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एक स्त्री का विदा-गीत

ek stri ka vida geet

मृणाल पाण्डे

मृणाल पाण्डे

एक स्त्री का विदा-गीत

मृणाल पाण्डे

और अधिकमृणाल पाण्डे

    जाड़े की पतली धूप फुनगियों से आहिस्ता-आहिस्ता उतर रही थी, जैसे सद्यः प्रसूता बंदरिया उतरती है, पेड़ से अपना बच्चा चिपकाए हुए। हवा के झोंकों से डालें रह-रहकर सिर उठातीं तो जाड़े का आसमान डालों के परे ख़ूब साफ़, पर घिसी-जीर्ण नीली धोती-सा चमकता।

    सावित्री ने बुनते-बुनते सलाई से सिर खुजाया, जैसी कि उसकी आदत थी, फिर कुछ बुदबुदाकर चुपचाप बुनने लगी। भीतर घर में रोज़मर्रा की सफ़ाई चालू हो गई थी। सींकों की झाड़ से रगड़-रगड़कर धुलते फ़र्श का सुरसुराहट-भरा सीत्कार, पानी की तड़प-भरी सड़ाप-सड़ाप, फिर गट-गट-गट, उसका एक हिचकी-सी लेकर नीचे गटर में प्रवेश करना, रसोई में पतीलों के माँजे जाने की ध्वनि, जो जैसे-जैसे पतीला घुमाया जाता, रुक-रुककर पहलू बदलती, नल की बहती धार, पटके जाते कपड़ों की हुम्म-हम्म। कितना कुछ बदलता है। समय, लोग, पड़ोसी, यहाँ तक कि घर भी। पर घर की ध्वनियाँ हमेशा वही रही आती हैं।

    सावित्री को फिर याद आई। याद आई अपने बच्चों के बचपन के उन धमाधम ऊधम से भरे दिनों की, कितनी तरह के खेल, कैसी-कैसी लड़ाइयाँ, चीख़-पुकार—मारे मस्ती के—गालों को गीली ठंडक महसूस हुई तो उसने पाया कि उसके आँसू निकल आए हैं। चट इधर-उधर ताककर पोंछ लिया। घिसे जीर्ण कपड़े की तरह गिरस्ती की पुरानी चादर कब अचानक फटकर हृदय मथ देने वाली यादों की झलक दिखा जाएगी, कौन जाने?

    ऊन का लंबा सूत्र गोले से खींचकर सावित्री ने बुनाई में मन अटकाया। कैसा अलमस्त था मँझला भी। दमे का जन्म से मरीज़ रहा तो भी क्या? कोई पेड़ नहीं जो जा चढ़े, कोई मुँडेर नहीं जो जा फाँदै। कभी लगता है, रात को उसकी छाती से चिपका अपनी छटपटाती साँसों को जबरन ठेल रहा है। कैसी फबती थी वह लाल ऊनी वास्केट उस पर! उसने पहले ही से दिन कील में फँसाकर उधेड़ दी, तो बॉर्डर फिर दुबारा बुनना पड़ा था। अरे महरी, बर्तन नहीं धुले तुम्हारे अब तक? पूरा दिन लगा दोगी क्या? उसने भीतर की आवाज़ सुर चढ़ाकर भेजी। सुना होगा महरी ने क्या? क्या पता? सफ़ाई करके उठे तो मालिश करे। तब जाकर वह नहाए। सारा बदन किचकिचा रहा है।

    सावित्री की नज़र सामने के शीशम के कुबड़े पेड़ पर जा पड़ी। कुबड़ा बेडौल तना, खुरदरी छाल। एक डाल ख़ूब आगे लॉन तक फैल आई थी। उस पर चीलों का घोंसला शायद था। नीचे की झाड़ी तमाम बीट से सफ़ेद-सफ़ेद हो रही थी, लॉन पर पत्तियाँ ही पत्तियाँ। बार-बार डालें छँटवाई जाती हैं, फिर-फिर उन्हीं कटे हिस्सों से नई फुनगियाँ फट पड़ती हैं। क्या माया है!

    मौसम बदलते ही रातों-रात उन पतिंगों-सी पत्तियों ने पेड़ को शॉल की तरह छा लिया था। अब डालों का गाँठों से भरा कुबड़ापन दिखता था, ही भद्दी खुरदरी छाल। हाल की जच्चा की तरह एक कोमल हरी बुनाई ने पेड़ को बहुत नर्म, बहुत सुकुमार बना दिया था। ऐसे ही थोड़े आशीर्वाद देते हैं बुज़ुर्ग, कि कोख हरी-भरी रहे।

    हाथ की बुनाई को रोककर कुछ देर सावित्री पेड़ को ताकती रही। फल का पेड़ होता, तो कुछ ही दिन बाद पत्तों के नीचे गदराते फूलों के गोल रोएँदार आकार दीखने लगते। खेल हैं ऊपर वाले के और क्या? वर्ना ऐसी रुक्खड़ पुरानी देह से कहीं ऐसी नर्माई फूट सकती थी क्या? कभी बड़ा मन करता है कि वह समझ पाए यह सब, कैसे भी। पर किससे पूछे? बच्चे अपने स्वर्गीय पिता की तरह गंभीर स्वभाव के, कठोर, और नियम-क़ानून वाली बातों पर चलने वाले हैं, उसी की घड़ी की सुई हमेशा उल्टी गति से चलती रही। पता नहीं क्यों? जब इन बच्चों के बाबूजी थे, तब भी तो कभी बीच-बीच में वह गुमसुम हो जाती थी। पूछा जाए कि क्यों? तो उससे कोई जवाब नहीं बन पड़ता। कम-से-कम उनको तो साफ़-साफ़ समझ में जाए, ऐसा जवाब। फिर वे अनुमान से ही निदान करके उसे बताने लगते कि गहने-कपड़ों में दूसरों की हिरस करना ठीक नहीं। जो पाया, वही ख़ूब है। किताबें पढ़ो, अच्छी-अच्छी। विलायत की मेमों की तरह। वे थोड़ी ऐसे गोंदनी के जैसे जेवर-कपड़ों से लदी बैठी रहती हैं? बड़ी-बड़ी किताबें पढ़ती हैं, लिखती हैं, जभी तो उनका मुलक तरक़्क़ी कर गया इतनी। पर पति की बातों पर सिर हिलाते-हिलाते भी उसे लगता कि सचमुच में कुछ भी तो समझ नहीं आता—न उसे, उन्हें। उसका मन करता कि भागकर माँ के पास जाए और गोदी में मुँह छिपा ले। पर कहाँ?

    जबरन आँसू रोककर तब वह कोई मोटी धार्मिक किताब खोल लेती थी। पति ठीक ही तो कहते हैं, इधर-उधर मन का डाँय-डाँय भटकना ठीक नहीं। ऊपर वाले ने सभी तो दिया है, देवता जैसे पति, राम-लक्ष्मण जैसे बेटे-बेटियाँ—सत्यनारायण जैसे दामाद। और चाहिए ही क्या? और धीमे-धीमे सब बैठ भी जाता, जैसे उफनते दूध के पतीले में लोहे की भारी ठंडी कड़छी घुमा दी गई हो।

    आँगन से महरी पुकार रही थी, मालिश करवाने को। काम से निबटकर गर्म तेल का कटोरा लेकर बैठी होगी। धीमे-थके पैरों से सावित्री भीतर चल दी। धुल-पुँछकर घर साफ़ करीने से निखर आया था। सास ग़लत नहीं कहती थीं, कि साफ़-सुथरी माँग-पट्टी करे मेहरिया, और धुला-पुँछा घर भाग्य वाले को ही नसीब होता है। गर्व से उसकी छाती फूल उठी। तो क्या हुआ अगर बड़ी बहू नौकरी करती है? जाने से पहले अपने हाथ का सब कुछ कर नहीं जाती। शीशे-सा चमकता है घर। आगे-पीछे छोटा-मोटा नौकर-चाकर है ही करने को। जिएँ, सब जिएँ। फलें-फूलें, बरक्कत बनी रहे इस घर में। साँस लेकर वह आँगन में पड़ी चारपाई पर बैठ गई। और अपनी फल-फूल चुकी देह को मालिश वाली के हाथों सौंप दिया।

