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महामूर्ख

mahamurkh

तेनालीराम

तेनालीराम

महामूर्ख

तेनालीराम

और अधिकतेनालीराम

    होली और दीवाली दो त्योहार ऐसे थे जिनपर महाराज कृष्णदेव राय अपने दरबारियों को विशेष उपाधियाँ दिया करते थे। दीवाली पर पंडितश्री की उपाधि दी जाती थी और होली पर महामूर्ख राज की।

    इसे इत्तेफ़ाक ही कहा जाएगा कि अपनी तीक्षा बुद्धि के बल पर हर बार यह उपाधियाँ और इनसे संबंधित उपहार तेनालीराम ही झटक ले जाते थे। इस बार भी होली का त्योहार आया तो चारों ओर धूम मच गई। सभी दरबारियों की एक गुप्त सभा हुई जिसमें तय हुआ कि इस बार 'महामूर्ख राज' का ख़िताब और उपहार तेनालीराम को नहीं लेने दिया जाएगा।

    महाराज की ओर से इस बार दस हज़ार स्वर्ण मुद्राओं का इनाम घोषित किया गया था। ख़ैर, इस बार सभी दरबारियों ने फैसला कर लिया कि ख़िताब और उपहार तेनालीराम को लेने दिया जाए इसके लिए उन्होंने तेनालीराम के ख़ास सेवक को पढ़ा-लिखाकर इनाम का लालच देकर तेनालीराम को छककर भाँग पिलवा दी ताकि होली उत्सव पर वह अपने घर पर ही सोता रहे और राजकीय उत्सव में शामिल हो सके।

    दुपहर बाद तेनालीराम का नशा कुछ हलका हुआ तो हड़बड़ाकर वह उठा और घबराहट में ही राजमहल की ओर दौड़ पड़ा। राजा कृष्णदेव राय उसे देखते ही डपटकर बोले—“अरे तेनालीराम! यह क्या मूर्खता की कि आज के दिन भी भाँग घोंटकर सो गए।

    तेनालीराम पर झाडू पड़ते देखकर सभी दरबारी प्रसन्न हो उठे और बोले—“आप बिकुल ठीक कहते हैं महाराज! सचमुच बड़ा ही मूर्खतापूर्ण कार्य किया है तेनालीराम ने। ये मूर्ख ही नहीं महामूर्ख है।” “हाँ— महामूर्ख। “महाराज के श्रीमुख से यह सुनते ही तेनालीराम की आँखे चमक उठीं। वह बोला—“आपने मुझे महामूर्ख कहा महाराज?”

    “तुम्हारा कार्य ही मूर्खों जैसा है। तुम्हें तो इस राजकीय उत्सव में सबसे पहले उपस्थित होना चाहिए था।” “इसलिए मैं महामूर्ख हुआ।” “बिल्कुल। महाराज चटखारा सा लेकर बोले।” “क्यों भाइयों।” तेनालीराम दरबारियों की ओर घूम गए। फिर पूछा—“क्या आप लोग भी ऐसा ही समझते हैं कि मैं महामूर्ख हूँ?”

    हाँ बिल्कुल—तुम महामूर्ख हो? सभी दरबारी एक स्वर में बोले। “महाराज!” तेनालीराम महाराज से मुख़ातिब होकर बोला—“आपका और पूरी सभा का आज होली उत्सव पर यह फैसला है कि मैं महामूर्ख हूँ इसलिए महाराज से मेरा निवेदन है कि इस उत्सव की सबसे बड़ी उपाधि 'मूर्खराज' और सबसे बड़ा पुरस्कार दस हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ मुझे प्रदान करने की कृपा करें।

    और इस प्रकार होली के अवसर की सबसे बड़ी उपाधि और पुरस्कार तेनालीराम ने झपट लिया। उसकी चतुराई देखकर महाराज मन ही मन उसकी प्रशंसा किए बिना रह सके।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चर्चित एवं लोकप्रिय कहानियाँ “तेनालीराम” (पृष्ठ 96)
    • रचनाकार : तेनालीराम
    • प्रकाशन : प्रशांत बुक डिस्ट्रीब्यूटर
    • संस्करण : 2018

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