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भारत-भारती / भविष्यत् खंड / आशा
बीती नहीं यद्यपि अभी तक है निराशा की निशा—है किंतु आशा भी कि होगी दीप्त फिर प्राची दिशा।
मैथिलीशरण गुप्त
आशा के न होने पर
जबकि आशा नहीं है इन दिनों, आशा तब भी नहीं थी जब उसने कही थी आशा के लाल ख़ून वाली बात।दो
प्रतीक ओझा
वास्तव में जिसे किसी प्रकार की आशा
वास्तव में जिसे किसी प्रकार की आशा नहीं है, वही सुख से सोता है। आशा का न होना ही परम सुख है।