    मालिश करते-करते बातून महरी बोले चली जा रही थी। धूप अब पूरी उतर आई थी। अभ्यस्त हाथ उसकी देह में आराम की नन्हीं-नन्ही नदियाँ बनाते, दुखती रगों को चटचटाते, बदन पर गुलगुले खरहों से दौड़ रहे थे। महरी बता रही थी कि इस बार माघ में ख़ूब तीर्थयात्री उतरा है। उधर चले जाओ कछार की ओर, तो जहाँ देखो मुंड ही मुंड। मदरासी तो इतना आया है इस बार, के बाप्पा रे! फिर पंडों की, भिखारियों की रेल-पेल। ग़रीब मनई को तो लूट डालें जमदूत जैसे वे लोग। चार पैसे की जलेबी अठन्नी में बिक रही है। तीर्थ-अस्थान में जो ऐसे काम करेंगे, उनके कोढ़ फूटेगा अगले जन्म में, पनपेंगे नहीं एकदम।

    पहले यह मकान शहर के बाहर की ओर पड़ता था, इसलिए तब इधर उतने लोग नहीं दिखाई देते थे। कभी चरमराती बैलगाड़ियाँ गुज़र जातीं, या फिर तरबूज़ों के मौसम में ख़ूब ऊँचे लदानें लाद ऊँटों के क़ाफ़िले रात गए गुज़रते रहते। गर्मियों-भर सिर्फ़ धूल उड़ा करती थी चारों ओर से। शहर जाने वाला रास्ता एक शिथिल अवसन्न जानवर की तरह तीखी धूप में हाँफता पड़ा रहता। फिर धीरे-धीरे मकान उठते चले गए। अब तो पेड़ भी इक्के-दुक्के ही हैं। कितने साल लाल-चिकने फ़र्श यहाँ और छतनार शीशम के दरख़्त वाले इस घर में गुज़र गए। बड़े को गोद में लिए यहाँ आई थी। यहीं मँझला हुआ, फिर छोटा, फिर बेटियाँ, फिर मँझला जाता रहा। सब यहीं। चाभी दी गई घड़ी की सुइयों की तरह एक अवश्य कमानी उन्हें घुमाती गई, वे घूमते गए। और वे दिन बुरे ही बीते, ऐसा भी तो नहीं। चार-चार बच्चों की काकली से गूँजते वे दिन, जब वह भर हाथ चूड़ी पहने राजहंसिनी जैसी, चाँदी का चाबियों वाला गुच्छा कमर में टाँगे, अंदर-बाहर तैरती रहती थी, बुरे तो नहीं थे। पति चल दिए तो क्या, बच्चे एकदम बेदर्द नहीं हुए, यही क्या कम है?

    यह क्या माँजी, तुम तो रो रही हो? कुछ दुखता है क्या? महरी पूछ रही थी। नहीं, कुछ नहीं, उसने होंठ भींचकर जवाब दिया और तौलिया-कपड़े लेकर नहानघर में नहाने घुस गई।

    तेल का कटोरा रखकर महरी कुछ देर पुराने रसोइए को बताती रही कि अम्मा जी कैसे रोती रहीं, अरे, सबै लुट गया, जिसका वो रोए नहीं का?...खैनी थूककर रसोइए ने ब्रह्मज्ञान दिया। मुला बाल-बच्चों के बीच हैं। ये भी तो कम नहीं?

    शीशम के पेड़ की शाखाओं पर बैठी चील टकटकी लगाए देख रही थी, रसोई की ओर। एक ससुर ताक में है। रसोइए ने किवाड़ बंद करते बेहद नाराज़गी से कहा, इहैंई फसकड़ा मारिकै जमी रहत, कि कभई किवाड़ खुले हों; तो लगाए झपट्टा।

    अपने यहाँ जैसा होता है, वैसा ही दापंत्य जीवन था, सावित्री के बड़े बेटे-बहू रमेश और सुषमा का। सीधा-सादा, जटिलता रहित, किसी भी तीखी चोट या उद्दाम आवेग से शून्य। असह्य।

    अपने लंबे बालों को झाड़ते सुषमा ने तनिक तिरछे से अपनी आकृति को देखा। मन ने आईने से पूछा, इस घर में सबसे सुंदर, सबसे सहनशील, सबसे गंभीर कौन? मन के आईने के भीतर से दुहराया, तू! तू! तू! संतुष्ट हो सुषमा कंघी को बालों के छोर तक खींच ले जाती है। उसे कभी लगता है कि उसका पूरा जीवन एक इंतज़ार है। किसका? वह ख़ुद नहीं जानती। सिर्फ़ इतना-भर समझती है कि दुःख उसे सिर्फ़ अपने लंबे बालों के झड़ने का नहीं।

    चुपचाप घड़ी उठाकर सुषमा ने कलाई में बाँधी। लायब्रेरी को लौटाने वाली कुछ किताबें छाँटी, पर्स उठाया, माँजी के कमरे में झाँकी, मैं जा रही हूँ माँजी!

    अच्छा। सावित्री कहती है, खिड़की के पास बैठी-बैठी। इधर कुछ दिनों से जाने क्यों उसकी तबीयत गिरी-गिरी-सी रहती है, कुछ खाने को जी नहीं होता। खा लो तो लगता है, हज़म ही नहीं होगा। वह समझ नहीं पाती कि बात क्या है?

    सुषमा सास को नहीं समझ पाती। सावित्री का गुमसुम अकेलापन देखकर उसका मन करुणा से भर उठता शायद, अगर उसके पीछे गूढ़ दमन का एक पूरा हिंदोस्तानी अतीत होता। वैसे वह नर्म दिल वाली थी, सड़क पर इधर-उधर भागते भिखमंगों के बच्चों को या गाड़ीवानों को पशुओं पर सड़ाप-सड़ाप चाबुक चलाते देख वह बहुत द्रवित भी हो जाती, पर सास का चेहरा देखते ही जाने क्यों उसका द्रवणशील मन मानो बर्फ़ की शिला बन जाता, और तब उसकी आवाज़ भी मृदु और फरमाबरदार बन जाती और भंगिमाएँ अत्यधिक विनम्र। पहले सास का अधेड़ होकर भी गहनों-सिंदूर से लदे रहना उसे भद्दा लगता था। अब उसका म्लान, आभरणहीन, रक्तहीन, निस्तेज चेहरा उसे अपने प्रति, एक ऐसा आक्षेपमय विद्रूप लगता कि वह सास के सामने पड़ते ही सिर से पाँव तक सुलग उठती।

    रात-भर पानी बरसा था। जाड़े की सुबह पीली और निस्तेज लगती थी, पिटी हुई। इक्का-दुक्का लोग ही लोई लपेटे सड़क पर दीख रहे थे। खड़खड़िया रिक्शा धीमे-धीमे परिचित सड़कों पर से कॉलेज की ओर जा रहा था। झल्लाहट की लहरें सुषमा के भीतर एक के बाद एक उभरने लगीं। इतनी सुबह भी दिमाग़ में अजीब सुस्ती छा रही थी एक पीला-सा अवसाद, जैसे धुआँ छाती में फँस गया हो। कोर्स किसी तरह ख़त्म कराना था। हड़तालों से पढ़ाई में वैसे ही बहुत नुक़सान हो गया था। ऊपर से घर की चिख-चिख। एक वे ही पति-पत्नी थे इस शहर की रिहायश वाले, बाक़ी सब भाई-बहन बाहर की नौकरियों वाले थे। महीना-दस दिन छुट्टियों में आकर हिदायतें भर दे जाते कि अम्माजी को यह कहना, वह करना। कोई एक किलो बर्फ़ी लाकर रख जाता तो कोई आँवले का मुरब्बा। अम्माजी बहुत कमज़ोर हो गई हैं। वे अर्थमय नज़रों से एक-दूसरे को ताकते हुए कहते, तो अपमान से वह एड़ी-चोटी तक सुलग उठती—जैसे अम्माजी उसी के सबब से भूखी रहती हों। पर वह उस दम चेहरे पर मुस्कान पोते रखती बग़ैर यह जाने कि वह ढोंग कोई वृद्ध भी पकड़ सकता है।

    हमेशा मौक़े के अनुरूप बात कहने, तीज-त्योहारों पर दस जनियों में धीपे-से जताकर चीज़ वस्त देने, शादी-ब्याहों में बहू के माध्यम से भारी तोहफ़ा भिजवाकर दूसरे पक्ष की हेठी जताने में कभी उसकी सास की सानी थी। समाज में अब भी उनका नाम था, उनकी बात की क़द्र होती थी। वह लड़े तो किससे? तो अब ट्यूटोरियल में वह लड़कियों को चूस-चूसकर नंबर देती थी, पुराने नौकर-चाकरों से कठोरता से बोलती, उनकी कोई भी अव्यवस्था, कोई भी कामचोरी उससे छुप पाती। वह बोलती कम थी, पर वह भीतर-ही-भीतर उससे थर्राता था। उसके बेटे हॉस्टल से घर आते तो वापस लौटने को आतुर रहते, पति घर आता, घबराता-सा।

