—'क्यों भाई गंगापुर चलोगे?'

    वह बोला—'हाँ! हाँ! आइए!'

    'क्या लोगे?'

    'वही डेढ़ रुपया!'

    मैंने सोचा, अन्य इक्केवाले तो दो रुपए माँगते थे, वह डेढ़ रुपया कहता है, आदमी सच्चा मालूम होता है। वह सोचकर मैंने कहा—'अच्छी बात है, चलो डेढ़ रुपया देंगे।'

    हम दोनों सवार होकर चले। थोड़ी दूर चलने पर मैं पुछा—'वे दोनों कौन थे?' इक्केवाले ने कहा—'नारायण जाने कौन थे? परदेशी मालूम होते हैं, लेकिन परले-सिरे के झूठे और बेईमान! चार आने के लिए प्राण तजे दे रहे थे।'

    मैंने पुछा—तो सचमुच तुमसे डेढ़ रुपया ही तय हुआ था?'

    'और नहीं क्या आप झूठ समझते हैं? बाबूजी, यह पेशा ही बदनाम है, आपका कोई क़ुसूर नहीं। इक्के, ताँगेवाले सदा झूठे और बेईमान समझे जाते हैं। और होते भी हैं—अधिकतर तो ऐसे ही होते हैं। इन्हें चाहें आप रूपये की जगह सवा रुपया दीजिए, तब भी संतुष्ट नहीं होते।'

    मैंने पुछा—'तुम कौन जाति हो?'

    'मैं? मैं तो सरकार वैश्य हूँ।'

    'अच्छा! वैश्य होकर इक्का हाँकते हो?'

    'क्यों सरकार, इक्का हाँकना कोई बुरा काम तो है नहीं?'

    'नहीं, मेरा मतलब यह नहीं है कि इक्का हाँकना कोई बुरा काम है। मैंने इसलिए कहा कि वैश्य तो बहुधा व्यापार करते हैं।'

    'यह भी तो व्यापार ही है।'

    'हाँ, है तो व्यापार ही।'

    मैंने मन-ही-मन अपनी इस बेतुकी बात पर लज्जित हुआ; अतएव मैंने प्रसग बदलने के लिए पुछा—कितने दिनों से यह काम करते हो?

    'दो बरस हो गए।'

    'इसके पहले क्या करते थे?'

    यह सुनकर इक्केवाला गंभीर होकर बोला—'क्या बताऊँ, क्या करता था?

    उसकी इस बात से तथा यात्रियों से उसने जो बातें कहीं थीं, उनका तारतम्य मिलाकर मैंने सोचा—इस व्यक्ति का जीवन रहस्यमय मालूम होता है। यह सोचकर मैंने उससे पुछा—'कोई हर्ज समझो तो बताओ।'

    'हर्ज तो कोई नहीं है बाबूजी। पर मेरी बात पर लोगों को विश्वास नहीं होता। इक्केवाले बहुधा परले-सिरे के गप्पी समझे जाते हैं, इसलिए मैं किसी को अपना हाल सुनाता नही।'

    'ख़ैर, मैं उन आदमियों में नहीं हूँ, यह तुम विश्वास रखो।'

    'अच्छी बात है सुनिए—

    2

    'मैं अगरवाला बनिया हूँ। मेरा नाम श्यामलाल है। मेरा जन्म-स्थान मैनपूरी है। मेरे पिता व्यापार करते थे। जिस समय मेरे पिता की मृत्यु हुई, उस समय मेरी उम्र पंद्रह साल की थी। पिता के मरने पर घर-गृहस्थी का सारा भार मेरे ऊपर पड़ा। मैंने एक वर्ष तक काम-काज चलाया, पर मुझे व्यापार का अनुभव था, इस कारण घाटा हुआ और मेरा सब काम बिगड़ गया। अंत को और कोई उपाय देखे मैंने वहीं एक धनी आदमी के यहाँ नौकरी कर ली। उस समय मेरे परिवार में मेरी माता और एक छोटी बहन थी। जिसके यहाँ मैंने नौकरी की थी, वह तो थे मालदार, परंतु बड़े कंजूस थे। ऊपर से देखने में वह एक मामूली हैसियत के आदमी दिखाई पड़ते थे, परंतु लोग कहते थे कि उनके पास एक लाख के लगभग नक़द रुपया है। उस समय मैंने लोगों की बात पर विश्वास नहीं किया था, क्योंकि घर की हालत देखने से किसी को यह विश्वास नहीं हो सकता था कि उनके पास इतना रुपया होगा। उनकी उम्र चालीस से ऊपर थी। उन्होंने दूसरी शादी की थी और उनकी पत्नी की उम्र बीस वर्ष के लगभग थी। पहली स्त्री से उनके एक लड़का था। वह जवान था और उसका विवाह इत्यादि सब हो चूका था। उसका नाम शिवचरणलाल था। पहले तो वह अपने पिता के पास ही रहता था, परंतु जब पिता ने दूसरा विवाह किया, तो वह नाराज़ होकर अपनी स्त्री सहित फ़रुर्ख़ाबाद चला गया। वहाँ उसने एक दूकान कर ली और वहीं रहने लगा।'

