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स्वामी विवेकानन्द के उद्धरण

पाप या अधर्म वही है, जो उन्नति में बाधा डालता हो या पतन में सहायता करता हो, और धर्म वही है, जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस की सिद्धि में सहारा मिले।