    सड़क किनारे हल्की चहल-पहल शुरू हो गई थी। दुर्बल, म्लान, कृश चेहरों वाली गृहणियाँ कोयले की धुआँती अँगीठियाँ बाहर रखने रही थीं। उनके घोंसले जैसे बाल, बिवाई फटे, रूखे हाथ-पैर, भावहीन चेहरे देखते-देखते सुषमा का ठंडा पथरीला मन एक विचित्र राहत और गर्व अनुभव करने लगा था। इस सबसे बच निकलने को राहत, इस सारे प्राणलेवा धुआँ-भरे खाँसते माहौल के बीच राजहंसिनी की तरह कलफ़दार स्वच्छ वस्त्रों में रिक्शे पर बैठकर गुज़रते जाने का गर्व! ऐसे क्षणों में उसका पुराना चोट खाया मन दुनिया को उस हद तक क्षमा कर देता था, जहाँ तक उसके लिए संभव था।

    रिक्शा कॉलेज के गेट पर खड़ा हुआ। तनिक तिरछी गर्दन कर सुषमा ने अपनी छात्राओं का अभिवादन सगर्व स्वीकार किया। कै बजे छूटेंगी? रिक्शा वाला पूछ रहा था। उसने एक क्षण उसे आँखों से तौला-सा और फ़ैसले के ढंग से कहा, कुछ मीटिंग-ऊटिंग है, देर हो जाएगी तो बाबूजी जाएँगे—तुम कल सुबह टाइम से जाना।

    स्टाफ़ रूम से ज़ोर-ज़ोर से अँग्रेज़ी में बहस के स्वर उभरकर रहे थे—अगर रमला बच्चे के कारण काम नहीं कर सकती तो बेहतर है, इस्तीफ़ा दे दे—गद्दी क्यों धरे हुए है? आख़िर बच्चा उसका है, कॉलेज का तो नहीं? छह महीने के बच्चे की माँ रमला दास, अँग्रेज़ी प्राध्यापिका और माँ का दोहरा रोल निभाती। अक्सर दोनों में गच्चा खाती रह जाती थी। आज फिर अचानक छुट्टी ले बैठी होगी।

    माली साल का आख़िरी दौर था। इम्तहान कोने पर से झाँक रहे थे। ग्रांटें ख़त्म होनी थीं। लाइब्रेरियन किताबों की लिस्टें माँग रहे थे। लड़कियाँ कोर्स को रो रही थीं। लेक्चररों के तेज़ मिज़ाज और ख़ुराफ़ाती दिमाग़ भन्नाए हुए थे। शांति बोले जा रही थी—सुषमा पर नज़र पड़ते ही उसने उसे भी बातचीत में शामिल कर लिया, क्यों सुषमा, कोई ग़लत कह रही हूँ क्या? और कोई दिन होता तो सुषमा मज़े में रस लेकर बात की तह तक जाती, जब तक वह सर्वसम्मति से मान लिया जाता कि छोटे बच्चों की कमसिन माताओं का काउंसिल द्वारा लेक्चरर के बतौर चुनाव अक्षम्य अपराध है। है कि नहीं? पर आज घर से साथ लिपटा आया अवसाद छूटा नहीं था। उसने चुपचाप लॉकर से अधजाँची कॉपियों का गट्ठर निकाला और खिड़की के पास बैठकर जाँचने लगी। क्या-क्या बकवास लिख जाती हैं ये लड़कियाँ भी? क्लास में पढ़ाई के समय तो दिमाग़ नाख़ूनों को रँगने और कपड़ों के चुस्त नमूनों में भटकता रहता होगा। उसने क्रोध से गहरा लाल क्रॉस बनाकर लिखा—'फिर से लिखो,' और अपने दस्तख़त दाग़ दिए। लिखे अब बैठकर फिर से। कोई मज़ाक़ है?

    साँझ की लंबी-दुबली परछाइयाँ रमेश के दफ़्तर में शहतीरों-सी घूमती हैं तो उसका दिल जाने क्यों म्लान हो जाता है। अब घर जाना होगा ही, निस्तार नहीं।

    क्यों? चल दिए? पान चबाता काइयाँ कृष्णकांत व्यंग्य से हँसा। क्या सिर्फ़ हँसा कहना चाहिए। कुछ लोगों की हँसी ही ऐसी होती है। उसने जवाब दिया, “हा”, और ज़रूरत से ज़्यादा एकाग्रता से पुरानी मोटर का दरवाज़ा खोलने में जुट गया।

    मोटर बाबूजी की थी और बाबूजी के बाद उसे मिल गई थी। डाँय-डाँय करते उस लाल फ़र्श वाले मकान, पुरानी किताबें, अधटूटे स्प्रिंग वाले सोफ़ों और नक्काशीदार वार्डरोबों की तरह। छोटी बहन जब भी आती, कहने से चूकती थी कि लकड़ी का ऐसा नक्काशीदार फ़र्नीचर तो अँग्रेज़ लोग खोज-खोजकर झोली भर रुपया दे-देकर मोला रहे हैं विलायत में आजकल। कोई कम दाम की चीज़ें नहीं ये सब। उस दम उसकी पत्नी का थका चेहरा एक विद्रूप से कुछ और लंबूतरा हो जाता, गो कहती वह कुछ नहीं। उसके ब्याह तक ननदें नहीं ब्याही गई थीं, और दुनियादार सावित्री ने यह कहकर, कि अंत में तो सब बहू को ही जाना है, बहू को दिए जाने वाले जेवरों और साड़ियों में भरपूर कटौती लगा दी थी। यह बात एक कीड़े की तरह उनके दामंत्य को पूरे बीस साल कुतरती रही थी। मुँह से हालाँकि कुछ कहा नहीं गया था।

    वैसे वे सब सदा बढ़-चढ़कर एक-दूसरे की बड़ाइयाँ करते रहते थे। ननदें कहतीं कि उनका सा मायका, सावित्री कहती कि उसकी-सी बहू, और रमेश तो मानो पृथ्वी के मानदंड-सा घर पर बिछा रहता—हिमालय-सा ऊँचा, बर्फ़-सा ठंडा, दुर्लभ्य। पर सुषमा के सामने पड़ते ही, उसकी कुछ-कुछ भरी, वेदनामय, पर चुप्प आँखें रमेश के हृदय में तीर-सी उतर जाती थीं, उसकी पूरी चेतना की किचों को दुगने पैनेपन से चुभोते हुए, क्यों उसने अपनी पत्नी का वह सार्वजनीन अपमान झेला, उतने साल, जब वह दुधमुँही बच्ची से बढ़कर कुछ थी! क्यों वह चुप रहा आया? क्यों उसने कहा नहीं कि...

    क्या? यहीं पर आकर बात टूटती है—क्या कह सकता था वह? आत्मस्वीकार अब शुरू हो भी कहाँ से?

    इसी ग्लानि के सुए से कुरेद-कुरेदकर सुषमा ने अपनी इच्छानुसार बेटों को ऊँची फ़ीस वाले होस्टल में, घर से जितनी दूर भेजा जा सकता था, भेज दिया था। उसकी ज़िद थी कि वह चाहे जैसे रहे, बच्चे उसके अँग्रेज़ी माहौल में ही पलें ताकि उनका भविष्य...

    वैसे लड़कों को देखकर रमेश को लगता था कि सुषमा का कहना ग़लत नहीं था। इस कम उम्र में ही दोनों भाई अँग्रेज़ों की-सी अँग्रेज़ी बोलने लगे थे। टेबल पर बैठकर खाते तो उनका छुरी-काँटा चलाने का ढंग, डबलरोटी पर मक्खन लगाने का तरीक़ा, 'एक्सक्यूज़ मी' कहकर कुर्सी खिसकाना, सब देखते-सुनते आँखें नहीं अघाती थीं। सुषमा ने बच्चों के भविष्य का पूरा ग्राफ़ स्पष्ट उकेर रखा था। एक बैठेगा आई.ए.एस. की परीक्षा में, दूसरा जाएगा इंजीनियरी पढ़ने, एक ब्यूरोक्रेट, एक टेक्नोक्रेट। प्रकट में तटस्थ रहते हुए भी बेटों के लिए सुषमा की उदारता की सीमा थी, वैसे ही जैसे प्रकट में विनयशीलता की विगलित प्रतिमा होते हुए भी, सास के प्रति उसके विद्वेष की।

    शादी-ब्याहों में पड़ोस की दस औरतों के बीच बहू की दी धूसर रँगी रेशमी साड़ी पहने सावित्री हाथ हिला-हिलाकर सुषमा की उदारता, उसकी गुणशीलता और परिवार के प्रति प्रेम का बखान करती, तो औरतें विगलित होकर कह उठतीं—आहाहा, दान किए होंगे तुमने मुनुआ की अम्मा!