    'उन दिनों मुझे कसरत करने का बड़ा शौक़ था, इसलिए मेरा बदन बहुत अच्छा बना हुआ था। कुछ दिनों पश्चात् मेरी मालकिन मेरी बहुत ख़ातिर करने लगी। ख़ूब मेवा-मिठाई खिलाती थीं और महीने में दस-बीस रूपये नक़द दे देती थी। इस कारण दिन बड़ी अच्छी तरह कटने लगे। मैं मालकिन के ख़ातिर करने का असली मतलब उस समय नहीं समझा। मैंने जो समझा, वह यह था कि मेरी सेवा से प्रसन्न होकर तथा मुझे ग़रीब समझकर वह ऐसा करती हैं। आख़िर जब एक दिन उन्होंने मुझे एकाँत में बुलाकर छेड़-छाड़ की, तब मेरी आँखें खुली। मुझे आरम्भ से ही इन कामों से नफ़रत थी। मैं इन बातों को जानता भी नहीं था। कभी ऐसी संगति ही में रहा था जिसमें इन बातों का ज्ञान प्राप्त होता। मैं उस समय जो जानता था वह यह था कि आदमी को ख़ूब कसरत करनी चाहिए और स्त्रियों से बचना चाहिए। जब मालकिन ने छेड़-छाड़ की, तो मेरा कलेजा धड़कने लगा। मुझे ऐसा मालूम हुआ, कि वह एक चुड़ैल है और मुझे भक्षण करना चाहती है।'

    इक्केवाले की इस बात पर मेरे साथी मनोहरलाल बहुत हँसे। बोले—तुम तो बिल्कुल बुद्धू थे जी!

    श्यामलाल बोला—'अब जो समझिए, परंतु बात ऐसी ही थी। ख़ैर, मैं अपना हाथ छुड़ाकर उनके सामने से भाग आया। अब मुझे उनके सामने जाते डर मालूम होने लगा। यही खटका लगा रहता था, कि कहीं किसी दिन फिर पकड़ ले। तीन-चार दिन के बाद वही हुआ। उन्होंने अवसर पाकर फिर मुझे घेरा। उस दिन मैंने उनसे साफ़-साफ़ कह दिया, कि यदि वह ऐसी हरकत करेंगी, तो मैं मालिक से कह दूँगा। बस, उसी दिन से मेरी ख़ातिर बंद हो गई। केवल ख़ातिर बंद रह जाती, वहाँ तक ग़नीमत थी; परंतु अब उन्होंने मुझे तंग करना आरम्भ कर दिया। बात-बात पर डाँटती थी। कभी मालिक से शिकायत कर देती थी। आख़िर जब एक दिन मालिक ने मुझे मालकिन के कहने से बहुत डाँटा, तो मैंने उन्हें अलग ले जाकर कहा—लालाजी, मेरा हिसाब कर दीजिए, मैं अब आपके यहाँ नौकरी नहीं करूँगा। लालाजी लाल-पीली आँखें करके बोले—एक तो क़ुसूर करता है और उसपर हिसाब माँगता है? मुझे भी तैश गया। मैंने कहा—क़ुसूर किस ससुरे ने किया है? लालाजी बोले—तो क्या मालकिन झूठ कहती है? मैंने कहा—बिल्कुल झूट! लालाजी ने कहा—तेरे से उनकी शत्रुता है क्या? मैंने कहा—हाँ शत्रुता है। उन्होंने पुछा—क्यों? मैंने कहा—अब आपसे क्या बताऊँ। आप उसे भी झूठ मानेंगे। इसलिए सबसे अच्छी बात यही है कि मेरा हिसाब कर दीजिए। मेरी बात सुनकर लाला के पेट में खलबली मची। उन्होंने कहा—पहले यह बता कि बात क्या है? मैंने कहा—उसके कहने से कोई फ़ायदा नहीं, आप मेरा हिसाब दे दीजिए। परंतु लाला मेरे पीछे पड़ गए। मैंने विवश होकर सब हाल बता दिया। मुझे भय था, कि लाला को मेरी बात पर विश्वाश होगा, पर ऐसा नहीं हुआ। लाला ने मेरी पीठ पर हाथ फेरकर कहा—शाबास श्यामलाल, मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। अब तुम आनंद से रहो, तुम्हारी तरफ़ कोई आँख नहीं देख सकेगा। बस उस दिन से मैं निर्द्वन्द्व हो गया। अब अधिकतर मैं मालिक के पास बाहर ही रहने लगा, भीतर कम जाता था। उसके पश्चात् भी मालकिन ने मेरे निकलवाने के लिए चेष्टा की, पर लाला ने उनकी एक सुनी। आख़िर वह भी हारकर बैठ रही।'

