शरीर में से ख़र्च हो जाने वाले तत्त्वों को फिर पूरा करने और इस प्रकार शरीर को कार्यक्षम स्थिति में रखने के लिए आहार की ज़रूरत है। इसलिए यह दृष्टि रखकर ही जितने और जिस प्रकार के आहार की ज़रूरत हो वही खाना चाहिए। स्वाद के लिए—अर्थात् जीभ को रुचने की दृष्टिसे कुछ खाना या ख़ुराक में मिलाना, अथवा अधिक आहार करना अस्वाद-व्रत का भंग है।