    और आदमी को चाहिए भी क्या?

    बाहर मोटर रुकने की आवाज़ आई तो सावित्री उठ खड़ी हुई। मुन्ना, सुषमा बेटियों को स्टेशन से लिवा लाए होंगे। दोनों के पति एक ही शहर में हैं, इस दम के साथ ही गई। ख़ुशी रहे, सब प्रेम बना रहे भाई-बहनों में। सावित्री ने धोती की खूँट से आँखें पोंछीं और बाहर गई। सामान उतारा जा रहा था। बच्चे उछल-उछलकर बता रहे थे, ये वाला हमारा, ये तुम्हारा। आधे लोग घर की गाड़ी में आए थे, आधे टैक्सी में। गंभीर चेहरे से सुषमा ने टैक्सी का भाड़ा चुकाया। उसे मालूम था कि ननदें इसकी कोशिश भी नहीं करेंगी। घर लौटने के उत्साह और उत्तेजना से चमगादड़ों-सी चीख़ती बेटियों को बाँहों से घेरकर सावित्री गाय की तरह दुलराती भीतर ले चली। सुषमा कठोर पर गिने-चुने शब्दों में नौकरों को सामान रखने का ठौर बताकर चाय का पानी चढ़ाने चली गई। बच्चों और अटैचियों से लदा-फँदा रमेश पीछे-पीछे माँ के कमरे में जा घुसा। रास्ते में गाड़ी ने दिक तो नहीं किया? सावित्री ने पूछा। गाड़ी की बैटरी चुक रही थी और घर से निकलते वक़्त धक्का लगाना पड़ा था।

    नहीं। स्वल्पभाषी रमेश ने कहा। कुछ देर वह ठिठका, फिर भानजे-भानजियों के बहाने बाहर चला आया। वह इस समय सुषमा के सामने क़तई नहीं पड़ना चाहता था। बीस साल के दामंत्य जीवन ने उसे बख़ूबी सिखा दिया था कि ऐसे समय अपनी शहादत और आत्मदया की आँच में तपकर उसकी पत्नी सुई की तरह कठोर और नुकीली बन जाती है। ठंडी इस्पाती, चमकदार और मर्मभेदी।

    वह छूट भागने को कसमसा ही रहा था, कि नौकरानी को चाय-नाश्ते का निर्देश देती सुषमा सामने ही गई। कार के साइड में गहरी खरोंच पड़ गई है। उसने अभियोग-भरे स्वर में कहा। जानता हूँ, रमेश ने कहा, एक जीप ने टक्कर मारदी, ऑफ़िस की पार्किंग में। अच्छा हुआ कोई था नहीं कार में, मेरे अलावा।

    अब तो इसे मरम्मत को भेजना ही होगा। चबा-चबाकर सुषमा ने कहा। वे दोनों बातें करते हुए अपने कमरे में गए थे। सुषमा ने पलंग पर बैठकर कुछ कहने को लंबी साँस खींची, पर रमेश जैसे भाँपकर अचानक बहुत व्यस्त होकर दराज़ खोलने लग गया। ज़रा शर्माजी से मिलने जा रहा हूँ। रमेश ने बालों में कंघी घुमाई।

    तुम तो बस आए और गए, मैं ही...ठीक है, जाओ... सुषमा अपने नाख़ूनों को ताकने लगी।

    रमेश ने उसाँस ली, फिर शुरू हो गए थे वे दोनों। वह मुड़ गया।

    वैसे तो कहना बेकार है पर याद रहे तो मेरा प्रेस्क्रिप्सन केमिस्ट के यहाँ से भरा लाना। दर्द से सिर फट रहा है। सुषमा ने कॉपियों का ढेर सामने खींच लिया और टेबल लैंप जला दिया। नीचे कह देना कल का लैक्चर तैयार कर रही है।

    थोड़ी देर दोनों चुपचाप रहे। फिर रमेश बाहर चला गया। सुषमा ने गाड़ी का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ सुनी, फिर कुछ मुश्किल से गाड़ी स्टार्ट होने की। और मेज़ से सर टिकाकर वह निःशब्द रोने लगी।

    भाभी कहाँ गई? छोटी सरिता ने माँ से पूछा। सावित्री बहुत व्यस्त होकर बताने लगी कि लैक्चर तैयार कर रही होगी, इतने बड़े कॉलिज में पढ़ाती है, मेहनत ऐसी करती है कि क्या कहो, तिस पर घर का सारा काम कर जाती है। उसे तो हाथ भी नहीं हिलाना पड़ता। बहू हो तो ऐसी।

    घुटनों पर वजऩ तौलकर सावित्री नौकरानी को खाने का बताने बाहर गई तो बहनें कुछ क्षण चुपचाप बैठी रहीं। अम्माँ इधर और भी।—बड़ी ने बात अधूरी ही छोड़ दी। वह दोहरे बदन की हँसमुख और शांत स्वभाव की महिला थी जिसने अपने अस्तित्व से समझौता कर लिया था। उसके पति सफल और बच्चे स्वस्थ थे, ख़ुद वह भारी गहनों, रेशमी साड़ियों और ज़ायक़ेदार भोजन की शौक़ीन थी। इस वक़्त उसने पनडिब्बे से गिलौरी निकालकर मुँह में डाली और पान चुभलाती गमगीन हो गई—क्या शान थी इस घर की बाबू जी के समय में, उसने कहा। छोटी ने सिर्फ़ उसाँस ली। वह सुग्गे-सी सुती नाक और चौकोर जबड़े वाली सुंदर महिला थी जिसे देखने से लगता था कि वह भीतर ही भीतर किसी दुःख से बुझी चली जा रही है। हालाँकि वह इस बारे में किसी से कभी कुछ कहती थी।

    बड़े नाती का हाथ थामे धीमे से सावित्री ने कमरे में प्रवेश किया। वह नाती से पूछ रही थी, क्या बनवा दूँ रे तेरे लिए, मखाने की खीर, खाएगा? और चिरौंजी के लड्डू? तेरे नाम के चिलगोजे मैंने कब से धर रखे थे। अलमारी खोलकर सावित्री ने एक पोटली निकाली और उसे पकड़ा दी, ले, सबसे बाँट के खाना। भला। फिर सावित्री मुड़कर बेटियों को बताने लगी कि कैसे मुन्ना और सुषमा, जाड़े आए नहीं कि मेवों के थैले-के-थैले लाकर पकड़ा जाते हैं, कि तुम खाओ, अरे मैंने कहा, मैं बुड्ढी-ठुड्ढी अब क्या खाऊँ? ऊपर से मार टॉनिक की शीशियों पर शीशियाँ ले आएँगे। देखो तो सही! अलमारी का एक पूरा खाना सच में टॉनिकों की शीशियों से भरा था। लड़कियों ने संतोषसूचक ध्वनियाँ निकालीं।

    भाभी को तो उनके भाई दे देते होंगे ये शीशियाँ? डॉक्टरों से तो सैंपल की ढेरों आती होंगी? छोटी ने चारपाई पर पसरते हुए झट से कहा, सुषमा के भाई शहर के नामी डॉक्टर थे। सो तो है, सावित्री ने कहा, पर दिल की बात है ये भी। फिर उसने यह भी बताया कि आहाहा, जैसे हमारे घर भाई-बहनों में प्रेम है, बस ठीक वैसा ही बहू के घर भी है, मजाल क्या जो मैं जाऊँ और इसकी भाभी बिना चाय-नाश्ते के फेर दे। किसी शादी में पच्चीस रुपए से कम पैर-पड़ाई नहीं देंगे मुझे—अरे, मैं कहती हूँ, इस ज़माने में इतना क्या करना, पर वे मानें तब न? बड़े ही स्नेही हैं। सावित्री का गला डबडबा आया।