    इस प्रकार एक वर्ष और बीता। इस बीच में लाला के एक रिश्तेदार—जो उनके चचेरे भाई होते थे—बहुत आने-जाने लगे। उनकी उम्र पच्चीस-छब्बीस वर्ष के लगभग होगी। शरीर के मोटे-ताज़े और तंदुरुस्त आदमी थे। पहले तो मुझे उनका आना-जाना कुछ नहीं खटका, पर जब उनका आना-जाना हद से अधिक बढ़ गया और मैंने देखा कि वह मालकिन के पास घंटों बठे रहते हैं तो मुझे संदेह हुआ, कि हो हो दाल में कुछ कला अवश्य है। लालाजी अधिकतर दुकान में रहने के कारण यह बात जानते थे। घर का कहार भी मालकिन से मिला हुआ मालूम होता था, इसलिए वह भी चुप्पी साधे था। एक मैं ही ऐसा था, जिसके द्वारा लाला को यह ख़बर मिल सकती थी। अंत में मैंने इस रहस्य का पता लगाने पर कमर बाँधी और एक दिन अपनी आँखों उनकी पापमर्इ लीला देखी। बस उसी दिन मैंने लाला को ख़बर कर दी। लाला उस बात को चुपचाप पी गए। आठ-दस रोज़ बाद लाला ने मुझे बुलाकर कहा—श्यामलाल, तेरी बात ठीक निकली, आज मैंने भी देखा। जिस दिन तूने कहा था, उसी दिन से मैं इसकी टोह में था—आज तेरी बात की सत्यता प्रमाणित हो गई। अब बता क्या करना चाहिए? मैंने कहा—मैं क्या बताऊँ, आप जो उचित समझे, करें।'

    'लाला ने पूछा—तेरी क्या राय है? मैंने इस उम्र में विवाह करके बड़ी भूल की, पर अब इसका उपाय क्या है? मैंने कहा—अपने भाई साहब का आना-जाना बंद कर दीजिए, यही उपाय है और हो ही क्या सकता हा? लाला ने सोचकर कहा—हाँ, यही ठीक है। जी में तो आता है कि इस औरत को निकाल बाहर करूँ, पर इसमें बड़ी बदनामी होगी। लोग हँसेंगे कि पहले तो विवाह किया, फिर निकाल दिया।'

    'मैंने कहा—हाँ, यह तो आपका कहना ठीक है। बस, उनका आना जाना बंद कर दीजिए, अतएव उसी दिन से यह हुकुम लग गया, कि लाला की अनुपस्थिति में बाहर का कोई आदमी—चाहे रिश्तेदार हो, चाहे कोई हो—अंदर जाने पाए। और यह काम मेरे सुपुर्द किया गया। उस दिन से मैंने उन्हें नहीं धंसने दिया। इसपर उन्होंने मुझे प्रलोभन भी दिए, धमकी भी दी, पर मैंने एक सुनी। मालकिन ने भी बहुत कुछ कहा-सुना, ख़ुशामद की, पर मैं ज़रा भी पसीजा। कहरवा भी बोला—तुमसे क्या मतलब है, जो होता है, होने दो। मैंने उससे कहा—सुनता है बे, तू तो पक्का नमकहराम है, जिसका नामक खाता है, उसी के साथ दग़ा करता है। ख़ैरियत इसी में है कि चुप रह, नहीं तो तुझे भी निकाल बाहर करूँगा।'

