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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

प्रकृति की नाना वस्तुओं और व्यापरों का अपना-अपना सौंदर्य भी है, जो एक ही प्रकार की वस्तु या व्यापार के आरोप द्वारा अभिव्यक्त नहीं हो सकता।