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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

काव्यरचना की रूढ़ि या परपंरा; सभ्यता के न्यूनाधिक विकास, जीवन-व्यापार के बदलनेवाले बाहरी रूप-रंग इत्यादि पर स्थित नहीं है। इसकी नींव गहरी है। इसका संबंध हृदय के भीतरी मूल देश से है, उसकी सामान्य वासनात्मक सत्ता से है।