    'यह सुनकर कहारराम चुप हो गए।'

    'थोड़े दिन बाद लाला के उन रिश्तेदार ने आना-जाना बिल्कुल बंद कर दिया। अब वह लाला के पास भी नहीं आते थे। मैंने भी सोचा, चलो अच्छा हुआ, आँख फूटी पीर गई।'

    'इसके छ: महीने बाद एक दिन लाला को हैज़ा हो गया मैंने बहुत दौड़-धूप की, इलाज इत्यादि कराया; पर कोई फ़ायदा हुआ। लाला जी समझ गए कि अंत समय निकट है; अतएव उन्होंने मुझे बुलाकर कहा—श्यामलाल, मैं तुझे अपना नौकर नहीं, पुत्र समझता हूँ; इसलिए मैं अपनी कोठरी की ताली तुझे देता हूँ। मेरे मरने पर ताली मेरे लड़के को दे देना और जब तक वह जाए, तब तक किसी को कोठरी खोलने देना। बस, तुझेसे मैं इतनी अंतिम सेवा चाहता हूँ।'

    'मैंने कहा—ऐसा ही होगा, चाहे मेरे प्राण ही क्यों चले जाएँ, पर मैं इसमें अंतर पड़ने दूँगा। इसके पश्चात् उन्होंने मुझे पाच हज़ार रूपये नक़द दिए और बोले—यह लो, मैं तुम्हें देता हूँ। मैं लेता था। पर उन्होंने कहा—तू यदि लेगा, तो मुझे दुःख होगा, अतएव मैंने ले लिए। इसके चार घंटे बाद उनका देहांत हो गया। उनके लड़के को उनके मरने के तीन घंटे पहले तार दे दिया गया था। उनके मरने के पाँच घंटे बाद वह मैनपुरी पहुँचा था। उनका देहांत रात को आठ बजे हुआ और वह रात के दो बजे के निकट पहुँचा था। लाला के मरने के बाद उनकी स्त्री ने मुझेसे कहा—कोठरी की ताली लाओ। मैंने कहा—ताली तो लाला शिवचरणपाल के हाथ में देने को कह गए हैं, मैं उन्हीं को दूँगा। उन्होंने कहा—अरे मूर्ख, इससे तुझे क्या मिलेगा। कोठरी खोलकर रूपया निकल ले—मुझे मत दे, तू ले ले, मैं भी तेरे साथ रहूँगी, जहाँ तू चलेगा, तेरे साथ चलूँगी। मैंने कहा—मुझसे होगा। मैं तुम्हे ले जाकर रखूँगा कहाँ? दुसरे तुम मेरे उस मालिक की स्त्री हो, जो मुझे अपने पुत्र के समान मानता था। मुझसे यह होगा, कि तुम्हे अपनी स्त्री बनाकर रखूँ।'

    'बाबूजी, एक घंटे तक उसने मुझे समझाया, रोई भी, हाथ भी जोड़े; परंतु मैंने एक मानी। आख़िर उसने अन्य उपाय देख अपने देवर अर्थात् उन्हीं को बुलाया, जिनका आना-जाना मैंने बंद कराया था। उन्होंने आते ही बड़ा रुआब झाड़ा। मुझे पुलिस में देने की धमकी दी, पर मैं इससे भयभीत हुआ। तब वह ताला तोड़ने पर आमादा हुए। मैं कोठरी के द्वार पर एक मोटा डंडा लेकर बैठ गया और मैंने उनसे कह दिया कि जो कोई ताला तोड़ने आएगा, पहले मैं उसका सिर तोडूँगा, इसके बाद जो होगा देखा जाएगा। बस फिर उनका साहस हुआ। इस रगड़े-झगड़े में रात के दो बज गए और शिवचरणलाल गए। मैंने उनको ताली दे दी और सब हाल बता दिया।

