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कुँवर नारायण के उद्धरण

'श्रेय' की साधना जहाँ कला की सामाजिकता के लिए पर्याप्त जगह छोड़ती है, वहीं 'प्रेय' की सौंदर्यमूलक उत्कृष्टता के लिए।