मनुष्य ज्योंही समाज में प्रवेश करता है, उसके सुख और दुःख का बहुत-सा अंश; दूसरे की क्रिया या अवस्था पर अवलंबित हो जाता है और उसके मनोविकारों के प्रवाह, तथा जीवन के विस्तार के लिए अधिक क्षेत्र हो जाता है। वह दूसरों के दुःख से दुःखी और दूसरों के सुख होने लगता है।