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भर्तृहरि के उद्धरण

विद्यारूपी वस्तु मनुष्य का अधिक रूप और छिपा हुआ अंतर्धन है, और विद्या ही भोग, यश और सुख की संपादन करने वाली और गुरुओं की गुरु है, परदेश में विद्या ही बंधुजन है और विद्या ही परम देवता है, तथा विद्या ही राजा लोगों में पूज्य है, वहाँ भी धन पूजित नहीं है, इसलिए विद्याविहीन नर पशु है।