    लड़कियों के आए में दिन जाते कहाँ पता चलते हैं? देखते-देखते फिर सामान बँधने लगा।

    पता नहीं रात की ट्रेनों से तुम लोग आती-जाती हो! ऐसा राब ज़माना है, जब तक पहुँच नहीं जातीं, धड़धड़ लगी रहती है। सावित्री ने बुनते हुए कहा। वह चटपट छोटी के बड़े बेटे का स्वेटर ख़त्म कर रही थी। अरे, इन्हीं जाड़ों पहन लेगा ख़ुशी-ख़ुशी, कि नानी ने बिन कर दिया। अगले साल तक उसका क्या भरोसा? पका फल है वह। सावित्री ने आँखें पोंछकर चश्मा लगा लिया। बड़ी की तो तब भी चिट्ठियाँ जाती हैं, छोटी तो बस गई, सो गई। एक शहर में दोनों हों तो उसकी तो बस ख़बर भी नहीं—

    अरे, फ़ोन ही कर दिया कर कभी! सावित्री ने ऊन तोड़ते हुए कहा।

    फ़ोन करना मुझे अच्छा नहीं लगता। घंटों डायल करो तब जाके तो नंबर मिलता है। छोटी सूटकेस में ताला लगाने लगी।

    सामान सब कमरों से समेटे लीजो। सावित्री ने कहा। दो हफ़्तों में ही बच्चों ने पूरा सामान यहाँ-से-वहाँ तक फैला दिया था। हर बार उनके जाने के बाद दिनों पीछे छूट गए टूथ ब्रश, साबुनदानियाँ और तौलिए इधर-उधर पड़े मिलते रहते। तभी सावित्री को याद आया कि लड़कियों के रुपयों से भरे पर्स भी उसकी अलमारी में हैं। छोटी का पर्स शायद अलमारी के किवाड़ से टिका था—खटाक् से गिर गया, तो फ़र्श पर चीज़ें ही चीज़ें फैल गईं।

    यह क्या है? एक छोटी शीशी उठाकर सावित्री ने पूछा।

    नींद की गोलियाँ

    बाब्बारे, वे तो ज़हरीली होती होंगी, फेंक दे इन्हें।

    एक साथ ज़्यादा खाई जाएँ तब ही ज़हर हैं, कम मात्रा में लेने से कोई नुक़सान नहीं।

    सावित्री ने अपनी उँगलियों में थमी भूरी शीशी पर नज़र डाली-भीतर कई नन्ही-नन्ही गोलियों के ख़तरनाक आकार थे।

    “नींद के लिए दवा क्यों लेती है?

    क्योंकि वैसे नींद नहीं आती, लाओ! स्वल्पभाषी छोटी ने बोतल बटुए में डाल दी और बटुआ बंद करने लगी। सावित्री की जिरह बंद नहीं हुई, तब भी—

    कब से खा रही है इसे?

    याद नहीं, कई महीने हो गए।

    पर तुझे नींद क्यों नहीं आती है? हद है!

    क्यों?

    छोड़ो भी अम्मा—छोटी का चेहरा बटुए की तरह बंद हो गया था, कुछ और बात करो। सावित्री निःशब्द रोने लगी थी। अरे अम्मा, आजकल तो सभी खाते हैं, बड़ी ने उसे समझाया। तुम जैसे जर्दे की पत्तियाँ कल्ले में नहीं दबाए रखतीं? बस वही हुआ। एक दिन में दो-तीन गोली कोई नुक़सान नहीं करतीं। नींद अच्छी आने से बदन स्वस्थ रहता है सो अलग।

    उधर चुन्ना और छोटी बहू की ढेरों चिट्ठियाँ रही हैं कि यहाँ नहीं आईं, सावित्री ने खाते वक़्त दुहराया। अब कहाँ-कहाँ जाऊँ इस उम्र में। वह कहने लगी कि चुन्ना एयर कंडिशन से कम में नहीं बुलाता कभी। वहाँ भी पूरा इंतज़ाम—ब्राह्मण महाराज से लेकर पूजा के फूल तक का। हफ़्ते-हफ़्ते उसके तहसीलदार लोग गंगाजल के कनस्तर पहुँचा जाते हैं।

    सुषमा का चेहरा कलफ़ लगे कॉलर की तरह सख़्त हो गया। जब देखो चुन्ना और राशि का बखान। मुफ़्तख़ोरी और सरकारी नौकरी का चोली-दामन का साथ है। उन्हें कौन अपनी ओर से देना होता है? हमारी तरह पोस्टकार्ड ख़रीदने भी ख़ुद ही जाना पडे, तब पता चले—प्रकट में उसने पूरी की तश्तरी बड़ी ननद की ओर प्रेम से बढ़ा दी, जीजी, एक और लो, गर्म है। हाय, भाभी तुम तो खिला-खिलाकर मार डालोगी। बड़ी ने गद्गद होकर प्लेट भर ली, तभी तो यहाँ से जाते हुए हर बार दुगनी होकर निकलती हूँ।

    सब हँस पड़े। सावित्री ने मन ही मन हाथ जोड़कर भगवान को सर नवा दिया। हे प्रभो, बना रहे यह प्रेम। इसी से घरों में बरकत होती है, वर्ना और क्या है ज़िंदगी में?

    लड़कियों के जाने के बाद घर जैसे काट खाने को आता था। सुषमा के कॉलेज में इम्तहानों के पास आने से उसका काम भी बढ़ गया था। वह सुबह की गई दिन ढले लौटती। पीला, उतरा चेहरा, थकी चाल, सावित्री कुछ पूछने को होती तो भी रुक जाती। इधर उसकी अपनी शक्ति भी पता नहीं क्यों, मानो छीजती चली जा रही थी। ज़रा ज़्यादा देर खड़ी रहती तो टाँगें काँपने लगतीं, लेटती तो लगता कमरा उसे लिए—दिए घूम रहा है। खाना मुँह में डालती तो लगता काग़ज़ चुभला रही हो। हरदम अफारा-सा बना रहता। बदन झूल-सा गया था जैसे।

    हाय अम्माजी, तुम्हारी तो पसलियाँ दीखने लगीं। मालिश करती महरी ने कहा। कुछ दवा-दारू कराओ ना। ऐसे खाना-पीना छोड़े कब तक रहेगा? उसकी भदेस, पर सच्ची नेकी का टहोका पाकर मानो घाव की सीवन उधड़ गई, सावित्री की आँखें बह चलीं। उस रोज़ मुँहज़ोर पुरानी महरी ने सुषमा से कह ही दिया, अम्मा जी का ज़रा ख़्याल किया जाए, उनकी हालत ठीक नहीं। का जाने का रोग है, पर मुला एक बार हस्पताल में तो... सुषमा ने उसे सिर्फ़ घूरकर देखा और कमरे में चली गई। महरी बुड़बुड़ाती हुई चली गई कि वैसे तो महतारी तुम्हारी, जो चाहे करो, पर हम तो कहे बिना ना रहेंगी। हाँ—उस रोज़ उसने महाराज के साथ बैठकर फुर्सती चाय भी नहीं पी।

    क्या बात है अम्मा? पुत्र ने नाश्ते की प्लेट से निगाह उठाई, तुम्हारी तबीयत का कुछ कह रही थी सुषमा? सावित्री अचानक ग्लानि-विगलित हो गई। पुत्र का चेहरा स्वयं थका हुआ लगता था।

    कुछ नहीं, उसने कहा, इस उम्र में कुछ उल्टा-सीधा खाने से वाय कुपित हो जाता है, आज से वे एकाध दिन खिचड़ी पर रहेंगी तो सब...

    कहिए तो एक बार दिखा दें... सुषमा ने पति की ओर प्लेट में गर्म फुलका डालते हुए पूछा और यह भी कहा कि आजकल डॉक्टरों से भी तो पंद्रह दिन पहले अपॉइंटमेंट लेना होता है वरना...

    नहीं-नहीं, मैं ठीक हूँ, सावित्री ने अटकते हुए कहा, अब उम्र भी तो हो गई।

    पुत्र कुछ देर बाहर सहन की दीवार ताकता रहा, जहाँ कुछ कौवे बैठे ख़ूब शोर मचा रहे थे, अच्छा देखो, चाचाजी से बात करता हूँ, एक बार पूरी जाँच हो जाए तो...

    ऑपरेशन से चौबीस घंटा पहले से सावित्री को कुछ भी नहीं खाना-पीना था। पानी भी नहीं। सावित्री को लगता कि भीतर डरावना रोएँदार कुछ है, जो पंख फड़फड़ाकर बाहर आने को छटपटा रहा है, पर उसे वह झेल नहीं पाएगी। पेट की फोटू खींची थी डॉक्टर ने और फोटू देखते ही कहा कि ऑपरेशन करेंगे। कहाँ का बबाल जुटा यह भी...

