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स्वामी विवेकानन्द के उद्धरण

तर्क की एक निश्चित सीमा होती है, उससे आगे वह नहीं जा सकता। उसका दायरा बहुत ही सीमित है, फिर भी तथ्य इस दायरे में समाहित होते रहते हैं।