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भर्तृहरि के उद्धरण

सूर्यकांतमणि यद्यपि अचेतन है, तो भी सूर्य के किरणरूपी पादस्पर्श करने से जल उठता है, ऐसे ही तेजस्वी पुरुष, परकृत अनादर को भला कैसे सह सकता है।