    सुषमा भिचे होंठों से समझाने लगी—देखिए अम्मा, आपको तो दवा से बेहोश कर देंगे, पता भी नहीं चलेगा कि गाँठ कब निकाल दी। और बस, दस दिन बाद टाँके कट जाएँगे तो आपको घर लिवा ले चलेंगे। चाचाजी कह रहे थे कि डॉक्टर शर्मा यहाँ के सबसे अच्छे...

    सावित्री चुपचाप पड़-पड़ी रोती रही। अरे, अपने पेट की जाई होती तो काठ जैसे मुँह से यह कह जाती? बेटियाँ दुःख से स्याह चेहरे लिए चुप बैठी हैं और लिक्चर दे रही हैं। उन्होंने मल्होत्रा साहब की माँ को देखा तो था ऑपरेशन के बाद। इधर नलकी, उधर ख़ून की बोतल, सुइयाँ, दवाई। सुना, वार्ड बॉयस भी सब जात के भंगी होते हैं। वे उनकी देही को स्ट्रेचर पर लिटाकर मुर्दे की तरह यहाँ लावेंगे। शिव! शिव!

    सुषमा मुन्ना को तनिक इधर-उधर भेजकर मुक्ता ने उन्हें समझदारी से बताया कि बैंक के लॉकर का सब सामान घर गया है। ताली उसी ने अपने पास रखी है, तुम निशाखात़िर रहो। उसने माँ से कहा।

    देर रात गए सावित्री की आँख लगी तो पहली बार यह सपना दीखा—

    एक बहुत लंबा रास्ता है, टेढ़ा-मेढ़ा, खुमेरियों भरा—अँधेरा, निचाट। वह उस पर अकेली चली जा रही है, उसके हाथ में पुरानी धोतियों की किनारी से बना हुआ उसका परिचित झोला है जिसमें उसके गहने हैं, सोने की बारह चूड़ियाँ, चार जोड़ी कंगन, मटरमाला, पैर के लच्छे, राम-नौमी, चाँदी की करधनी—वह चलती चली जा रही है, और अब वह अचानक एक, जाने किस बीहड़ जंगल के बीचोबीच खड़ी है। वे सब रास्ते और पगडंडियाँ, जो उन्हें यहाँ तक लाए थे, जाने कहाँ ओझल हो गए हैं—मैं कहाँ हूँ? वह भय से चीख़ना चाहती है—मैं कहाँ हूँ? पर मुँह पर मानो किसी का हाथ रखा हो। उसके हाथ में थैली है, थैली में उसके गहने हैं, चारों ओर घुप्प अँधेरा—कहीं पता नहीं...

    जभी वह देखती है कि लालटेन हाथ में थामे एक औरत कहीं से चली रही है। वह ठिगनी, मोटी और काली है। वह हँसती है तो लालटेन की पीली मद्धिम रोशनी में उसके पान खाए कल्ले चमकते हैं। ख़ूब तेल मलकर ऊँचा जुड़ा बाँधे हुए वह औरत कहती है कि सही है उस समय की भटियारिन, जिसे वह ढूँढ़ रही थी। चल-चल! वह उसे कहती है, और कुहनी थामने को हाथ आगे करती है। सावित्री भय से दो क़दम पीछे हटती है—हट—भाग यहाँ से, उसे नहीं कहीं भी आना-जाना। अपना घर है, गिरस्ती है, बच्चे हैं जैसे राम-लखन सीता। वह गहने की थैली पीछे करती है।

    हो हो हो, मोटी औरत पेट पकड़कर यूँ हँसने लगती है जैसे उसने कोई बहुत बड़ा मज़ाक़ किया हो। हँसती-हँसती वह ग़ायब हो जाती है।

    चौंककर सावित्री ने आँखें खोलीं, कुछ क्षण लगे नींद में डोलती उसकी दुनिया को स्थिर होने में। राम! राम! सपना ही था—पर जाने कैसा! शिव! शिव!

    कमरे में सब शांत था। पास में सोई नर्स की नाक बज रही थी। सावित्री ने तकिए के नीचे हाथ डालकर ताली को तलाशा। एक क्षण को कलेजा धक् से रह गया। हाय कहाँ गई होगी? कहीं वह औरत तो...

    तभी उसे याद आया कि ताली तो उसने बड़ी बेटी को दे दी थी। गहनों की स्मृति पुरानी चोट की तरह फिर टीसने लगी। बाहर गलियारे में कोई एक गाड़ी-सी खींचकर ले जा रहा था—चूँ-चूँ-चूँ। पहियों में तनिक तेल ही दे लेते, उसने सोचा। पुरानी चाल के थे गहने, तो क्या हुआ? मुक्ता कहती थी, कि अब फिर फ़ैशन में गए हैं। चालीस तोले की तो गले की रामनौमी थी, सात तोले की नथ। 'सास की नथ तो बड़ी बहू को ही जावे है।' सुषमा की चाची एक बार कह रही थी, चुन्ना की बहू ने तुरंत टोक दिया था कि अगर मेरी चाची होती तो कहती कि सास की नथ तो छोटी बहू को ही जावे है। जितनी गंभीर सुषमा है, उतनी ही मुँहफट छोटी वाली। अँग्रेज़ी स्कूल की पढ़ी है, अँग्रेज़ों की तरह का ही रहना सहना! करती बहुत है उसके लिए, ऐसा नहीं कि करे। पर उसके यहाँ सावित्री ज़्यादा दिन टिक नहीं पाती, गिट-गिट करते बच्चे, आगे-पीछे घूमते जात-कुजात के चपरासी, साहब-मेमसाहब जैसे दोस्त। गाड़ी कोठी के फाटक पर घुसती है और संतरी ज़ोर से बंदूक़ पटककर सेल्यूट करता है तो उसका कलेजा हर बार मुँह को जाता है। वैसे जस बड़ा है।

    चाँदी के गहनों का क्या करे वह? पैर के हैं कुछ, कुछ हाथ के। सुषमा अक्सर चाँदी के ही कड़े उड़े पहनती है, एकाध उसे दे देगी। अरे, जो चाँदी पहने उसे चाँदी, जो सोना पहने उसे सोना। सुषमा को सोना दे भी तो पहनेगी थोड़े ही? मुक्ता और छोटी शौक़ से पहनेंगी, कि अम्मा की यादगारी है। सावित्री के आँसू बह चले। गला सूख रहा था पर पानी पीने की भी मनाही थी। गला तो ऑपरेशन के बीच ही—फिर लड़कियों-बहुओं को कैसे पता होगा कि कौन गहने किसके हैं? बड़ी ग़लती की उसने। पहले ही बड़ी को लिखा दिया होता—हे प्रभो, हिस्सा करने तक की तो मुहलत देना!

    सावित्री को याद आया कि उसके बाबा कहते थे, जब भय लगे तो हनुमान चालीसा पढ़ो। उसने काँपते मन से लाइन उठाई—जय हनुमान, ज्ञान गुण सागर। पता नहीं क्यों सपने में दीखी औरत का चेहरा पहचाना-सा लग रहा था। कहाँ देखा होगा उसे? लाख याद करने पर भी—जय कपीश तिहुँ लोक...दरवाज़ा खुला तो उसका दिल फिर उछलकर फड़फड़ाया, पर यह मुन्ना था, पीछे-पीछे सुषमा, चुन्ना और नीलम और दोनों लड़कियाँ।

    चुन्ना और बहू ने पैर छुए तो उसे फिर रोना गया—ठीक तो हो? सबके सब चिंतातुर और सुस्त दीख रहे थे। उसके मन में दुःख हुआ, उसके पीछे क्या जाने टाइम पर खाना भी खाते होंगे या नहीं। इनकी क्या? सब भाई-बहन बहसों में डूब गए तो। वह दबे स्वर में लड़कियों से पूछने लगी कि सबने इत्ती सुबे नाश्ता-आश्ता तो क्या ही किया होगा?

