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स्वामी विवेकानन्द के उद्धरण

किसी धर्म का सिद्धांत कितना ही उदात्त एवं उसका दर्शन कितना ही सुगठित क्यों न हो, जब तक वह कुछ ग्रंथों और मतों तक ही परिमित है, मैं उसे नहीं मानता।