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कुबेरनाथ राय के उद्धरण

मनुष्य दैनंदिन समृद्धता के साथ-साथ कुटिलतर और जटिलतर होता जा रहा है, उसकी अंतर्निहित निष्कलंक का लोप होता जा रहा है; फलतः किसी गंभीरतर-वृहत्तर दुःखबोध की भावना आधुनिक साहित्य में नहीं।