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कुँवर नारायण के उद्धरण

कविता यथार्थ को नज़दीक से देखती, मगर दूर की सोचती है। वह एक बारीक़ मगर ज़रूरी फ़र्क़ करती है—जीवन-यथार्थ और जीवन-सत्य के बीच।