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चम्पई सुबह
एक अतिरिक्त छुवन
एक अभूतपूर्व रोमांचक अनुभूति
गोल्डेन पैगोड़ा में
बौद्ध पताकाएँ, मंत्र पूरित झालरेंजो आती हैं ब्रह्मपुत्र की धारों को छूती हुई
लक्ष्मीकांत मुकुल
दुर्दिनों का आत्मकथ्य
निर्विकल्प झेलनी है एकाकीपन की पीड़ाबुनना है उदासी के उघड़े हुए ऊनी रेशों से
पीयूष तिवारी
हरेक रंगों में दिखती हो तुम-एक
तुम्हारे स्पर्श से उभरती चाहतों की कोमलतातुम्हारी पनीली आँखों में छाया पोखरे का फैलाव
लक्ष्मीकांत मुकुल
कुतुबमीनार के सामने
लाल-तंबई रंगत की नलिका-सी पतली इमारतछेदते हुए आकाश, मुक़ाबले में हराते हुए
लक्ष्मीकांत मुकुल
बनारस में नौकायन
श्मशान की दहकती लाशों की चिरांध में धुल जाती हैंकलरव करते जल पंछियों की चहचहाहट
लक्ष्मीकांत मुकुल
रास्ते में मिली दिहिंग नदी
तुम भी तो नदी के गाँव के होतुम्हारे बोल से उठती है भंवर की आवाज़
लक्ष्मीकांत मुकुल
एक हादसे पर टिकी हुई है हमारी दुनिया
हिस्से पर आया मनुष्य, से पहले बहुत पहलेउससे भी बहुत पहले जब जन्मा कोई जीव-युगल