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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

कृष्णभक्त अपनी साधना के लिए एक ऐसे प्रेमक्षेत्र के भीतर अपने आराध्य की प्रतिष्ठा करते हैं, जो लोक से न्यारा है। जिसमें न लोक मर्यादा चलती है, न वेदमर्यादा।