श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र के उद्धरण
तुम भक्तिरूपी जल को त्याग कर; आसक्तिरूपी बालू की रेत में बहुत दूर मत जाओ, दुःखरूपी सूर्योत्ताप से बालू की रेत गर्म हो जाने पर लौटना मुश्किल होगा। थोड़ा उत्तप्त होते-होते अगर लौट नहीं सके, तो सुखकर मरना होगा।
-
संबंधित विषय : भक्ति