साहित्य का काम अपनी पहचान को राजनीति की भाषा में खो देना नहीं; बल्कि उस भाषा के छद्म से अपने को लगभग बेगाना करके अकेला कर लेना है, एक संत की तरह अकेला कि राजनीति के लिए ज़रूरी हो जाए कि वह बारबार अपनी प्रामणिकता और सच्चाई के लिए साहित्य से भाषा माँगे—न कि साहित्य ही राजनीति की भाषा बनकर अपनी खो दे।