Font by Mehr Nastaliq Web

राधावल्लभ त्रिपाठी के उद्धरण

हमारे साहित्य के इतिहास की वह एक स्वर्णिम घड़ी रही होगी, जिसमें निराला ने छंदों के बंधनों को तोड़ कर जूही की कली की मुस्कान, उसके खिलने और चटक उठने को कविता में बिखेर दिया।