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गजानन माधव मुक्तिबोध के उद्धरण

कवि को पंडित, आचार्य या संपादक होने की आवश्यकता नहीं है, उसके काव्य का सौंदर्य; उसके पांडित्य और आचार्यत्व पर निर्भर न होकर, उसकी भाव-समृद्धि और अभिव्यक्ति-क्षमता पर निर्भर है।