    हाँ-हाँ, सब ठीक है। तुम चिंता करो, लड़कियों ने कहा। सुषमा के माथे की नस फड़कने लगी थी। सासू हमेशा लड़कियों से अलग से पूछती है जैसे कि बहू सही-सही बात नहीं बताएगी। क्रोध पर प्रकट में संयम रखते हुए उसने देवर से अँग्रेज़ी में बात करना चालू कर दिया। उसे ख़ूब मालूम था कि उसे अँग्रेज़ी में बोलता सुन अम्माजी हमेशा सहम जाती हैं, जाने क्या राज खोले दे रही हो। उनके बिना जाने चुन्ना की बहू सावित्री को बताने लगी थी कि नहीं, वह बच्चों को नहीं लाई। उनके इम्तहान होने को हैं। घर में वहाँ नौकर-चाकर तो हैं ही।

    मुन्ना पास आया, तुम्हारा नाम ऑपरेशन लिस्ट में सबसे ऊपर है, उसने बताया। बहू ने अँग्रेज़ी में बोलना छोड़कर तुरंत जोड़ा कि उसके चाचाजी ने कह-सुनकर बड़ी मुश्किल से यह कराया है—बात ये है कि उस वक़्त डॉक्टर तो एकदम तरोताज़ा रहते ही हैं, ऑपरेशन थिएटर भी साफ़-सुथरा रहता है। कल शाम से हम दोनों इसी भाग-दौड़ में लगे हैं। उसने आगे बताया।

    सावित्री पूछना चाहती है कि अरे, अपने माँ-बाप के लिए भी नहीं करोगे इतना तो फिर किसके लिए करोगे? पर पूछ नहीं पाती। बहू के इन्हीं चोंचलों पर उसे खीझ छूटती है। लो, अपने माँ-बाप की देखभाल जैसे बड़े अजूबे की बात है। कित्ता-कित्ता परिवार निभाते हैं लोग-बाग...और अपने को धन्य समझते हैं कि बड़ों की सेवा का ये मौक़ा मिला, पर ये हैं कि मुँह से अपने मर्द की बड़ाई—क्या कहो, जमाने के रंग हैं और उनकी लायकी जो एक कान से सुना और दूसरे से...

    क्या है? मुक्ता उनसे कुछ कह रही थी। आत्मश्लाघा और आत्मदया के कुनकुने वारिधि में तिरती सावित्री की खीझ छूटी। मुक्ता ने बताया कि डॉक्टर साहब देखने आए हैं ख़ुद।

    मुस्काता, सुनहरी कमानी का ऐनक लगाए डॉक्टर सामने खड़ा था पूछता हुआ कि वे डर वर तो नहीं रहीं कहीं? उनके सिवा सब हँस पड़े। फिर गंभीरता से उन्होंने नर्स से कुछ कहा और फिर बाहर चले गए। पीछे-पीछे बेटे भी—

    हाय, बड़े हँसमुख हैं, मँझली ने कहा। सबको बताने लगी कि बड़ा नाम है उनका, और सबसे बड़ी बात यह कि देश-विदेश में नाम होने के बावजूद कोई घमंड नहीं उसके चाचा तो कई सालों से बहुत अच्छी तरह जानते…

    नर्स भीतर आई। ये कमरा बदलना होगा, गहना भी हटाना होगा। उसकी आवाज़ तीखी और हठीली थी, जिससे कोई तकरार नहीं कर सकता। बस पंद्रह मिनट और हैं... उसने लड़कियों-बहुओं से कहा, यह जोड़ते हुए कि डॉक्टर साब वक़्त के बहुत पाबंद हैं, एक बेवजह मुस्कान सब पर डालकर वह हथेली पर एक शीशी से गोलियाँ डालकर गिनने लगी। लड़कियों ने सुषमा और चुन्ना की बहू को बाहर भेज दिया, और नर्स के साथ उनके कपड़े-जेवर उतारने लगीं। आठ सोने की चूड़ियाँ, एक चार तोले की चैन, सोने के बुंदे—एक बुंदे का पेच तनिक फिसलना-सा था, नीचे गिर गया।

    हाय, सोना खोना अच्छा नहीं होता! सावित्री फिर रोने लगी। मिल जाएगा अम्माजी, नर्स ने कहा, आपके बच्चे ढूँढ़ लेंगे।

    बड़ी ने उनके सामने एहतियात से सब चीज़ें रूमाल में बाँधकर अपने पर्स में डाल लीं और कहा कि घर जाते ही वह उन्हें माँ के ट्रंक में डाल देगी।

    बहुएँ समझदारी से इस दौरान बाहर ही रहीं। अम्माजी की चाबियाँ बड़ी के पास हैं, उन्हें मालूम था।

    सिर के ऊपर बेहद तेज़ रोशनी थी। डॉक्टर की आँखें ही आँखें दीखती थीं। उसकी सुई की नोक से दवा उछली और उनकी नसों में बहने लगी—

    वही भटियारिन फिर से चली रही थी, सावित्री ने उठकर बदन झाड़ना चाहा, यह तो सपना था न? भटियारिन पास आती गई, आ... वह उसे बुला रही थी, उसकी लहसुन-भरी साँसें—सावित्री को उबकाई आने लगी, आ-आ, वह औरत फिर हँसी। उसके पान खाए कल्ले चमके, फिर सब अँधेरे में डूब गया। कौन होगी वह?

    होश कभी धीमे-धीमे पास आता और फिर धीमे-धीमे दूर चला जाता जैसे कोई झूले में बिठाकर हौले-हौले पींगें दे रहा हो—आगे, फिर पीछे, फिर आगे। पेट में एक आरी घूम रही थी मानो, किर्र-किर्र निरंतर बेधती हुई। दर्द की लकीर गहरी, और गहरी होती हुई। क्या यह वही कराह रही थी? विवश गाय की-सी डकराहट। सावित्री के अपने ही कान उसे सुनकर भयार्त होते—

    चारों तरफ़ आवाज़ें थीं, फुसफुसाती, धीमी, तेज़। चलते हुए आकार थे—आवाज़ से कुछ बढ़ा। क्या? आवाज़ें? दर्द? दर्द, दर्द थकान, दर्द—सावित्री के गालों पर बहता हुआ कुछ किसी ने पोंछा। अचानक उसे बड़े ज़ोरों की प्यास महसूस हुई। जीभ जैसे सूखकर पत्थर हो गई हो। वह कहना चाहती थी, 'पानी' पर मुँह से विवश डकराहट निकलती।

    धीमे-धीमे शक्लें और आवाज़ें साफ़ होने लगीं, दूरबीन की ढिबरी घुमा दी गई हो। यह तो एक और ही कमरा था।

    अम्मा! अम्मा! मुन्ना उससे कुछ कह रहा था, आज बारह घंटे यहाँ फिर ले जाएँगे...

    ले जाएँगे, शब्दों की मनहूस छाया—सोना खोया सो अलग—किसने कहा होगा? कब? वह औरत—कहाँ देखा था उसे?

    रोओ मत अम्मा, यह छोटी थी, सब ठीक हो जाएगा। धीमे-धीमे पैरों के पास खड़े और आकार भी स्पष्ट हो रहे थे—दोनों बहुएँ-बेटे—

    दवाओं की बास से कमरे की हवा घुट रही थी। जी मिचलाया और दर्द की लहर लपट की तरह—

    कैसा जी है? सुनहरी कमानी के चश्मे वाला कोई—विस्फारित नेत्रों से सावित्री ताकती रही, जैसे तमाचा खाने से पहले बच्चा, पीटने वाले को देखता है—जी मचला रहा होगा, क्यों? उसी से पूछ रहा था कोई?

    जी, बेहोशी की दवाएँ दी थीं, उन्हीं का असर है। थोड़ी देर में चला जाएगा। फिर वह आदमी नर्स से कुछ कहने लगा, फिर सब चले गए। सफ़ेद कपड़ों वाली नर्स-भर रह गई—दीवार घड़ी टिकटिकाती थी टिक...टिक...टिक...टिक...सावित्री की निगाह पहली बार अपने चारों ओर लगी नलकियों पर गई—वे सब उसी के बदन में तो लगी थीं। नलकियों पर झूलता उसका बदन...टिक...टिक...टिक...टिक...उसकी निगाह अपनी सूनी कलाइयों पर गई...उसकी चूड़ियाँ?...सब सूना—ख़ाली...टिक-टिक-टिक...नर्स आई, उसने सब नलकियों को, बोतलों को छूकर देखा, घड़ी देखी, फिर ओझल हो गई...शायद कुर्सी पर जा बैठी होगी...उनके पेट पर बड़ा भार था...बड़ा ही दर्द...टिक...टिक...टिक...टिक धड़कता हुआ दर्द...सामने का दरवाज़ा खुला था। अचानक सावित्री ने देखा कि औरत फिर भीतर रही थी, मटकती हुई, ठीक उसकी आँखों के सामने। सावित्री की देह भय से काठ हो गई। सिर का ख़ून मानो बर्फ़ हो गया हो—वह चीख़कर नर्स को आगाह करना चाहती थी, जिस कमरे में से उसके अपने बच्चों तक को बाहर भेज दिया था, वहाँ वह कैसे? पर दर्द और भय उन्हें गोफन में रखे पत्थर-सा घुमा रहा था, तेज़ी से, और तेज़ी से। वह औरत अब उनके ऐन सिराहने खड़ी थी, अपनी व्यंग्य-भरी हँसी के साथ। उसके पान सने दाँतों में सोने की कीलें ठुकी थीं और उसके बालों में ठोंका गया तेल माथे तक चुहचहा आया था। उसके भरे-भरे बेशर्म कुल्हे जैसे न्योतते थे—वह नहीं जानती क्या इन कमजातों को? क्रोध से वह हाँफने लगी—छिःछिः इसी

    वक़्त कहीं लड़के-लड़कियाँ- बहुएँ गए तो?

