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भर्तृहरि के उद्धरण

विद्वान लोग तो अपनी ईर्ष्या से ही ग्रसित हैं, और धनवान् लोग अपने द्रव्य के गर्व से किसी के गुणों का आदर ही नहीं करते। अन्य जो हैं, वे साधारण अल्पज्ञ हैं—इन कारणों से सुभाषित उत्तम काव्य शरीर ही में जीर्ण होता जाता है।