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स्वामी विवेकानन्द के उद्धरण

प्रेम में किसी प्रकार का भय नहीं रहता। प्रेम में डर हो सकता है? क्या कभी बकरी शेर पर, चूहा बिल्ली पर या ग़ुलाम मालिक पर प्रेम करता है? ग़ुलाम लोग कभी-कभी प्रेम दिखाया करते हैं, पर क्या वह प्रेम है? क्या डर में तुमने कभी प्रेम देखा है? ऐसा प्रेम सदा बनावटी रहता है।

अनुवाद : पण्डित द्वारकानाथ तिवारी