दूसरे प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य आहार-विहार में अधिक स्वतंत्रता भोगता है और इससे वह समस्त इंद्रियों के भोगों में अधिकता करता है। परिणामस्वरूप केवल साल के किन्हीं ख़ास दिनों में ही उसे काम-वेग नहीं आता, बल्कि वह बराबर उसका पोषण करता रहता है। यों काम-विकार—इसका निरंतर का रोग बने रहने के कारण उसे जीतना इसके लिए कठिन से कठिन हो गया है।