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मैनेजर पांडेय के उद्धरण

काव्यवस्तु में विषयवस्तु का मूल रूप क़ायम रहता है, लेकिन कवि की वैयक्तिक चेतना और सामाजिक चेतना के संपर्क से उसका नवीन रूप बनता है।