    'बाबूजी, जब कोठरी खोली गई, तो उसमे साठ हज़ार रूपये नक़द निकले। इन रुपयों का हाल लाला के अतिरिक्त और किसी को भी मालूम था। यदि मैं मालकिन की बात मानकर बीस-पच्चीस हज़ार रूपये भी निकाल लेता, तो किसी को भी संदेह होता, पर मेरे मन में इस बात का विचार एक क्षण के लिए भी पैदा हुआ। मेरी माँ रोज़ रामायण पढ़कर मुझे सुनाया करती थीं, और मुझे यही समझाया करती थी कि—बेटा, पाप और बेईमानी से सदा बचना, इससे तुझे कभी दुःख होगा। उनकी यह बातें मेरे जी में बसी हुई थीं और इसीलिए मैं बच गया। उसके बाद शिवचरणलाल ने भी मुझे एक हज़ार रुपया दिया। साथ ही उन्होंने यह कहा कि तुम मेरे पास रहो; पर लाला के मरने से और जो अनुभव मुझे हुए थे, उनके कारण मैंने उनके यहाँ रहना उचित समझा। लाला की तेरही होने के बाद मैंने उनकी नौकरी छोड़ दी। छ: हज़ार रूपये में से दो हज़ार मैं अपनी बहन के ब्याह में ख़र्च किए और दो हज़ार अपने ब्याह में ख़र्च किए। एक हज़ार लगाकर एक दुकान की और हज़ार बचाकर रखा; पर दूकान में फिर घाटा हुआ। तब मैंने मैनपुरी छोड़ दी और इधर चला आया। नौकरी करने की इच्छा नहीं थी, इसलिए मैंने इक्का-घोड़ा ख़रीद लिया और किराए पर चलाने लगा—तबसे बराबर यही काम कर रहा हूँ। इसमें मुझे खाने-भर को मिल जाता है। अपने आनन्द से रहता हूँ, किसी के लेने में हूँ, देने में। अब बताइए, वह बाबू कहते थे कि चार आने पैसे के लिए मै बेईमानी करता हूँ। अब मैं उनसे क्या कहता। यह तो दुनिया है, जो जिसकी समझ में आता है, कहता है। मैं भी सब सुन लेता हूँ। इक्केवाले बदनाम हैं, इसलिए मुझे भी ये बाते सुननी पड़ती हैं।'

    श्यामलाल की आत्मकहानी सुनकर मैं कुछ देर तक स्तब्ध रह बैठा रहा। इसके पश्चात् मैंने कहा—'भाई, तुम तो दर्शनीय आदमी हो, तुम्हारे तो चरण छूने को जी चाहता है।'

    श्यामलाल हँसकर बोला—'अजी बाबूजी, क्यों काँटों में घसीटते हो? मेरे चरण और आप छुए—राम! राम! मैं कोई साधू थोड़े ही हूँ।'

    मैंने कहा—'और साधु कैसे होते हैं; उनके कोई सुर्खाव का पर तो लगा होता नहीं। सच्चे साधू तो तुम्हीं हो।' यह सुनकर श्यामलाल हँसने लगा। इसी समय गंगापुर गया और हमलोग इक्के से उतरकर अपने निर्दिष्ट स्थान की ओर चल दिए।

    रास्ते में मैंने मनोहरलाल से कहा—'इस संसार में अनेकों लाल गुदड़ी में छिपे पड़े हैं। उन्हें कोई जानता तक नहीं।'

    मनोहरलाल—'जी हाँ! और नामधारी ढोंगी महात्मा ईश्वर की तरह पूजे जाते हैं।'

    बात बहुत पुरानी हो गई है, पता नहीं, महात्मा श्यामलाल अब भी जीवित हैं या नहीं, परंतु अब भी जब कभी मुझे उनका स्मरण हो आता है तो ये उनकी काल्पनिक मूर्ति के चरणों में अपना मस्तक नत कर देता हूँ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : गल्प-संसार-माला, भाग-1 (पृष्ठ 29)
    • संपादक : श्रीपत राय
    • रचनाकार : विश्वम्भरनाथ शर्मा 'कौशिक'
    • प्रकाशन : सरस्वती प्रकाशन, बनारस
    • संस्करण : 1953

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