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श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र के उद्धरण

किसी भी मत के साथ किसी मत का प्रकृत रूप में कोई विरोध नहीं, भाव की विभिन्नता, प्रकारभेद है। एक का ही नानाप्रकार से एक ही तरह का अनुभव है।

अनुवाद : श्रीरामनंदन प्रसाद