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कुँवर नारायण के उद्धरण

संतुलित बुद्धि और उदार संवेदनशीलता से साहित्य अपने चारों तरफ़ देखता है—केवल राजनीति की ही तरफ़ नहीं, न किसी एक ही जगह खड़े होकर।