रामधारी सिंह दिनकर के उद्धरण
कविता का जो अपना स्वभाव है और धर्म है, सभी विधाओं से अलग जिस गुण के कारण उसका अपना अस्तित्व है, उसे देखते हुए कविता तो वही श्रेष्ठ समझी जानी चाहिए जो उपदेश नहीं देती, ज्ञान का कथन नहीं कहती, कर्म के कोलाहल से दूर है और ऐसा कोई कार्य नहीं करती जो राजनीतिज्ञों का कार्य है, धर्माचार्यों और दार्शनिकों का कार्य है।
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