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रवींद्रनाथ टैगोर के उद्धरण

नदी देश को जल देती है; अन्न देती है, लेकिन इससे भी बड़ा उसका एक दान है—वह देश को गति देती है। सुदूर बाह्य-जगत् के साथ संबंध स्थापित करती है। स्थावर शरीर के बीच प्राण-धारा प्रवाहित करती है। जो देश नदी पर निर्भर है; उसमें यदि नदी की धारा सूख जाए तो मिट्टी कृपण बन जाती है, अन्न-उत्पादन की शक्ति क्षीण हो जाती है।