    वे क्योंकर आएँगे अब? औरत हँस पड़ी—अब तो विन्नो तुम्हाई-हमाई पटेगी— वह बुंदेलखंडी आवाज़ में गा-गाकर-सा बोलती थी—उसने फिर सावित्री की बाँह पर चिकोटी भर ली और ठठाकर हँस पड़ी-फिर वह जाने कहाँ चली गई?—सावित्री के मुँह से अचानक इतनी देर से जमी हुई चीख़ें फूट पड़ीं—वह चिल्लाए जा रही है—नर्स हड़बड़ाकर उठी, उसकी सफ़ेद पोशाक पास आई—अचानक नर्स से भी लहसुन की गंध फूटने लगी थी—या क्या पता, नर्स के पीछे वहीं कहीं छुपी—फिर सब गड्डमड्ड हो गया। अँधेरा, फिर सब अँधेरा।

    सावित्री की आँख खुली तो सबसे पहले मुन्ना का चेहरा दिखाई पड़ा। वह कुछ कह रहा था। ग्लूकोज की नई बोतल लगी थी, उसी से—ठीक हो? ठीक हो? वह बहुत पास से पूछ रहा था—एक क्षण सावित्री की भयार्त्त आँखें उसके इधर-उधर किसी को ढूँढ़ती रहीं—फिर वह रो पड़ी। मुन्ना सिर सहलाने लगा—सुषमा भी थी पास में, मुक्ता और छोटी ही थे ना? वे भी रो रही थीं, मत रोओ, वह कहना चाहती थी, पर मुँह से बोल ही नहीं फूटे नर्स अपनी तीखी आवाज़ में कुछ कह रही थी, फिर मुक्ता को आवाज़, कहने लगी कि उन्हें जाना है, कुछ समय तक उसे मतलब ही समझ नहीं आया, जाना है किसे? फिर उसने देखा कि कमरा फिर ख़ाली हो गया है, सिर्फ़ नर्स है और घड़ी की टिक...टिक!

    मत जाओ, मुझे अकेली छोड़कर मत जाओ, वह चीख़कर कहना चाहती थी। कमरा जैसे एक कटघरा था। उसे पक्का मालूम था कि सबके ओझल होते ही धीमे से वही औरत भीतर दाख़िल हो जाएगी और दर्द का हिंडोला उन्हें लिए दिए ऊपर उठने लगेगा, आओ, आओ, आओ।

    तुम डरती बहुत हो—उसकी कुहनी के पास से लहसुन और तेल की गंध फूट रही थी—क्या तुम अकेली हो? सावित्री भयार्त्त खरहे की तरह पड़ी रही।

    बोल, डरती हो या नईं?

    उससे पूछा जा रहा है? हाँ, वह अपने को कहती सुनती है—किससे? जाने से कि, जहाँ जाना है उसे?

    जाने क्यों है? है? जाना ही क्यों है? मुझे क्यों जाना है?

    अचानक सावित्री पाती है कि उसके भीतर का जमा हुआ एक अंबार पिघलकर उस औरत की ओर बह रहा है—जाने क्यों उसे पक्का यक़ीन है कि सिर्फ़ वही उससे झूठ नहीं बोलेगी, हँ? बोलो?

    तुम अनूठी हो क्या?

    पर मेरे बच्चे? घर? मेरे सारे गहने? अरे, अभी अपने हाथ से उन्हें बाँटा भी नहीं—

    कब तक रोके रखेगी? भटियारिन हँसी-सी। कौन हँसता था ऐसे, हँ? कोमा के आख़िरी छोर पर झूलती सावित्री को अचानक समझ आता है, कि यह भटियारिन अब तक इतनी जानी-पहचानी क्योंकर लगती रही? वह हू-ब-हू उस दाई की शक्ल की थी, जिसने उनके पहले बच्चे के जाने पर चौबीस घंटे उसकी बग़ल में डेरा किया था। दर्द की धार में बहती हुई वह चालीस साल पीछे चली आई थी, दर्द के सोते तक। दर्द से उस दम बड़ा वह भय था, जिससे उसकी पूरी देह उछल-उछल पड़ती थी, कब तक चीख़-चीख़कर उसे रोके रक्खेगी अपने भीतर?

    एक दमघोंट दबाव से उस वक़्त उसकी कमर सहलाती दाई ने कहा था।

    आज दर्द में डूबते हुए उसे वह अँधेरा फिर याद आया, वे पान खाए कल्ले।

    बाहर जाव। कमरे से उसकी महतारी को भी दाई ने भगा दिया था, महतारी के देखे से दरद जियादे उठे हैं।

    वह डूब रही थी और अब अपने कमरे में अँधेरा था, कड़वे तेल, अजवाइन और एक अजीब बकबकी-सी बास थी। और वह थीए और सख़्त हाथों वाली डरावनी दाई। आमने-सामने। माँ का सहलाता नग्न हाथ कहीं नहीं था।

    वह डूब रही थी, उसने डर से इधर-उधर ताका था। दाई उसकी टाँगें ऐंठकर अपनी लहसुन-भरी साँसें उसके चेहरे पर छोड़ रही थी।

    लगा ज़ोर हरामज़ादी, मैं कहती हूँ, उसे भीतर रोक मती।

    वह डूब रही थी और उसके कमर के नीचे मानो एक आग का भँवर घूम रहा था। उसे लगता था, वह अब सहार नहीं पाएगी, वह फट रही है, वह फट—उसके चेहरे पर लहसुन—भरी साँसें छोड़ते पान खाए जबड़े की बकबकी-सी वह बास माई री, मैं मरी! वह ज़ोर से चिल्ला रही थी। अँधेरा-अँधेरा—लाली अँधेरा—

    वह डूब रही थी, और—लगा ज़ोर! लाल-लाल जबड़ों से फूटा था, मैं कहती हूँ रोक मती, रहा है वह, आने दे उसे!

    डूबते-डूबते साँस रोककर जाने कैसे उसने ज़ोर लगा ही दिया था। आख़िरी बार।

    एक दिल दहलाने वाली चीख़ और अचानक वह आज़ाद थी...झलमल उसकी टाँगों के बीच से एक सोता-सा बह रहा था, मानो। और बदन जैसे फूल ही गया हो।

    दर्द की नदी उसके ऊपर कहीं दूर बह रही थी, और वह ठंडी नर्म तलहटी में पड़ी थी—थकान और नींद से चूर...के हाँ, के हाँ, के हाँ, एक अजीब आवाज़ रही थी दूर से, अहा हा, क्या दन्न से बेटा जनमा हैगा।

    पैरों से उल्टा लटकाए एक बिलखते लोथड़े को दाई धीमे-धीमे उसके आगे हिला रही थी, जैसे बंद जेबघड़ी हो। फिर वह ऐसे सो गई थी, जैसे कुछ हुआ ही हो।

    आज फिर सावित्री की पीठ के नीचे नदी की तलहटी की चिकनी नर्माई थी। वह अब डूब नहीं रही थी, हालाँकि अभी भी चारों ओर ख़ून-पसीने, लहसुन की गंध फैली थी।

    सावित्री ने धीमे-धीमे आख़िरी बार पैर सीधे किए, बिना डरे। उसके अपने भीतर से जो अब सामने गया था, वह हर सत्कर्म से बड़ा था, हर दुष्कर्म से भी।

    उसने रही-सही ताक़त समेटकर दूसरी बार साँस छोड़ दी...दर्द अब ऊपर कहीं दूर बह रहा था, उसकी आँखों के आगे कुछ भी नहीं था। पूरे बदन में थी ठंडक और नींद। गहरी नींद।

    कमरे में रुलाई उभरने लगी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : शताब्दी की कालजयी कहानियाँ (खंड 3) (पृष्ठ 118)
    • संपादक : कमलेश्वर
    • रचनाकार : मृणाल पाण्डे
    • प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन
    • संस्करण : 2010

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