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विष्णु खरे के उद्धरण

पिछले पैंतीस वर्षों से यह देश एक ऐसी कविता की माँग कर रहा है, जिसमें कला के साथ सब कुछ कह सकने का सहस तो हो ही—कभी-कभी कला की क़ीमत पर भी कहने का माद्दा हो।