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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

शृंगार और वात्सल्य के क्षेत्र में सूर की समता को और कोई कवि नहीं पहुँचा है। शृंगार के संयोग और वियोग, दोनों पक्षों का इतना प्रचुर विस्तार और किसी कवि में नहीं मिलता।