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अवनींद्रनाथ ठाकुर के उद्धरण

नगर अपने और अपने नगरवासियों के स्वभाव के अनुसार जब अपने रूप का आभास कराता है, तभी उसका स्वाभाविक चित्र बनता है।

अनुवाद : रामशंकर द्विवेदी