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कुँवर नारायण के उद्धरण

किसी भिन्न संस्कृति-बोध और स्थानीय संवेदनाओं का दूसरों तक पहुँचना उसका विलोम नहीं, प्रसार है। ठीक उसी तरह; जैसे अन्य साहित्यों से हमारा निकट संपर्क, हमारे अपने साहित्य-बोध को विस्तृत करता है—क्षीण नहीं।