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स्वामी विवेकानन्द के उद्धरण

निःस्वार्थ सेवा ही धर्म है और बाह्य विधि, अनुष्ठान आदि केवल पागलपन है, यहाँ तक कि अपनी मुक्ति की अभिलाषा करना भी अनुचित है।