सभि रस मिठे मंनिऐ

गुरु नानक

सभि रस मिठे मंनिऐ

गुरु नानक

और अधिकगुरु नानक

    सभि रस मिठे मंनिऐ सुणिऐ सालोणे।

    खट तुरसी मुखि बोलणा मारण नाद कीए॥

    छतीह अंम्रित भाउ एकु जा कउ नदरि करेइ।

    बाबा होरु खाणा खुसी खुआरु॥

    जितु खाधै तनु पीडीए मन महि चलहि विकार॥ ॥रहाउ॥

    रता पैनणु मनु रता सुपेदी सतु दानु।

    नीली सिआही कदा करणी पहिरणु पैर धिआनु॥

    कमरबंदु संतोख का धनु जोबनु तेरा नामु॥

    बाबा होरु पैनणु खुसी खुआरु॥

    जितु पैधै तनु पीड़ीऐ मन महि चलहि विकार॥ ॥रहाउ॥

    घोड़े पाखर सुइने साखति बूझण तेरी वाट।

    तरकस तीर कमाण सांग तेगबंद गुण धातु॥

    वाजा नेजा पति सिउ परगटु करमु तेरा मेरी जाति।

    बाबा होरु चड़णा खुसी खुआरू॥

    जितु चड़िऐ तनु पीड़ीऐ मन महि चलहि विकार॥ ॥रहाउ॥

    घर मंदर खुसी नाम की नदरि तेरी परवारु।

    हुकमु सोई तुधु भावसी होरु आखणु बहुतु अपारु॥

    नानक सचा पातिसाहु पूछि करे बीचारु।

    बाबा होरु सउणा खुसी खुआरु॥

    जितु सुतै तनु पीड़ीऐ मन महि चलहि विकार॥ ॥रहाउ॥

    (नाम के) मनन में सभी मीठे रस (प्राप्त हो जाते है), श्रवण में सलोना रस (नमकीन) मिल जाता है; मुख से उच्चारण करने में (सारे) खट्टे रसों (की प्राप्ति हो जाती है) और कीर्त्तन करने में मसाले पड़ जाते है। (परमात्मा में) एक भाव—अनन्य प्रेम करने में छत्तीस प्रकार के अमृत सदृश भोजन की प्राप्ति हो जाती है। (परंतु यह सब उसकी वयक्ति को प्राप्त होता है) जिस पर उसकी कृपा होती है।

    बाबा, अन्य भोजन को ख़ुशी बरबाद करने वाली है जिनके खाने से शरीर पीड़ित होता है और मन में विकार उत्पन्न होता है।

    मन को (परमात्मा के चरणों में) अनुरक्त कर देना वाला पोशाक है। सत्य और दान सफ़ेद पोशाक है, (हृदय की कालिमा) को दूर करना ही नीली पोशाक है तथा (हरी के चरणों का) ध्यान बड़ा जामा है। सतोष ही कमरबंद और (हे हरी,) तुम्हारा नाम ही धन और योवन है।

    बाबा, अन्य पहनावे की ख़ुशी बरबाद करने वाली है, जिनके पहनने से शरीर को पीडा होती है और मन मन में विकार होता है।

    तेरे मार्ग का ज्ञान होना ही घोड़े की काठी और सोने की झालर है। (शुभ) गुणों की ओर दौड़ना ही तरकस, वाण, धनुष, बरछी और तलवार की म्यान है। प्रतिष्ठा के साथ प्रकट होकर रहना ही बाजा और भाला है और तुम्हारी कृपा ही मेरी जाति है।

    बाबा, अन्य प्रकार की सवारियों की ख़ुशी बरबाद करने वाली है, जिन पर चढ़ने से शरीर को पीड़ा होती है और मन में विकार होता है।

    नाम की प्रसन्नता मेरा घर और महल है। तेरी कृपा-दृष्टि ही मेरा परिवार है। जो तुझे अच्छा लगे, वही हुक्म है, (हालाँकि) अन्य बहुत से कथन हो सकते हैं। नानक कहते हैं कि सच्चा बादशाह (किसी अन्य से) पूछ कर विचार नहीं करता, (वह तो अपनी इच्छा से ही सारी बाते करता है)।

    ‘ऐ बाबा, अन्य प्रकार के सोने की ख़ुशी बरबाद करने वाली है, जिस सोने से शरीर को पीड़ा होती है और मन में विकार होता है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : गुरु नानकदेव वाणी और विचार (पृष्ठ 147)
    • संपादक : रमेशचंद्र मिश्र
    • रचनाकार : गुरु नानक
    • प्रकाशन : संत साहित्य संस्थान
    • संस्करण : 2003

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