साहित्य केवल एकरुखी भाषा नहीं, वह भाषा की उस पूरी सामर्थ्य और शक्ति का अहसास है भी और पाठक को कराता भी है, जो साहित्य को मनुष्य की अन्य भाषायी चेष्टाओं से अलग भी करता है और विशिष्ट भी, क्योंकि वह मूलतः भाषा की एक विशिष्ट रचना है—भाषा में एक रचना नहीं।