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तटबंध

tatbandh

एक गाँठ खुलते ही

स्वेटर का एक फंदा खुल जाता है

एक सुई भर छेद से रिसकर

फूट पड़ता है बाँध

सूखे में भी मधुमक्खी की स्मृतियों में

पंखुड़ी के स्पर्श का स्वाद रहता ही है

एक गंध के भ्रम से टूट जाता है संयम

एक चेहरे के उभार से

उठ जाती है रात, बादल, नींद

एक नाम की पुकार से

पूरा संवाद चीख़ पड़ता है

एक बार और बात करने का लोभ

मिटा दे बहलाव भटकाव का षड्यंत्र,

बाँधा था तुमने

अपने पूरे जन्म का ढाँढस एक साथ;

उठा तो लूँ फ़ोन

पर मुझे डर है

कि तुम बिखर जाओ कहीं।

स्रोत :
  • रचनाकार : केतन यादव
  • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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